सुरनर कै'वै सही करमानो
surnar kaiwai sahi karmano
सुरनर कै'वै सही करमानो, पांचूं थिरकर राखो।
करो कमाई गुरु फरमाई, तन मन हिवड़ो नाथो।
अठोतरसै तीरथ न्हावो, कूड़ मनां कांई भाखो।
आंगण आंबो सफळ फळ्यो है, फूल भलेरा चाखो।
सांभळ चन्दा सांभळ सूरज, सांभळ पौन र पाणी।
नीर थकां नर थूळ रैयैला, जां री क्हो सहनाणी।
जां रो जीव गयो दोय डांडा, ज्यूं तिल चूर्या घाणी।
लंका सरीखा कोट भणीजै, समंद सरीखी खाई।
मेघनाद-सा बेटा उण रै, कुंभकरण-सा भाई।
सो ही पुरखो उपड़ (उजड़) गयो रे, किसड़ी वार तुमारी।
आपरै घर री भगरज मीठी, पर घर मिसरी खारी।
सब ही सील सिनाने हालो, आ ही गुरु फरमाई।
गोली री पड़गोली कहिये, सो कर मानो माई।
जीव कहै मन बरज्यो न रैय, वरत रै'वै पग मारी।
भळहळ थांभ तपै दोय आगै, जां बिच काढ़णहारी।
बळतां थांभा जळती झाळ्यां ढोवै जिंद करारी।
उथकर जिवड़ो थरहर कांपै, छूटै किसी उधारी।
का जी’ छूटै कोई सुकरत कीयां, का करणी इधकारी।
कणी कणी रो लेखो मांगै, ज्यूं छक्य आवसारी।
न्हानै मोटै लेवे नवेड़ा, सुणियो एह विचारी।
गुरु प्रसादे गोरख वचने, (श्रीदेव) जसनाथ(जी) असली ज्ञान विचारी।
- पुस्तक : सबद ग्रंथ
- संपादक : सूर्य शंकर पारेक
- रचनाकार : जसनाथ
- प्रकाशन : श्री देव जसनाथ सिद्धाश्रम (बाड़ी) धर्मनाथ ट्रस्ट बीकानेर (राज.)
- संस्करण : 1996
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