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जब भूख वायरल हुई

सोनम वांगचुक का अनशन उस लंबी भारतीय परंपरा की ताज़ा कड़ी था, जिसमें देह को दाँव पर रखकर सत्ता से संवाद माँगा गया। लेकिन जिस दौर में उपवास इंस्टाग्राम स्टोरी है और तपस्या प्रेस-रिलीज़ की शब्दावली, वहाँ अनशन की नैतिकता का क्या होगा? राज्य और सत्ता की नैतिकता पर इस वक़्त बात करना तो फ़िल-वक़्त मूर्खता है।

भारतीय परंपरा में अन्न त्यागना महज़ भोजन छोड़ना नहीं है। जैन परंपरा में संथारा या सल्लेखना अपनी मृत्यु को स्वयं चुनने का विधान है। देह जब साधना में बाधा बनने लगे, तो उसे पूरे होश में विदा कह देना। बुद्ध और महावीर, दोनों की साधना-पद्धतियों में इंद्रिय-निषेध केंद्र में है। यही भूख पर विजय आत्मशुद्धि का रास्ता मानी गई। इस परंपरा में ध्यान देने वाली बात है कि इसमें हिंसा है, तो सिर्फ़ अपने विरुद्ध। दाँव पर किसी और की देह नहीं, अपनी देह है। यही वह नैतिक बुनियाद है, जिस पर आगे चलकर अनशन की राजनीति खड़ी हुई : मैं तुम्हें नहीं मारूँगा, ख़ुद मिटकर तुम्हारी अंतरात्मा को कठघरे में खड़ा करूँगा।

आत्मशुद्धि के इस औज़ार को राजनीतिक हथियार में सबसे पहले क्रांतिकारियों ने ढाला। 1929 में लाहौर जेल में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने भूख हड़ताल छेड़ी। माँग इतनी भर कि हिंदुस्तानी राजनीतिक बंदियों से यूरोपीय कैदियों के बराबर बर्ताव हो। उसी हड़ताल में जतींद्रनाथ दास तिरसठवें दिन शहीद हुए। लाहौर से कलकत्ता तक उनकी अंतिम यात्रा में जनसैलाब उमड़ा। उपनिवेश की जेल में जिनके पास कुछ नहीं बचा था, उनके पास देह थी और देह की गवाही से बड़ा कोई मैसेज नहीं था।

गांधी ने इसी गवाही को सत्याग्रह का व्याकरण बना दिया। सबसे बड़ा गवाह पूना पैक्ट। 1932 में यरवदा जेल से दलितों के अलग निर्वाचन के विरुद्ध उनका आमरण अनशन शुरू हुआ तो पूना पैक्ट पर जाकर खुला। पर इस प्रसंग का असल सबक़ अनशन की ताक़त नहीं, सत्ता का चरित्र है। रामचंद्र गुहा ने लिखा है कि ब्रिटिश हुकूमत गांधी की भूख को नैतिक चुनौती की तरह नहीं, समस्या की तरह देखती थी। फ़ाइलों में हिसाब लग रहा था कि गांधी मर गए तो कितने दिन हल्ला मचेगा, अंत्येष्टि का इंतज़ाम क्या होगा। यानी सत्ता का अंकगणित तब भी वही था जो आज है; फ़र्क़ इतना कि साम्राज्य कम से कम हल्ले से डरता था। अब हो-हल्ला पार्ट ऑफ़ द गेम की तरह माना जाता है।आत्मशुद्धि से राजनीतिक हथियार तक

आज़ाद भारत का पहला इम्तिहान 1952, पोट्टि श्रीरामुलु का अनशन, अट्ठावनवें दिन मृत्यु, और भाषाई राज्यों का पुनर्गठन एक मौत ने तय किया। सबक़ यही था कि लोकतंत्र माँग तब सुनता है, जब देह जा चुकी हो।

यही वंशावली दिनकर की पंक्ति, “सिंहासन ख़ाली करो” 1975 में जेपी के मुँह से, 2011 में अन्ना हज़ारे तक और 2026 में सोनम वांगचुक तक सुनाई देती है। आंदोलन इन्हीं देह के इर्द-गिर्द बनते हैं क्योंकि हर बड़े आंदोलन को एक भूखा शरीर चाहिए, जो सबकी ओर से भूखा रहे।

पर यह नैतिक बल एकतरफ़ा सौदा भी साबित होता रहा है। आईआईटी के प्रोफ़ेसर रहे जीडी अग्रवाल, जो संन्यास के बाद स्वामी सानंद बने। उन्होंने साफ़ और अविरल गंगा के लिए 2018 में एक सौ बारह दिन अनशन किया, प्रधानमंत्री को चिट्ठियाँ लिखीं। उत्तर मृत्यु के बाद शोक-संदेश की शक्ल में आया। इरोम शर्मिला ने अफ़स्पा के विरुद्ध सोलह बरस अनशन किया। राज्य का जवाब नाक में ठुँसी नली थी। और समाज का जवाब उससे भी क्रूर। जब उन्होंने अनशन छोड़कर चुनाव का लोकतांत्रिक रास्ता चुना, तो जनता ने उन्हें नब्बे वोट दिए। जो समाज शहादत की पूजा करता है, वह जीवित सत्याग्रही से मुँह फेर लेता है। उसे बलिदान चाहिए, भागीदारी नहीं। अनशन की नैतिकता इसलिए अकेले अनशनकारी की परीक्षा नहीं है। वह दर्शक या कहें कि जनता की भी परीक्षा है और जनता—जो दर्शक ही है, इस इम्तिहान में बार-बार फ़ेल हुई है।

इस बीच सत्ता ने उपवास की भाषा ही हथिया ली। 2011-12 का ‘सद्भावना उपवास’ याद कीजिए। गुजरात के ज़िलों में मंच सजाकर किए गए एक-एक दिन के उपवास, जिनमें कैमरों की क़तार भूख से लंबी थी; और जहाँ एक इमाम की पेश की हुई टोपी लौटा दी गई। प्रतीकों की उस राजनीति में सद्भावना की भी हद तय हुई। वह उपवास आत्मशुद्धि नहीं, छवि-निर्माण था। यही शब्दावली 2021 में लौटी, जब साल भर चले किसान आंदोलन, जिसमें संगठनों के मुताबिक़ सात सौ से ज़्यादा किसानों की जान गई। और उसके बाद कृषि क़ानून वापस लेते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, “शायद हमारी तपस्या में ही कोई कमी रह गई।” तपस्या अब प्रेस-रिलीज़ का शब्द है। और जो सचमुच सिंघु की सर्दी में तपे, पंजाब के खेतों में ख़ून-पसीना एक किया, उनके लिए संसद से ‘आंदोलनजीवी’ का तमग़ा गढ़ा गया।और अब 2026 का दृश्य भी याद कीजिए। देश के प्रधान न्यायाधीश अदालती सुनवाई में बेरोज़गार युवाओं की तुलना ‘कॉकरोच’ से कर बैठे और युवाओं ने उसी तंज़ को झंडा बना लिया—कॉकरोच जनता पार्टी। देखते-देखते इंस्टाग्राम पर दो करोड़ से ज़्यादा फ़ॉलोअर, यानी भाजपा और कांग्रेस दोनों से अधिक। जून के पहले हफ़्ते में यह व्यंग्य जंतर-मंतर पर उतरा। माँग कि नीट पर्चा-लीक की नैतिक ज़िम्मेदारी लेकर शिक्षा मंत्री इस्तीफ़ा दें। पहले दिन के पाँच सौ प्रदर्शनकारियों में क़रीब दो सौ के हाथ में कैमरा था। जंतर-मंतर पर पिपली लाइव चल रहा था। पर डेढ़ महीने में आंदोलन ‘फ़ेसलेस’ हो गया है। यह अकारण नहीं हुआ है।

इसमें एक कमाल का कंट्रास्ट है। जिस इंस्टाग्राम पर भोजन की तस्वीरें इच्छा और उपभोग का विज्ञापन बनती हैं, उसी इंस्टाग्राम पर घटता वज़न, सूखे होंठ और लेटा हुआ नागरिक राजनीतिक अपील बन गया। प्लेटफ़ॉर्म वही है। पहले वह डूम स्क्रॉलिंग पैदा करता था, फिर भूख हड़ताल का समर्थन जुटाने लगा।

लेकिन इंस्टाग्राम की नैतिकता अस्थिर होती है। यहाँ करुणा और क्रूरता एक ही स्क्रीन पर चलती हैं। एक पोस्ट में सोनम वांगचुक के स्वास्थ्य की चिंता दिखती थी। दूसरी में विरोधियों के लिए गालियाँ दिखती। मंच पर राजीव तलवार जैसे आक्रामक वक्ताओं की वायरल भाषा है, जिनके यहाँ अफ़सरों को भद्दी गालियाँ देना—‘सवाल पूछना’ कहलाता है।

यहाँ नीट की परीक्षा के दुष्चक्र में फँसकर आत्महत्या करने वाले बच्चों की तस्वीर के सामने नाचते हुए सीजेपी के प्रवक्ता भी थे। जिस आंदोलन की शक्ति अहिंसा और आत्मकष्ट है, उसमें ये सबकुछ केवल शैली का प्रश्न नहीं है। वह आंदोलन के मूल दावे पर सवाल भी है।

इस पूरे विमर्श में दिल्ली का पुराना रोग भी दर्ज रहना चाहिए, भले हाशिये पर ही। निठारी इसलिए राष्ट्रीय त्रासदी बन सका कि नोएडा राजधानी के पड़ोस में था। भूख से चूहे खाने को मजबूर तमिलनाडु के किसानों की ख़बरें कभी प्राइम टाइम नहीं बनीं, क्योंकि वे कैमरे की पहुँच से दूर थीं। केन-बेतवा परियोजना के विस्थापित बरसों से धरने पर हैं। वहाँ न भीड़ पहुँची, न दिल्लीनशीन मीडिया की ओबी वैन।

प्रधानमंत्री को अपनी तुलना नेहरू से करना बहुत प्रिय है। कभी बराबरी में, कभी श्रेष्ठता में। इमरजेंसी को छोड़ दें तो इंदिरा गांधी से भी। महत्वाकांक्षा साफ़ है। इतिहास में ‘मेकर ऑफ़ मॉडर्न इंडिया’ की जगह, चाचा नेहरू की तर्ज़ पर एक आत्मीय स्मृति। पर तुलना करनी ही है, तो कसौटी वह होनी चाहिए, जो लोकतंत्र की सबसे कठिन कसौटी है : असहमति से बर्ताव।

श्रीरामुलु की भूख के आगे नेहरू झुके थे; झुकना उन्हें अपमान नहीं, लोकतंत्र का शिष्टाचार लगा। वर्तमान पद्धति दूसरी है, और उसका पाठ्यक्रम अब रटा-रटाया है—पहले अनदेखा करो। फिर बदनाम करो। विदेशी फ़ंडिंग, एफ़सीआरए आदि-आदि कहो। फिर थकाओ और अंत में रासुका। वांगचुक इस पूरी प्रयोगशाला से गुज़र चुके हैं। लेह की हिंसा के बाद एनएसए में जोधपुर जेल के एक सौ सत्तर दिन, फिर ‘रचनात्मक और सार्थक संवाद’ के हवाले से रिहाई और चार महीने के भीतर संवाद की जगह यह कि अनशन के बीसवें दिन पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से उठाकर सफदरजंग ले गई। जहाँ वह पानी और ग्लूकोज़ तक लेने से इनकार करते रहे। गांधी का उपवास सत्ता से संवाद की माँग था। आज की सत्ता संवाद की जगह ड्रिप चढ़ाना चाहती है।

अनशन की नैतिकता अंततः अनशनकारी की नहीं, सत्ता की कसौटी है। भूखा आदमी तो अपनी परीक्षा हर घंटे दे रहा होता है। असली इम्तिहान उसका है, जिसके पास रोटी भी है और राज भी। नेहरू होने की महत्वाकांक्षा रखने वालों को नेहरू का सबसे कठिन गुण भी अपनाना होगा। असहमत की भूख के आगे झुकने का साहस। श्रीरामुलु की देह के आगे यह गणतंत्र एक बार झुक चुका है।

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