धारावाहिक उपन्यास : जंकामंका गैंग : बहादुरी सीखने की चीज़ नहीं है
गणेश पाण्डेय
04 अगस्त 2026
गताध्याय से आगे...
छह
गंज गोबरहवा में मोनालिसा की मुस्कान को कोई नहीं जानता था। लेखक भी इस शहर में इन्हीं कोई का हिस्सा थे, उनका कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व नहीं था। वे गंज गोबरहवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग को हिंदी साहित्य समझते थे। कह सकते हैं कि कितने भोले थे, बल्कि डायरेक्ट कह सकते हैं कि कितने बड़े मूर्ख थे, आप अपनी सुविधा के लिए गधे भी कह सकते हैं। वे प्रोफ़ेसर जंकामंका शास्त्री को, अपना और हिंदी साहित्य, दोनों का माई-बाप समझते थे। विनम्रता की प्रतिमूर्ति जंकामंका शास्त्री का बोलना, जंकामंका का कंधा और गर्दन को झुकाकर चलना, जंकामंका का उठना-बैठना, जंकामंका की पिस्तौल छाप धोती और छकलिया कुर्ता और जंकामंका के व्यक्तित्व पर चार चाँद लगाने वाली उनकी अर्द्धचंद्राकार मुस्कान, इस शहर के सभी लेखकों को उनका दीवाना बना देती थी। कह सकते हैं, जंकामंका शास्त्री वशीकरण मंत्र बोलकर नहीं, अपनी अचूक अर्द्धचंद्राकार मुस्कान से छोड़ते थे। असीम सर जंकामंका शास्त्री सर की वशीकरण-विद्या के बारे में बताते थे कि उन्होंने युवाकाल में ही इस विद्या को डायरेक्ट तीक्ष्णकंटक बाबा से सीखा था। यह बात उन दिनों की है, जब वे जंकामंका के नाम से नहीं, बल्कि जगत में त्र्यंबकदत्त के नाम से जाने जाते थे। उस समय गंज गोबरहवा के लोग गंज गोबरहवा को जगत के रूप में जानते थे और तीक्ष्णकंटक बाबा को जगत के स्वामी के रूप में। असीम सर आगे डिटेल में बताते, वे भी उस समय तीक्ष्णकंटकधाम में थे, जब बाबा ने जंकामंका को वशीकरण-विद्या देने के लिए अपने पास बुलाया था। बाबा ने जंकामंका के ललाट पर पहले भभूत लगाया, तत्पश्चात् उनके होंठों पर अपने होंठ रख दिए और थोड़ी ही देर में अपने होंठों से जंकामंका के होंठों में वशीकरण-विद्या डाल दिया। बाबा कुछ देर तक जंकामंका के मुखमंडल को देखते और फूँकते रहे। अंत में बाबा ने ठुड्डी पकड़कर जंकामंका की आँखों में आँखें डालकर तीन बातें कहीं। पहली बात यह कि तू अपनी इस शकित की वजह से जगत में अब त्र्यंबक के नाम से नहीं, बल्कि जंकमंका शास्त्री के नाम से जाना जाएगा। दूसरी बात यह कि तेरी यह शक्ति तू जहाँ भी होगा, उसके तीन हज़ार मील के भीतर काम करेगी, बैठे-बैठे किसी के सामने या अकेले में मुस्काएगा और जिसे चाहेगा, तेरे वश में हो जाएगा। तीसरी बात यह कि खैनी का प्रयोग सावधानी से करेगा, हाथ पर मलकर नाक से सूँघ तो सकता है, लेकिन अपने होंठों में दाबकर इन कमल की पंखुड़ियों जैसे अधरों को क्षति नहीं पहुँचाएगा, अन्यथा, तेरी यह शक्ति तीन हज़ार मील से घटती जाएगी, फिर भी घटते-घटते तीन गज़ के भीतर से कभी कम नहीं होगी। असीम सर ने यह भी बताया था कि उन्होंने डरते-डरते तीक्ष्णकंटक बाबा से दो बातें उस वक़्त पूछीं थीं। पहली बात यह कि बाबा जंकामंका घर बैठे-बैठे अपनी मुस्कान फेंक कर दिल्ली में किसी लेखक चाहे लेखिका को अपने वश में कर सकते हैं? दूसरी बात यह कि जंकामंका का मतलब जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, झाड़-फूँक, तड़क-भड़क, ताम-झाम है? असीम सर ने डर के मारे कहा तो नहीं, लेकिन उनके मन सवाल कुछ इस तरह बना कि बाबा, जंकामंका का मतलब मूतो कम, हिलाओ अधिक तो नहीं? बाबा तो बाबा थे अंतर्यामी। असीम सर ने फिर बताया कि बाबा ने उन्हें अपने पास बुलाया, ज़ुल्फ़ी पकड़ने की दूरी तक और उनकी ज़ुल्फ़ी को पकड़कर आहिस्ता-आहिस्ता हिलाया और उनके सुंदर, काले-काले बालों में भभूत मलते हुए प्यार से कहा, भाग बदमाश, भाग। इस प्रकार असीम सर त्र्यंबकदत्त के नामांतरण और वशीकरण-विद्या-ग्रहण कार्यक्रम के साक्षी बने। असीम सर ने यह भी बताया था कि जंकामंका सर ने अपनी इसी दिव्य शक्ति से अपनी बैठक में बैठे-बैठे हँसमुख वाजपेयी को अपने वश कर लिया था। फिर गंज गोबरहवा के चूतिए लेखकों की क्या औकात है? असीम सर बताते तो नहीं, लेकिन उदय को लगता रहा है कि असीम सर भी जंकामंका सर की दिव्यशक्ति के प्रभाव में रहते हैं। इस शहर के सारे लेखक जंकामंका सर के आगे-पीछे डोलते रहते हैं। उनकी पवित्र गोबर पत्रिका में अपनी कविताएँ, गीत, ग़ज़लें, दोहे छपवाने के लिए विकल रहते हैं।
तीनों लेखक संगठनों के साहित्यिक कार्यक्रमों की अध्यक्षता, उनके संगठन में न रहने के बावजूद जंकामंका सर ही करते थे। कभी ऐसा संयोग बना कि वे बाहर रहे हों या बुख़ार एक सौ दो डिग्री से अधिक रहा हो या नाक बार-बार धोती से पोंछनी पड़ी हो तो अध्यक्षता करने के लिए बल्ली को, हौदा को, यहाँ तक कि अपने घरेलू सहायक धुरहुआ उर्फ़ धुरहू प्रसाद को अधिकृत कर देते थे। लेखक संगठनों का मुख्यालय कहने के लिए दिल्ली में था, लेकिन होता वही था, जो जंकामंका सर अपने शहर में चाहते थे। इस शहर के लेखकों मे जंकामंका सर के सामने बिछ जाने की इतनी ज़बरदस्त होड़ रहती थी कि आयोजनों में कई लेखकों की नाक छिल-छिल जाती थी। उदय ने अपनी आँखों से देखा था, कमलकांत त्रिपाठी, डीके सिन्हा जैसे लेखकों का नाक के साथ-साथ घुटना भी छिल-छिल जाता था। उदय शुरू से अविद्या माया जैसी किसी चीज़-फीज में यक़ीन नहीं करता था, इसलिए उस पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। कह सकते हैं कि वह जंकामंका सर की सम्मोहन-विद्या के सामने एक अपवाद की तरह खड़ा रहता था। उसे इसकी भारी क़ीमत भी चुकानी पड़ी थी। विश्वविद्यालय की नौकरी पक्की थी, वहाँ से निकाला जाना आसान नहीं था, लेकिन इस शहर के लेखकों ने उदय को जंकामंका गैंग के भय की वजह से अपने आयोजनों में बुलाना छोड़ दिया था, उससे बात करना छोड़ दिया था, यहाँ तक कि फ़ोन पर भी बात करना छोड़ दिया था, उन सबको लगता था कि फ़ोन के तारों पर जंकामंका सर का कोई जासूस न बैठा हो और वे उदय से बात करते रँगे हाथ पकड़ लिए जाएँ। कहना तो नहीं चाहिए, लेकिन कहना ज़रूरी है कि इस शहर के लेखक जंकामंका गैंग के सामने सचमुच का सूसू कर मारते थे। वे गैंग की गुप्त मार से बचने के लिए अक्सर जंकामंका सर की तुलना कबीर, तुलसी, निराला और रामचंद्र शुक्ल वग़ैरा से करते रहते थे। जो मार्क्सवादी थे, उनकी बैठक में एक ओर मार्क्स दूसरी ओर जंकामंका सर की फ़ोटो लगी रहती थी। जो समाजवादी थे, उनकी बैठक में एक ओर लोहिया तो दूसरी ओर जंकामंका सर की फ़ोटो लगी रहती थी। जो विचारों में घमंजा थे या जिनके पास कोई विचार ही नहीं था उनकी बैठक में इकलौती फ़ोटो जंकामंका सर की लगी होती थी। उदय को इन तस्वीरों को देखकर भ्रम होता कि कहीं जंकामंका सर भी तो दिवंगत नहीं हो गए हैं; आख़िर कबीर निराला, प्रेमचंद वगै़रा की फ़ोटो की जगह जंकामंका सर की फ़ोटो क्यों लगाते हैं, इस शहर के लेखक? कहीं ऐसा तो नहीं कि गंज गोबरहवा को हिंदी का राष्ट्र और जंकामंका सर को उसका राष्ट्रपति घोषित कर दिया गया है? असीम सर से पूछता तो असीम सर बताते कि नहीं-नहीं, तीक्ष्णकंटक धाम से ऐसी कोई धोषणा नहीं हुई है, तुम्हारा भ्रम है। उदय सर, फ़ोटो तो फ़ोटो एक दिन कमलकांत त्रिपाठी के गले में लॉकेट देखकर चौंके। असली सोने का था। चमक रहा था। उदय सर ने जैसे ही लॉकेट की भूरि-भूरि प्रशंसा की, कमलकांत त्रिपाठी ने लॉकेट को खोलकर दिखा भी दिया। एक ओर जंकामंका सर की तस्वीर थी तो दूसरी ओर बल्ली सर की तस्वीर। पूरा शहर जंकामंका सर के नाम की भाँग पी चुका था, गोपिकाओं की तरह जंकामंका सर को अपना सब कुछ मान चुका था। जिस दिन जंकामंका सर उनके सपने में नहीं आ पाते थे, उस दिन बल्ली सर चले जाते थे। कबीर साहित्य संस्थान का प्रमुख सुतुही प्रसाद सिंह और उपप्रमुख झिनकू प्रसाद तिवारी, जंकामंका सर तो जंकामंका, बल्ली सर का भी नित्य दो बार चरणरज लेने लगे थे। चरणरज को ललाट की जगह बाक़ायदा अपने बालों के बीचोबीच माँग में लगाने लगे थे। कह सकते हैं, यह गंज गोबरहवा के साहित्य का चरणरज काल था।
गंज गोबरहवा, सिर्फ़ एक जनपद, सिर्फ़ एक मंडल नहीं, अपने समय और साहित्य-समाज का प्रतिनिधि शहर है। इस तरह भी कह सकते हैं हिंदी के देश और समाज की चित्तवृत्तियों का प्रतिबिंब है। साहित्य की भीरु दुनिया का जीता-जागता अक्स है। साहित्य की यह भीरु दुनिया जो हमारे सामने है, भय की जिस अँधेरी गुफा में है, उससे बाहर नहीं निकलना चाहती है। कभी-कभी लगता है कि उसकी सुंदर देह में पैर ही नहीं हैं, वह आगे बढ़ना ही नहीं चाहती है। हमारे समय का लेखक पढ़े हुए से जिए हुए का सफ़र करना ही नहीं चाहता। पढ़ता है कुछ, जीता है कुछ। वह पढ़े हुए में अपनी ओर से कुछ जोड़ नहीं सकता है और साहित्य में जो जीवन जी रहा है, उसमें बदलाव नहीं ला सकता है। हमारे समय का कवि, साहित्य की मुख्यधारा में बहता हुआ कविता का एक सुंदर शव है। कविता के मिज़ाज में अर्थपूर्ण बदलाव करने और हो रहे बदलाव को समझने और स्वीकार करने की उसे तमीज़ नहीं है। जो सब कर रहे हैं, जैसा सब कर रहे हैं, जैसा ठीक पहले की पीढ़ी के कवियों ने किया, वही उसकी दुनिया है। सच तो यह कि उसकी कोई दुनिया ही नहीं है। ऐसी दुनिया किस काम की, जो किसी काम की नहीं है, नक़ल की नक़ल है। काव्यवस्तु और काव्यभाषा में अपना तो कुछ है ही नहीं। सब उधार का माल है। गंज गोबरहवा का कवि लोक में जाने के लिए साधना नहीं करता है, देश के बाक़ी कवियों की तरह लोकार्पण के ज़रिए लोक में पहुँच जाना चाहता है। अपनी भाषा पर काम नहीं करता है, वैसे भी गंज गोबरहवा के कवियों के पास लिखने के लिए बहुत कम समय होता है, सारा समय तो जंकामंका शास्त्री और उनके गैंग के लोगों को ख़ुश करने में चला जाता है। इन्हें यह नहीं पता है कि कविकर्म की पहली शर्त है, कविता के लिए कठिन तपस्या। एकांत-साधना में रत कवि ही कविता में थोड़ी-बहुत ऊँचाई को छू पाता है। कई बार परिस्थितियाँ किसी कवि को अपने समय में अछूत बना देती हैं, उसे नगर-बहिष्कृत कर देती हैं, उसके सामने एकांत का पहाड़ खड़ा कर देती हैं, जिससे टकराना उसके लिए अनिवार्य हो जाता है। वह एकांत के पहाड़ पर अपना सिर पटक-पटककर रोज़ लहूलुहान करता है। धीरे-धीरे वह अपने एकांत से प्यार करने लगता है। एकांत को अपनी डायरी में दर्ज करने लगता है।
उदय की लाल डायरी, एक लेखक की ख़ून से लिखी गयी डायरी है :
“इस शहर में साहित्य से जुड़े, मेरी उम्र के आस-पास के सात तरह के लेखक हैं; कोई आज भी गीत लिखता है, कोई ग़ज़ल, कोई कविता; कोई लिक्खाड़ तो गीत-ग़ज़ल-कविता अर्थात् तीनों लिखता है... कोई कहानी और उपन्यास, कोई आलोचना, कोई लिखता कुछ नहीं है और लेखक बना फिरता है... अर्थात् अलेखक है। इन लेखकों से कोई तीस-चालीस साल का दोस्ताना रिश्ता रहा है। कभी दोस्तियाँ थोड़ी-बहुत मज़बूत रही हैं, अब तो उतनी भी मज़बूत नहीं रही। घटते-घटते नहीं के बराबर हो गईं। कहना चाहिए कि कभी दोस्त थे, अब नहीं हैं।
ज़्यादातर भूतपूर्व दोस्त जंकामंका शास्त्री के ख़ौफ़ में अब मेरी तरफ़ देखते नहीं हैं। जहाँ-जहाँ मेरे पाए जाने की संभावना होती, वे काला चश्मा लगाकर आते थे। भूल से भी उनकी आँख मेरी ओर चली आए, तो कोई देख न ले, कोई गैंग को ख़बर न कर दे। डुप्लीकेट आचार्य शुक्ल कमलकांत त्रिपाठी तो इधर कुछ दिनों से रात में काला चश्मा लगाकर सोने लगा था कि क्या पता सपने में कोई आँख उदय को देखने न लगे। कमलाकांत त्रिपाठी और डीके सिन्हा दोहरे ख़ौफ़ में रहते थे, एक ओर जंकामंका गैंग का ख़ौफ़, दूसरी ओर मेरा खौफ़ कि मैं अपने किसी लेख में चाहे सोशल मीडिया पर उनके बारे में कोई तल्ख़ बात कह न दूँ! कहने को ये साहित्य की दुनिया में चल फिर रहे थे, लेकिन किसी शव की तरह या नींद में स्वप्न की तरह या जैसे कुछ लोगों को नींद में चलने की बीमारी हो। इनके चेहरे पर पहले वाली बात नहीं रह गई थी। इनके चेहरे पर साहित्य का नैसर्गिक रंग मद्धिम पड़ गया था। इनका साहित्यिक मुख मुरझा गया था।
एक दोस्त दीनानाथ त्रिपाठी, जो मेरे ख़ौफ़ में छोटे-मोटे दुश्मन बन चुके हैं, मुझे बर्बाद करने की कोशिश में मुँह की खा चुके हैं। अपनी भीतरी जटिलता की वजह से जहाँ तीस साल पहले थे, उससे आगे बढ़ने के लिए कभी सोचा ही नहीं, ऐसे लोगों के साथ फँस गए, जो ख़ुद तो फ़्रॉड करके हिंदी के चाँद पर पहुँच गए और उन्हें एक कमरे में बंद करके चाबी साथ ले गए।
मैं तो अपने सभी दोस्तों को अपनी-अपनी विधा में अच्छा काम करते हुए पहले भी देखना चाहता था, अब भी देखना चाहता हूँ। मेरे ये दोस्त लोग बिना बहादुरी के गोरख, कबीर, फ़िराक़, प्रेमचंद के शहर में बहादुर लेखक के रूप में स्वीकृति चाहते हैं। यह तो मुश्किल है। बहादुरी सीखने की चीज़ नहीं है। आप बहादुर हैं तो शुरू से होंगे, साठ-पैंसठ-सत्तर पार करने के बाद नहीं हो पाएँगे। कुछ भी कर लें, जितना चाहें नाच-गा लें, जंकामंका सर के दरबार में, चाहे हिंदी विभाग में मत्था टेक लें, चाहें देश भर के मठाधीशों और उपमठाधीशों की पालकी ढो लें, एक स्वाभिमानी लेखक के रूप में छवि बनने से रही।
अप बहादुर नहीं हैं, मठों से टकरा नहीं सकते हैं, उनके ख़िलाफ़ छींक भी नहीं सकते हैं, तो कोई बात नहीं, नाम-इनाम के लिए नाक रगड़ने वालों की जगह बहादुर लेखकों के साथ रहिए। आप मुझसे इस बात से ख़फ़ा हैं कि मैं बहादुर क्यों हो गया, तो मेरी जगह दूसरे बहादुर लेखक को ढूँढ़ लीजिए। किसी बहादुर लेखक की आग से कुछ गर्मी आपके भीतर भी पहुँच जाएगी। अब अपने भीतर आग पैदा करने से डरिएगा भी और बहादुर भी होना चाहिएगा और बहादुर के साथ रहना भी नहीं चाहिएगा, तब तो साहित्य में बहादुरी का दर्जा पाने से रहे।
मज़़हर इमाम का यह शे’र पढ़िए, शायद कुछ काम कर जाए, लेकिन इस उम्र में यह शे’र क्या कोई सवा शेर भी हो तो भी आप लोगों का कुछ नहीं हो सकता है :
तू है गर मुझसे ख़फ़ा ख़ुद से ख़फ़ा हूँ मैं भी
मुझ को पहचान कि तेरी ही अदा हूँ मैं भी
यूँ न मुरझा कि मुझे ख़ुद पे भरोसा न रहे
पिछले मौसम में तिरे साथ खिला हूँ मैं भी
मुझे शर्म आती है कि मैं इन्हीं लागों के बीच से निकलकर साहित्य में चट्टान कर तरह खड़ा हुआ हूँ और ये ज़रा-सी बारिश में ढेले की तरह गलकर विलीन हो चुके हैं। किस मिट्टी के बने थे ये सब। लानत है!”
उदय के लिए यह समय आसान नहीं था, कितना मुश्किल था, कितनी चुनौतियाँ उसके सामने थीं, कितने मोर्चों पर उसे एक साथ लड़ना पड़ता था, मैं और झंकार अक्सर बातें करते थे। उदय की डायरी सिर्फ़ हम दोनों ही नहीं, उदय की श्रीमती भी पढ़ती थीं। उन्होंने शादी के बाद डीएवी कॉलेज से हिंदी में प्राइवेट एम.ए. किया था। विशेष अध्ययन में निराला को लिया था। कुछ आभास उन्हें था कि एक स्वाभिमानी लेखक के जीवन में मुश्किलें आती हैं। सच तो यह कि उषा जी उदय के जीवन में उसकी कमज़ोरी नहीं, शक्ति बनकर आई थीं। मैंने एक दिन उषा जी से पूछा था कि आपको उदय मे कौन-सी चीज़ सबसे अच्छी लगती है? तो उनका जवाब मुझ पर हिमालय पर्वत जितना भारी था, उन्होंने मुस्कुराकर कहा, काश! हिंदी के हर लेखक की पत्नी ऐसा कुछ कह पाती, संटी बाबू! मैं आपके दोस्त की वीरता से प्रेम करती हूँ। वह लेखक कैसा लेखक है, जिसमें वीरता का एक कण भी न हो। कोई पत्नी किसी लिजलिजे लेखक पति को पाकर जीवन में कैसे ख़ुश रह सकती है, मैं नहीं जानती। शायद उनकी पत्नियाँ एक लेखक के रूप में उनके लिजलिजेपन को जान नहीं पाती होंगी! किसी लिजलिजे लेखक के रूप में जीवन में हज़ार समझौते करने वाले लेखकों की किताबों को उसके पाठक पढ़ कैसे लेते है, संटी बाबू, मेरे लिए यह भी एक रहस्य है। मैंने उषा जी को उदय की शक्ति बनते देखा था। उदय के दुख को अपने स्पर्श से छू-मंतर करते देखा था।
उदय शुरू के वर्षों में कई बार विभाग से शाम को लौटता था तो सिरदर्द कर रहा है, कहकर बिस्तर पर निढाल ढह जाता था। सिरदर्द भी ऐसा-वैसा सब जैसा नहीं होता था। बल्ली और हौदा विभाग से निकलते ही पीछे से उसके दिमाग़ में घुसकर दिमाग़ की शिराओं को कुतरने लगते थे। दर्द से माथा फटा जाता था। उषा जी चाय लेकर आतीं और उदय को हाथ पकड़कर उठातीं। उदय का दर्द अपने स्पर्श से आधा तुरत हर लेतीं। चाय के बाद पूछतीं, सिर पर तेल रख दूँ। उदय चुप रहता और उषा जी, उदय के मौन को पढ़ लेतीं। जड़ी-बूटियों से निर्मित सुगंधित और ठंडा तेल, उदय के सिर पर रखकर बालों में अपनी उँगलियाँ ऐसे फिरातीं कि बालों की जड़ों से होते हुए उदय के सिर में घुसकर शिराओं को कुतरने वाले हिंदी के चूहे छू-मंतर हो जाते थे।
उन दिनों सभी हिंदी विभाग सामंती पद्धति से चलते थे। उसकी चक्की के दो पाटों में से एक को शोषण कहते थे और दूसरे को क्रूरता। सरकारी दफ़्तरों की तरह वहाँ बड़े अधिकारी से लेकर छोटे कर्मचारी तक, सब दस बजे नहीं आते थे। विभागाध्यक्ष दुपहर बाद अपने घर से निकलते थे। एक बजे के बाद, कभी दो बजे के बाद विभाग पहुँचते थे। अन्य वरिष्ठ आचार्यों की कक्षाएँ भी 12:20 पर या 1:10 से शुरू होती थीं। जबकि निचले क्रम के प्राध्यापक सुबह नौ बजे से जोत दिए जाते थे और दो बजे तक उनकी कक्षाएँ ख़त्म हो जाने के बाद भी उन्हें पाँच बजे के आस-पास विभागाध्यक्ष के उठने तक विभाग में बैठे रहना पड़ता था।
उदय को परेशानी यह थी कि उसे और दूसरे निचले क्रम के प्राध्यापकों को विश्वविद्यालय परिसर से सटे आवासीय परिसर में बने आवास का आवंटन नहीं हुआ था, बाहर किराये के मकानों में रहते थे। कोई आठ किलोमीटर दूर, कोई दस किलोमीटर दूर। शहर की सड़कों पर अवैध अतिक्रमण की वजह से और सुबह छोटे बच्चों के स्कूल की बसों और अपने दफ़्तर के लिए भागने वाले लोगों की भीड़ की वजह से आठ किलोमीटर का रास्ता तय करने में एक घंटे से भी ज़्यादा वक़्त लग जाता था। बच्चे छोटे थे, उषा जी को पहले उन्हें तैयार करना, उनका टिफ़िन बनाकर देना और बस में बैठाना जैसे कई काम होते थे। ज़ाहिर है, ऐसे में कभी-कभी उदय को हफ़्ते में दो-तीन दिन बिना कुछ खाए-पिए निकलना पड़ता था। वरिष्ठ आचार्य भोजनोपरांत लोटपोट करके आराम से निकलते थे, जबकि उनके आवास से विभाग का रास्ता पैदल पाँच मिनट का था। उदय अक्सर कहता कि इसे बदला जाना चाहिए। सिर्फ़ उदय चाहता कि विभाग की सूरत बदले। शहर की सूरत बदले। रात-रात भर बिजली नहीं, नींद नहीं और सुबह से ही शहर की हालत ख़राब।
उदय ने अख़बार ‘भरोसा’ के अपने कॉलम में पिछले दिनों इस शहर के बारे में ठीक ही लिखा था : “यह शहर, आधा जागता रहता है, आधा ऊँघता। घंटे, दिन, महीने और पूरे साल, आधा बोलता हुआ, आधा चुप। आधा हँसता हुआ, आधा खीझता। आधा गाता हुआ, आधा उदास। आधा उम्मीद पैदा करता हुआ, आधा बेचैन। आधा दिमाग़ी बुख़ार से तपता हुआ, आधा पीलिया से हलकान। आधा करवट लेता हुआ, आधा औंधे मुँह लेटा। आधा किसी के प्यार में डूबा हुआ, आधा अपने आपसे झगड़ता। आधा चकित और आधा नाराज़ करता हुआ यह शहर दो हज़ार चार को दो हज़ार पाँच में ऐसे हौले से बदलता है, गोया कोई सीधी-सी दुल्हन किसी सयाने के गले में वरमाला डाल रही हो। कोई नौजवान अपने रैकेट से सहसा दूसरे पाले में चिड़िया कर रहा हो। जैसे एक मासूम बच्चा गाड़ियों, रिक्शों और साइकिलों के रेले में दौड़ कर सड़क पार कर रहा हो। जैसे आंदोलनकारियों का कोई हुजूम अचानक रेल की पटरी पर लेट कर इंजन रोक दे रहा हो। जैसे कोई किसी को ख़त भेज रहा हो, फ़ोन कर रहा हो, कहाँ हो तुम संभावना सिंह, किस हाल में हो, दो हज़ार चार के ऐसे अंत और दो हज़ार पाँच के ठीक शुरू के बेहद कठिन पाटों के बीच? मुझे क्यों याद आ रही है तुम्हारी और वह भी बहुत शिद्दत से? अचानक पचास के आस-पास, क्यों आकर खड़ी हो गई हो मेरे सामने? आ ही गई हो तो देखो यह शहर और शहर का आस-पास किस तरह दो हज़ार चार में प्रेम का आगार स्त्री के संग हिंसा पर उतारू है। नहीं-नहीं सब नहीं। कुछ ही होते हैं जो पूरे समुदाय को कलंकित करते हैं। किसी स्त्री को सरेआम निर्वस्त्र किया जाता है। किसी का नौकरी के नाम पर हर तरह का शोषण, कई गाँव की महिलाओं को टोनहिन घोषित किया जाता है तो कुछ दहेज की भेंट चढ़ा दी जाती हैं। अफ़सोस यह कि महिला अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले तमाम संगठन स्त्री-हिंसा का विरोध करने की जगह चुप रहते हैं। अलबत्ता ‘आज के समय में स्त्री’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी ज़रूरी विमर्श की शुरुआत करती है। स्त्री के संग हिंसा के विरोध में कुछ लेखक और विचारक वक्तव्य तो देते हैं, पर यह मुद्दा राजनीतिक दलों के एजेंडे पर नहीं आ पाता। दरअस्ल, दो हज़ार चार इस शहर के लिए चुनाव और चुनाव से जुड़ी गतिविधियों का साल रहा है। चुनाव में भी व्यक्तियों का प्रभाव बढ़ने और पार्टियों का प्रभाव घटने का समय। सरकारें अपनी जनता की अनदेखी कर सकती थीं, लेकिन तीक्ष्णकंटक धाम नहीं कर सकता था। बड़े महाराज जी के उत्तराधिकारी छोटे महाराज स्वामी चिन्मयानंद जी महाराज पहली बार लोकसभा में पहुँचकर इस जनता की आवाज़ बनने के लिए, अपनी अध्यात्मिक शक्तियों के बावजूद राजनीतिक शक्ति की साधना करते हैं। न सिर्फ़ लोकसभा का चुनाव जीतते हैं, बल्कि एक लाख से भी अधिक मतों से जीत कर साबित करते हैं कि जनता का विश्वास और काम पार्टी से भी बड़ी चीज़ है। पूर्वांचल में जहाँ भाजपा कमज़ोर प्रदर्शन करती है, वहाँ चिन्मयानंद जी महाराज एक ताक़तवर और क़द्दावर नेता के रुप में उभरकर सामने आते हैं। गंज गोबरहवा-फ़ैज़ाबाद खंड स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के प्रत्याशी का पाँचवें स्थान पर रहना, जहाँ पार्टी की दयनीय स्थिति को ज़ाहिर करता है; वही निर्दलीय प्रत्याशी डॉ. आर.डी. सिंह की जीत चिन्मय बाबा के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव का बढ़-चढ़कर बखान करती है। देखना यह है कि हिंदुत्व और विकास के एजेंडे के साथ स्त्री के संग हिंसा का प्रबल विरोध और सामाजिक मेल-मिलाप की भावना तथा दूसरी जन-समस्याएँ चिन्मय बाबा के एजेंडे में कब और कैसे शामिल होती है। दो हज़ार चार ने गंज गोबरहवा को केंद्रीय सरकार का एक कैबिनेट मंत्री भी दिया है। देखना यह है कि कैबिनेट मंत्री स्वर्गीय रामबहादुर सिंह ने जितना इस क्षेत्र के लिए किया, उसकी तुलना में नए केंद्रीय मंत्री कितना कुछ कर पाते हैं। उम्मीद यह भी की जानी चाहिए कि महावीर प्रसाद अपनी तरफ़ से तो पूरी कोशिश करेंगे ही कि कुछ बेहतर कर सकें। बीता साल बिजली की भयंकर क़िल्लत और इस क़िल्लत से निजात के लिए तूफ़ानी जनांदोलन का साल रहा। तीक्ष्णकंटक धाम के आशीर्वाद से जीते नगर विधायक कृष्णानंद ने इस जनांदोलन का नेतृत्व किया। चिन्मय बाबा ने मेडिकल कॉलेज के मुद्दे पर अपनी आवाज़ बुलंद की। ज़ाहिर है कि राजनीति की दुनिया में विपक्ष और सत्ता-पक्ष के कार्य और व्यवहार के अपने-अपने तरीक़े होते हैं। अभी हाल में जब शहर पूरी तरह पीलिया के ख़ौफ़ में थर-थर काँप रहा था। अनेक मौतों के बाद जब विपक्ष और सत्ता-पक्ष के नेताओं की भृकुटि टेढ़ी हुई, तब कहीं जाकर नगर निगम का स्वास्थ्य-विभाग चेता। स्वास्थ्य और जलकल से जुड़े लोग एक दूसरे पर ज़िम्मेदारियाँ मढ़ते रहे और बार-बार टूटी पाइपलाइनों से मल-प्रवाह की वजह से पीलिया का रोना रोते रहे। वे यह भूल गए कि पाइपलाइनों के रख-रखाव और मरम्मत का काम भी उन्हीं का है।
कोई जापानी बुख़ार कहता है, कोई नवकी बीमारी, कोई महामारी, कोई दिमाग़ी बुख़ार... यह पूर्वांचल का एक ऐसा बुख़ार है जो कई सालों से इस अंचल से, इस बुद्ध प्रदेश के माथे से कभी उतरा ही नहीं। हर साल की तरह बीता साल भी पूर्वांचल, पश्चिमी बिहार और नेपाल की तराई के हज़ारों दुधमुँहे बच्चों के असमय काल के गाल में समा जाने का साल रहा है। यह नई-नई माँओं की गोद सूनी करने और उनके महाविलाप का साल रहा है। लंबी कविता ‘जापानी बुख़ार’ इस बुद्ध प्रदेश अर्थात् पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिम बिहार की माताओं का शोकगीत है :
हे बाबा
किसका है यह
जो अभी-अभी था
और इस क्षण नहीं है
जिसके मुखड़े के बिल्कुल पास
बिलख रहे हैं परिजन और स्वजन
राहुल-राहुल कहकर
किसका है यह नन्हा-सा
राजकुमार
जिसे अपनी छाती से लगाए
चूमती जा रही है बेतहाशा
एक लुटी-लुटी-सी बदहवास युवा स्त्री
जिसकी पथराई आँखों से झर रहे हैं
आँसू
झर-झर-झर
कौन है यह
अटूट विलाप करती हुई
अभागी कोमलांगी
जिसे अड़ोस-पड़ोस की बुज़ुर्ग औरतें
चुप करा रही हैं—
यशोधरा-यशोधरा कहकर
यह किसकी यशोधरा है बाबा
किसका है राहुल यह
ढाई हज़ार साल बाद
यह कैसी पटकथा लिख रहा है
काल
कपिलवस्तु के एक-एक गाँव में
कपिलवस्तु के बाहर गाँव-गाँव में
फूस की झोपड़ियों
और खपरैल के कच्चे-पक्के मकानों में
इक्कीसवीं सदी के एक-एक राहुल को
चुन-चुनकर
कैसे डँस लेता है काल
मच्छर का रूप धर कर
क्या पहले भी मच्छर के काटने से
मर जाते थे कपिलवस्तु के लोग
क्या पहले भी धान के सबसे अच्छे खेतों में
छिपे रहते थे ज़हरीले मच्छर
और देखते ही फूल जैसे बच्चों को
डँस लेते थे ऐसे ही
जापानी बुख़ार
जापानी बुख़ार
कह-कहकर...
दिमाग़ी बुख़ार इस अंचल की नई महामारी है, तो सड़कों का जाम गंज गोबरहवा का नया महारोग। शहर के क़दम-क़दम पर जाम के आगे नेताओं के राजनीतिक जाम फेल हैं। छोटे-छोटे बच्चे चाहे माँ की गोद में हो या लोवर के जी की क्लास में, शहर की जिस सबसे ख़ूबसूरत चीज़ से उनका परिचय पहली बार होता है, यक़ीन करे कि वह यही जाम है। यह जाम कई लोगों की जिंदगी जाम कर देता है। पेट्रोल और डीजल के भयानक धुएँ के बीच नन्हे-नन्हे फेफड़े इस शहर में रहने के गुनाह की सज़ा पा रहे हैं। शायद इस शहर के नेताओं के गुनाह की या पुलिसवालों के गुनाह की? शायद सरकार के गुनाह की? जाम ने शहर के हर ख़ास और आम और बाहर से आने वालों को जाम कर देता है। जाम के बीच जो जंग छिड़ी रहती है, उसमें से निकलने वाले हर आदमी की ज़ुबान पर फ़ैज़ होते :
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले जिस्म-ओ-जाँ बचा के चले
फिर वही सवाल, कहाँ है, सरकार?
बीता साल इस शहर में भोजपुरी फ़िल्मों और कैसेटों की बाढ़ का साल रहा है। बुरा यह नहीं, बल्कि यह भोजपुरी के नाम पर इस अंचल की संस्कृति की एक फूहड़ और अश्लील छवि पेश की जा रही है। अब मोहम्मद ख़लील के गाए ‘कवने खोतवा में लुकईलू अहिरे बालम चिरई...’ जैसे हदयस्पर्शी निर्गुण लोकगीत नहीं सुनाई पड़ते हैं, बल्कि कॉलेजवाली और बग़लवाली और पलाई टूटे... जैसे गंदे गीतों की भरमार है। पारंपरिक लोकगीतों की मिठास और उनका सौंदर्य बीते ज़माने की चीज़ बनता जा रहा है। जैसे पूर्वांचल को राज्य बनाने के लिए कई लोग आवाज़ उठा रहे हैं। उसी तरह पूर्वांचल की संस्कृति की रक्षा के लिए कुछ लोगों को सन्नद्ध होना होगा। यों भोजपुरी की सोंधी मिट्टी वाली महक से सराबोर अपने शहर में इस साल वैलेंटाइन डे भी मनाया गया और फ़ैशन-प्रतियोगिताएँ भी हुईं। दुर्गापूजा की धूम रही, रामलीला फीकी। बीते साल पर बातचीत और आने वाले साल पर एक नज़र डालने की कोशिश तब तक अधूरी है, जब तक इस शहर के अपराध और साहित्य और शिक्षा पर एक साथ बात न की जाए। दो हज़ार चार में वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. जे.एन. सिंह की हत्या के आस-पास का वक़्त इस शहर के अधिकांश बड़े डॉक्टरों के भयभीत होने और उनकी वजह से पूरे शहर के लिए भय का सबब रहा है। पर एसएसपी की महत्त्वपूर्ण कार्रवाई की वजह से न केवल चिकित्सकों के बीच अमन-चैन लौटा और सामान्य दिनचर्या बहाल हुई, बल्कि आम आदमी में पुलिस के प्रति भरोसा क़ायम हुआ। पर स्त्रियों के कान की बाली और गले के चेन की छिनैती जैसी आम होती घटनाओं की तरह मोटरसाइकिलों की चोरियाँ और लूट भी कहीं आम न हो जाएँ। चोरियाँ सिर्फ़ सामानों की ही नहीं, साहित्य में भी ख़ूब होती रही हैं। दूसरे के हिस्से का यश और महत्त्व और पुरस्कार चुराना एक संगठित अपराध बन चुका है। शिक्षक संघ के चुनाव की माँग को लेकर तीव्र और प्रभावी गतिविधियों का साल रहा है—दो हज़ार चार। बहरहाल, दो हज़ार चार की पीठ पर सवार दो हज़ार पाँच के बेड़े में पाँच हज़ार दो संभावनाएँ सवार हैं।”
कुलपति प्रोफ़ेसर रामचंद्र पाण्डेय की मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी। विश्वविद्यालय परिसर का बच्चा-बव्वा कह रहा था कि प्रोफ़ेसर रामचंद्र पाण्डेय की हत्या की गई है। कुछ लोग जंकामंका गैंग से डरकर इसे ग़ैर-इरादतन हत्या कहते थे। कुछ कहते थे कि कटहल का कोआ खिला-खिलाकर कुलपति की जान ली गई थी। मामला हाई प्रोफ़ाइल था, सो तुरत जाँच का ज़िम्मा तेज़-तर्रार पुलिस इंस्पेक्टर इफ़्तिख़ार ख़ान को सौंपा गया और उन्होंने तफ़्तीश भी शुरू कर दी। इंस्पेक्टर ख़ान मेरे गाँव के थे। शहर में भी मिलना-जुलाना होता था। उन्होंने पाया कि प्रोफ़ेसर रामचंद्र पाण्डेय इतने गोरे थे कि दिन-रात उनका पोतड़ा साफ़ करने वाले जंकामंका गैंग के लोग यह जान ही नहीं पाए ये कि कुलपति जी को पीलिया हुआ है। हौदा, कीट, पतंग और बल्ली वग़ैरा ने बीपी और डायबिटीज के मरीज़ कुलपति जी को रोज सुबह-शाम चाय के पहले कभी मूँग का हलवा, कभी गाजर का हलवा, कभी सूजी का हलवा, कभी जलेबी और दही, कभी भरपेट कटहल का कोआ, कभी कचौरियाँ, कभी डोसा खिलाते थे। किचन में देसी घी के डिब्बे बाज़ार से भी आते थे, लेकिन ज़्यादातर देशी घी हौदा अपने गाँव से मँगवाते थे। कभी ख़ुद अपने गाँव नहीं जा पाते थे, तो प्रोफ़ेसर कीट और प्रोफ़ेसर पतंग, प्रोफ़ेसर हाथी, प्रोफ़ेसर साथी को भेज देते थे। देसी घी में सारी मिठाई बनाने की दुकान चौधरी स्वीट हाउस से भी सामान आता था। कुलपति जी विद्वान्-पंडित तो ख़ैर उतने ही थे जितना हर ऐरा-ग़ैरा प्रोफे़सर हो जाने के बाद हो जाता है, पर जंकामंका गैंग के चापलूसों ने कुलपति जी को तीक्ष्णकंटक धाम से ब्रह्मर्षि की उपाधि भी आने के एक हफ़्ते के भीतर दिलाकर उनकी आँखों पर जंकामंका गैंग की पट्टी बाँध दी थी। कुलपति जी पंडित थे ही, दूसरे विद्वानों की कही गई बातों को भी इस तरह कहते थे कि सुनने वाले उसे उनका कहा समझ लेते थे। कुलपति जी के भाषणों में जितनी ताली अकेले जंकामंका गैंग के सदस्यों और समर्थकों ने बजाई होगी, उतनी ताली कुलपति जी ने अपने जीवन में इससे पहले कभी कहीं नहीं सुनी थी। कुलपति जी को ख़ुशी इतनी मिली कि अपना सब कुछ जंकामंका गैंग को सौंप दिया। इतनी सेवा, इतनी प्रशंसा, किसी के भी प्राण ले सकती थी। जंकामंका गैंग की प्रशंसा इतनी बेजोड़ होती थी कि शहर के डॉक्टरों के यहाँ एनेस्थीसिया के इंजेक्शन कम पड़ जाते थे, तो बोतल में भरकर ले जाते थे और मरीज़ों को सुँघाकर उनका सफलतापूर्वक ऑपरेशन कर देते थे। एक बार की बात है, मेरे एक रिश्तेदार को गालब्लेडर का ऑपरेशन कराना था, डॉक्टर ने उनसे मेरे सामने ही पूछा कि आप इंजेक्शन से बेहोश होना चाहेंगे या प्रशंसा से? मेरे रिश्तेदार उछल पड़े, डॉक्टर साहब आज तक किसी ने मेरी प्रशंसा नहीं की है, मुझे इंजेक्शन से नहीं, प्रशंसा से बेहोश होना है और साहब वे प्रशंसा के दो बोल सुनते ही जितने कम समय में बेहोश हुए, उससे कम समय में इंजेक्शन से बेहोश नहीं होते। कुलपति जी तो रोज़ प्रशंसा की एनेस्थीसिया ले रहे थे। उन्हें कहाँ अपने देह की सुध थी। वे प्रशंसा सुनते ही नहीं थे, खाते भी थे और पूरे शरीर पर मालिश भी प्रशंसा की ही कराते थे। असल में कुलपति होने का मतलब ही था कि एक पैर धरती पर रहे, दूसरा स्वर्ग में। कुछ महिला प्रोफ़ेसरों को जंकामंका गैंग ने कुलपति को ख़ुश करने के काम पर लगा रखा था। बेचारे कुलपति जी को ख़ुशी मिली इतनी कि अपनी तकलीफ़ किसी को बता नहीं पाते थे और बेहोश हो जाया करते थे। चापलूसों को लगता था कि कुलपति जी प्रशंसा के आधिक्य के कारण मूर्च्छित हो जाते थे। फिर वह अपने लोगों से कुछ देर प्रशंसा स्थगित करने के लिए कहते थे।
डॉक्टर आए। जाँच हुई। तब कहीं जाकर पता चला कि पीलिया है। बीमार होने की ख़बर मिली तो कुलपति मैडम मायके से भागी-भागी आईं, लेकन तब तक देर हो चुकी थी। वह कुलपति-निवास में क़दम रख ही रही थीं कि कुलपति जी भगवान् के पास जाने वाली लिफ़्ट में सवार होकर कई मंज़िल ऊपर जा चुके थे। मैडम कुलपति ने दहाड़े मार-मारकर रोते हुए हौदा को देखते ही ग़ुस्से से थर-थर काँपने लगी थीं। तूने यह क्या कर दिया हौदा? तू तो कहता था कि सब ठीक है, माता जी! यही तेरा ठीक था। विश्वविद्यालय का हेल्थ-सेंटर क्या कर रहा था? शहर के सारे डॉक्टर कहाँ मर गए थे! यहाँ से निकल जा नाशपीटे। देखते-देखते मजमा लग गया था। हर कोई कानाफूसी करते हुए एक ही बात कह रहा था कि हौदा साले ने कुलपति रामचंद्र पाण्डेय को मार डाला। लोग दुखी थे कि एक सीधे-सादे और लोगों पर भरोसा करने वाले इंसान की हत्या कर दी गई है। बंगले के वृक्षों-वनस्पतियों, फूल-पत्तियों, सब में दुख की लहर दौड़ गई थी। सबकी आँखों से आँसुओं की धार बह रही थी। सब हौदा की सात पीढ़ियों के लिए बद्दुआएँ दे रहे थे। हौदा इन सब बेकार की बातों से बेख़बर लबर-लबर नाच रहा था। हेल्थ-सेंटर से एंबुलेंस मँगाकर कुलपति जी को बनारस ले जाने की तैयारी कर रहा था। सबसे सीनियर प्रोफ़ेसर मित्तल किंकर्तव्यविमूढ खड़े होकर हाथ बाँधे सिर्फ़ सब देख रहे थे। उनकी श्रीमती भी बाहर ही थीं। अंदर बैठक में हौदा की श्रीमती कुलपति मैडम को सँभाल रही थीं। बंगले से कुलपति जी की असहज और बहुत दर्दनाक विदाई के बाद भी लोग कुछ देर वहीं रुके रहे। उदय और उसके दूसरे विभागों के साथी भी खड़े होकर बंगले की भव्यता पर पसरी मौत की सफ़ेद चादर देख रहे थे। आस-पास लोग चर्चा कर रहे थे कि बीमारी में भी, जब कुलपति अचेत-से थे, उस वक़्त भी तमाम काग़ज़ों पर हौदा और बल्ली ने हस्ताक्षर कराया है।
इंस्पेक्टर ख़ान ने बताया कि वह सिर्फ़ मृत्यु की जाँच कर रहे हैं, आर्थिक अपराध की जाँच, आर्थिक अपराध शाखा के लोग करेंगे। इंस्पेक्टर ने दफ़्तर में चाय पिलाते हुए बहुत दुखी होकर कहा था, यार संटी सुकुल, जब मैं यूनिवसिटी में पढ़ता था, तब तो इतने मादरचोद प्रोफ़ेसर नहीं होते थे, जो अपने फ़ायदे के लिए किसी की जान ले लें। चापलूसी नहीं, उनके व्यक्तित्व से विद्वता टपकती थी। वे बड़े स्वाभिमानी लोग थे, कुलपतियों का चूतड़ नहीं धुलते थे। ये साले हौदा, बल्ली जैसे लोग थोड़े थे। ये साले फिर नए वाइस-चांसलर के आते ही मोहिनी-मंत्र उर्फ़ जंकामंका मंत्र के साथ जुट जाएँगे।
बल्ली और हौदा, सबको दुख देते थे, लेकिन उनके पास उनके अपने दुख भी थे। उनके दुखों की फ़ेहरिस्त कम लंबी नहीं थी। रोज़ नया दुख उसमें जुड़ता जाता था। इन दिनों दुखदाता संप्रद्राय के वे दोनों रत्न इस बात से दुखी रहते थे कि उदय को अख़बार वाले लेखक क्यों समझते थे! उनकी तरह का हिंदी का लल्लू-पंजू क्यों नहीं समझते थे। शहर की समस्याओं पर उदय से कॉलम क्यों लिखवाते थे! ख़ास मौक़ों पर उससे ही क्यों राइटअप लिखने के लिए कहते थे! उन दोनों से क्यों नहीं लिखवाते थे! यह भी कम बड़ा दुख नहीं था कि जंकामंका शास्त्री को व्यास सम्मान मिलने पर उसने राइटअप क्यों नहीं लिखा! अख़बारों ने सिर्फ़ दो कॉलम की ख़बर में जंकामंका शास्त्री के सम्मान को निपटा क्यों दिया! दिल्ली की पत्रिका ने उदय को जंकामंका शास्त्री का इंटरव्यू करने के लिए कहा तो मना क्यों कर दिया! मना किया भी तो इंटरव्यू लेने के लिए उन दोनों का नाम क्यों नहीं सुझाया! अस्ल में उन दुखदाताओं का नब्बे फ़ीसदी दुख अकेले उदय को लेकर था। उदय सिर नहीं उठाता, तो किसमें हिम्मत थी कि उन दोनों को चुनौती देता? इन दिनों पत्रकार भोलानाथ मिश्र, जिन्हें उनके अख़बार के मित्र भाला बाबा कहते थे और शहर के दबंग पत्रकार समझे जाते थे, अपने कॉलम परिसर कथा में अवैध शिक्षक-संघ और उसके कर्ताधर्ताओं की धज्जियाँ उड़ाते रहते थे। बाहर बल्ली, हौदा चाहे जितना हँसते-खिलखिलाते रहें, लेकिन जब भी अपने हृदय के दर्पण में झाँकते, उन्हें अपनी शक्ल की जगह किसी काले चोर की शक्ल दिखती थी और वे दर्पण पर भडकने की जगह डायरेक्ट उदय पर भड़कने लगते थे और दोनों एक साँस में किसी पेड़ के सामने खड़े होकर उदय को माँ-बहन की गाली देना शुरू कर देते थे। कभी-कभी स्वयंप्रसिद्ध आलोचक कमलकांत त्रिपाठी के सामने शुरू हो जाते थे। एक बार तो धुरहुआ उर्फ़ धुरहू प्रसाद के सामने उदय का नाम लेकर गाली देने लगे। उन लोगों को यह पता नहीं था कि जिस धुरहुआ को वे लोग धुरहुआ समझते हैं, उसका कनेक्शन किस-किससे है। बल्ली और हौदा ने जंकामंका शास्त्री के ख़ास घरेलू सहायक धुरहुआ का विकास नहीं देखा था, लेकिन वह तो बल्ली और हौदा सर की नस-नस को जानता था। एक दिन वह मेरे और उदय के साथ हौसला की दुकान पर चाय पी रहा था। यह बताते-बताते कि बल्ली और हौदा आपको माँ-बहन की गाली देते थे, बताना शुरू कर दिया कि जंकामंका सर को ख़ुश करने के लिए ये लोग प्रायः ऊपर छत पर रखी चारपाई पर तरह-तरह का तेल लगाकर जंकामंका सर की मालिश करते थे। मालिश करने के साथ-साथ उदय सर को गाली देते जाते थे। जंकामंका सर हाँ-हूँ करते जाते थे। कभी-कभी ये दोनों बारी-बारी से जंकामंका सर की छत पर रात में नीचे दरी बिछाकर सो जाया करते थे। जंकामंका सर अक्सर पंखे के नीचे नहीं सोते थे। ऊपर तीसरी मंज़िल की छत पर पुरुवा हवा का आनंद लेते थे। एक बार रात में बिजली नहीं थी, नीचे बरामदे में कहीं से भी हवा नहीं आ रही थी। बहुत गर्मी हो रही थी। धुरहू प्रसाद से रहा नहीं गया, तो आधी रात के दरमियान धड़धड़ाते हुए सीढ़ियों से ऊपर छत पर चढ़ गया। सोचा था कि बल्ली सर के पास कोई फटी-पुरानी दरी बिछाकर सो जाएगा। देखा चाँदनी रात पूरी खिली हुई थी। इतनी पूरी कि खड़ा रोआँ भी दिख जाए। धुरहुआ ने अनुभव किया कि पुरुवा हवा झुरुर-झुरुर चल रही थी। चाँदनी जंकामंका सर की चारपाई के ऊपर झुरुर-झुरुर गिर रही थी। धुरहू ने विद्या की क़सम खाकर आगे कहना जारी रखा। ऊपर छत पर सोए बल्ली सर अपनी दरी पर नहीं थे। पुरुवा हवा बड़ी मस्त चीज़ लग रही थी। धुरहू ने अपनी दोनों आँखों से फिर बल्ली सर की ख़ाली दरी को देखा। सामने जंकामंका सर की चारपाई मच्छरदानी समेत ज़ोर से हिल रही थी। पहले सोचा कि पुरुवा हवा की वजह से हिल रही है, लेकिन उसे छत पर देखते ही बल्ली सर मच्छरदानी के अंदर से लुंगी सँभालते हुए निकले और धुरहुआ को धुआँधार माँ-बहन की गाली देने लगे, साले, सर की तेल-मालिश कर रहा था, तुमने आकर डिस्टर्ब कर दिया। धुरहुआ के पास चुपचाप लौट आने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं था। इतनी अच्छी चाँदनी रात थी। इतनी अच्छी पूरी खिली हुई रात बहुत कम होती थी। इतनी अच्छी पुरुवा हवा भी बहुत कम चलती थी, लेकिन उसकी क़िस्मत ख़राब थी। नीचे आकर चुपचाप बरामदे में बिछी अपनी चारपाई पर लेट गया। जंकामंका सर ख़ुद गाली देते तो उसे इतना दुख नहीं होता, लेकिन बल्ली ने उसे गाली देकर अच्छा नहीं किया है। उसकी इज़्ज़त बल्ली से कम थोड़े है। धुरहू ने कहा कि संटी भाई, अज्ञेय जी ने ख़ुद जंकामंका सर के ड्राइंगरूम में मेरे हाथ की बनी हुई चाय पीते हुए मुझे धुरहू जी कहकर धन्यवाद कहा था और दुपहर में मेरे हाथ के भोजन की प्रशंसा की और जाने से पहले मेरी कविता भी सुनी थी और अपनी बकरदाढ़ी हिलाते हुए मुस्कुराकर मेरी कविता की प्रशंसा भी की थी। बल्ली-सल्ली और हौदा-सौदा को किसी बड़े लेखक ने कभी धन्यवाद कहा होगा, उनकी प्रशंसा की होगी? उन लोगों को सिर्फ़ तेल-मालिश करना आता है, गाली देना आता है, मेरी तरह खाना बनाने और कविता लिखने में चैंपियन थोड़े हैं। संटी भाई साहब, मेरे पास कोई डिग्री नहीं है, मैंने भी किसी तरह एम.ए.-पीएचडी कर लिया होता, बल्ली और हौदा नहीं मैं धुरहू प्रसाद प्रोफ़ेसर होता, मालकिन जंकामंका सर से कहतीं, तो मना थोड़े कर पाते। ये नीच बल्ली और हौदा प्रोफ़ेसर थोड़े होते। मैंने इधर धुरहू प्रसाद में ग़ज़ब का आत्मविश्वास देखा था, अब धुरहू जी कुर्ता-पाजामा के ऊपर जैकेट भी पहनने लगे थे। शहर की कवि-गोष्ठियों में जाने लगे थे। अख़बारों में धुरहू प्रसाद का नाम और फ़ोटो वग़ैरा भी छपने लगा था। धुरहू प्रसाद अपनी कविताएँ जंकामंका सर को नहीं उदय सर को दिखाते थे या कभी-कभी मुझे भी सुनाते थे। धुरहू प्रसाद की कविताएँ शहर के कई कवियों से अच्छी होती थीं। ‘नवभारत’ के संपादक पंडिज्जी ने दो बार ‘रविवार्ता’ में धुरहू प्रसाद की कविताएँ छापीं थीं। पंडित जी मुझसे भी कहते थे कि संटी सुकुल, तुम भी कुछ लिखा-विखा करो।
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जारी...
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