बदसूरत औरत की ज़रूरत

अविनाश मिश्र

बदसूरत औरत की ज़रूरत

अविनाश मिश्र

और अधिकअविनाश मिश्र

    उस दुपहर वह हर जगह अपनी नामौजूदगी

    बड़ी शिद्दत से महसूस करती रही

    शाम ढले जब बहुत सारे रास्ते जगमगा उठे

    तब भी किसी पोस्टर में उसने ख़ुद को नहीं पाया

    खोई-खोई-सी वह रात दीवारों के बीच लौट आई

    और अपने सारे कपड़े उतारकर

    अपने बदन को अपने ही हाथों से सहलाते हुए सो गई

    सुबह होने पर जब वह जागी

    वह यह सोचकर ख़ुश हुई

    कि वह किसी और के बिस्तर पर नहीं है

    ...

    हवाएँ खाँसती हुई गुज़रती थीं बदशक्ल कूचों से

    थोड़ा और भीतर धँसने पर

    कुछ ख़त्म किए जाने का बेरहम शोर सुनाई देता था

    जहाँ वह उड़ती हुई पतंगों और दड़बेनुमा मकानों के बीच पैदा हुई

    और धीमे-धीमे अपने सारे ख़्वाब खोकर

    शाम से अँधेरे की तरह हो गई

    यह जानकर भी कि सारे सपने उसमें ही कहीं खोए हैं

    उसने कभी उन्हें ढूँढ़ने की कोशिश नहीं की

    उस वक़्त जब सुंदरता मुक़ाबलों में शरीक हो रही थी

    वह चाहती थी हथिया लेना हर वह प्रसाधन

    जिससे ज़्यादा और ज़्यादा बदसूरत दिखा जा सके

    अपने बलात्कार के हर डर को मुज़्महिल करती हुई

    वह महफ़ूज़ थी अपने बनाए घेरे में

    बसें धूल उड़ाती हुई जाती थीं उसके चेहरे पर

    लेकिन वह चिपकी नहीं रही

    किसी मर्द की क़मीज़ से बटन बनकर

    वह इस तरह थी

    कि बस दर्पण ही देख सकता था उसे वासना से

    रात ही कर सकती थी उससे प्रेम

    स्वप्न ही हो सकते थे उसके प्रति कामुक

    अवसाद ही ले सकता था उसका चुम्बन

    उसके इन बेरंग साथियों के यहाँ

    आँखों से चुनने का कोई दृश्य था

    बहुत कुछ झूठ था उसके लिए

    और सिहरन सबसे बड़ी सचाई ज़िंदगी की

    दुनिया में सब कुछ वैसा ही था :

    कलाएँ, प्रतियोगिताएँ, बलात्कार, विवाह और विज्ञापन

    और वह भी वैसी ही थी :

    आईनों के पहले, आईनों के रहते, आईनों के बाद...

    स्रोत :
    • रचनाकार : अविनाश मिश्र
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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