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हृदय का कवच हो

hriday ka kavach ho

मारिओ बेनेदेत्ती

मारिओ बेनेदेत्ती

हृदय का कवच हो

मारिओ बेनेदेत्ती

और अधिकमारिओ बेनेदेत्ती

    क्योंकि तुम हो मेरे पास और नहीं भी

    क्योंकि तुम हो सोच में निकटतम

    क्योंकि रात बीत जाती है, प्रेम लिए वचन में

    क्योंकि अपने ही चित्र को सँवारती आई हो तुम

    और अपने हर रूप से बेहतर बनकर आती हो तुम

    क्योंकि पाँव से हृदय तक सुंदर हो तुम

    क्योंकि हृदय की गहराई से मुझ तक आती हो तुम

    क्योंकि अहंकार में छुपती भी मिठास से तुम

    छोटी और मीठी

    हृदय का कवच हो।

    क्योंकि तुम मेरी हो

    क्योंकि नहीं हो मेरी

    क्योंकि देखता हूँ तुम्हें और मिट-सा जाता हूँ

    और मृत्यु से भी बदतर है

    नहीं देखना तुम्हें प्रियतम,

    गर देखूँ तुम्हें।

    क्योंकि तुम सदा ही तो रहती हो यहाँ वहाँ हर तरफ़

    पर रहती हो उत्तम जहाँ मैं तुम्हें चाहूँ

    क्योंकि लहू से बने हैं होंठ तुम्हारे

    और शरीर में है तुम्हारे शीतों का कंपन।

    तुम्हें प्यार तो करना ही है प्रियतमा,

    प्यार तो करना है

    चाहे ये घाव, दुखे दो घावों बराबर,

    चाहे ढूँढ़कर भी तुम्हें ना पाऊँ कभी

    और चाहे

    रात बीत जाए.

    तुम हो मेरे पास

    और नहीं भी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 115)
    • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
    • संस्करण : 2006

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