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छाता

chhata

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

निकोला षौप

और अधिकनिकोला षौप

    मेरा जाना है व्यक्ति एक मुझसा ही निपट अकेला है,

    सारे दिन यों ही एकाकी डग पर डग भरता रहता है।

    वर्षा ठहरी, रवि चले और किरणों की अनुपम बेला है,

    फिर भी अपना तना हुआ छाता ले चलता रहता है।

    जाता तभी निकट उसके, हे भलमानस! उससे कहता,

    क्या हुआ तुम्हें, तुम किधर चले, घर कहाँ तुम्हारा है अपना?

    देखो, कैसा है नभ निर्मल, रवि का प्रकाश कब से तपता!

    तुम बंद करो, यह बंद करो, काला विस्तृत छाता अपना।

    लेकिन मैं मौन हुआ उसके पीछे चल पड़ा धूप में ज्यों;

    राहगीर रुक रुक जाते, छिप-छिपकर हँसते जाते।

    सुन पड़ी मुझे उसके भारी-भरकम छाते पर ज्यों,

    मर्मर ध्वनि, अतीत के अतिशीतल झाले पड़ते जाते।

    मैं जाता उसके पीछे-पीछे परछाई पर पड़ता,

    सुनता जाता पग, स्वर उसकी जर्जर लकड़ी का गिरता।

    तभी लगा मुझको, कुछ-कुछ मेरे कंधे पर पर पड़ता,

    अतीत की बीती पीड़ा का बूँद-बूँद सीसा गिरता।

    झड़ी लग गई, मेरे मुकुटक की पंखड़ियाँ मर्मर करतीं,

    झड़ी लग गई, लगी रही, मेरी भी पग-गति छूट गई।

    बढ़ती तेज़ फ़ुहारों में अतीत की पीड़ाएँ झर्झर झरतीं,

    उनमें मेरे मुकुटक की कगर, कगर भी टूट गई।

    मैं सरोबार हो गया, मगर वह मानस, देखो, अनजाना

    छाता लिए शांत जाता, यों अपने घर को चला गया।

    मुझसे धारें बरस रहीं, अरे वो निर्मल दिवस कहाँ जाना,

    मूसल ये धारें बरस रहीं, और मेरा छाता कहाँ गया।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 70)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : निकोला षौप
    • प्रकाशन : हृवाती लेखक संघ, ज़ाग्रेब
    • संस्करण : 1978

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