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दूर नहीं गए

door nahin ge

निकोलाई रेरिख

निकोलाई रेरिख

दूर नहीं गए

निकोलाई रेरिख

और अधिकनिकोलाई रेरिख

    जो काम तुमने शुरू किया

    उसे तुमने मेरे लिए छोड़ा,

    तुम्हारी इच्छा थी कि मैं उसे जारी रखूँ।

    तुम्हें मुझ पर कितना विश्वास है—

    मैं इसे अनुभव कर रहा हूँ

    मैं काम के प्रति सचेत कर रहा हूँ और सावधान

    तुम स्वयं भी तो हमेशा व्यस्त रहे इसी काम में।

    मैं तुम्हारी मेज़ के पास बैठूँगा,

    अपने हाथों में लूँगा तुम्हारी क़लम।

    चीज़ों को मैं उनकी पहले की जगहों में रखूँगा।

    चाहता हूँ कि मुझे उनसे सहायता मिल सके।

    पर जब तुम चल दिए

    बहुत कुछ अनकहा छोड़ गए।

    शोर और कोलाहल सुनाई दे रहा है

    व्यापारियों की खिड़कियों के नीचे,

    घोड़ों की भारी टापें पड़ रही हैं पत्थरों पर।

    सुनाई दे रही हैं पट्टियों की चरमराहट

    और हवा की सीटियाँ छतों के नीचे

    और बंदरगाह के पास पालों की सरसराहट।

    सुनाई दे रही है

    जहाज़ों के लंगर डालने की आवाज़

    और समुद्री पक्षियों की चहक।

    मैं तुमसे पूछ नहीं पाया—

    इन सबसे क्या तुम्हारी शांति भंग नहीं होती?

    या जो कुछ भी जीवंत है

    क्या तुम्हें उसमें प्रेरणा मिलती रही है?

    जितना भी मुझे ज्ञान है

    अपने फ़ैसलों में तुम इस ज़मीन से कभी

    दूर नहीं गए।

    स्रोत :
    • पुस्तक : निकोलाई रेरिख की कविताएँ (पृष्ठ 44)
    • रचनाकार : निकोलाई रेरिख
    • प्रकाशन : रेरिख अध्ययन परिषद, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1995

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