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मौनव्रत

maunavrat

अनुवाद : सुरेश सलिल

शम्सुर्रहमान

शम्सुर्रहमान

मौनव्रत

शम्सुर्रहमान

और अधिकशम्सुर्रहमान

    मेरे उदारहृदय पितामह, कभी देखा नहीं जिन्हें मैंने—

    सुना, कि हमेशा ही वे चुप रहा करते थे बहुत;

    इतना; कि उनकी अंकशायिनी थीं जो,

    उनके संग अपरूप-अंतरंग क्षणों में भी

    खुलकर कुछ कहते-बोलते देखा गया हो उन्हें

    ऐसा कोई सबूत नहीं छोड़ गए मेरे परिवार के प्रधान पुरुष।

    उनके पुत्र; यानी मेरे पिता यदा-कदा मुँह खोलते थे—

    वाक्पटु कभी नहीं माना गया उन्हें।

    और वही मैं, कब से, अत्यंत स्पष्टवक्ता

    वाक्पटुजनों के बीच

    जीभ की जड़ता लिए

    ख़ुद को असहाय महसूस करता रहा हूँ।

    और मेरे बेटे का हाल यह है कि बोलना मानो जानता ही नहीं।

    कैसा मौनव्रत-सा है उसका जीवन!

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 390)
    • रचनाकार : शम्सुर्रहमान
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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