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पहाड़ों में निष्क्रिय है देव

pahaDon mein nishkriy hai dev

ओसिप मंदेलश्ताम

अन्य

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ओसिप मंदेलश्ताम

पहाड़ों में निष्क्रिय है देव

ओसिप मंदेलश्ताम

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    रोचक तथ्य

    यह कविता स्तालिन के बारे में है।

    पहाड़ों में निष्क्रिय है देव, हालाँकि है पर्वत का वासी

    शांत, सुखी उन लोगों को वह, लगता है सच्चा साथी

    कंठहार-सी टप-टप टपके, उसकी गरदन से चरबी

    ज्वार-भाटे-से वह ले खर्राटें, काया भारी है ज्यूँ हाथी

    बचपन में उसे अति प्रिय थे, नीलकंठी सारंग-मयूर

    भरतदेश का इंद्रधनु पसंद था लड्डू मोतीचूर

    कुल्हिया भर-भर अरुण-गुलाबी पीता था वह दूध

    लाह-कीटों का रुधिर ललामी, मिला उसे भरपूर

    पर अस्थिपंजर अब ढीला उसका, कई गाँठों का जोड़

    घुटने, हाथ, कंधे सब नक़ली, आदम का ओढ़े खोल

    सोचे वह अपने हाड़ों से अब और महसूस करे कपाल

    बस, याद करे वे दिन पुराने, जब वह लगता था वेताल

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूखी नदी पर ख़ाली नाव (पृष्ठ 311)
    • संपादक : वंशी माहेश्वरी
    • रचनाकार : ओसिप मंदेलश्ताम
    • प्रकाशन : संभावना प्रकाशन
    • संस्करण : 2020

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