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हाथ पकड़ कर रख नहीं पाया

haath pakaD kar rakh nahin paya

ओसिप मंदेलश्ताम

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ओसिप मंदेलश्ताम

हाथ पकड़ कर रख नहीं पाया

ओसिप मंदेलश्ताम

और अधिकओसिप मंदेलश्ताम

    हाथ पकड़ कर रख नहीं पाया तुझे मैं अपने साथ

    नमकीन-कोमल होंठों से तेरे किया विश्वासघात

    अक्रोपोल में बंद मुझे अब सुबह का इंतज़ार

    गंधाते इन काष्ठ-क़िलों से नफ़रत मुझे अपार

    रात अँधेरी, चढ़ा रहे वे अपने घोड़ों पर साज़

    करेंगे हमला आज रात वे, अखेई के जाँबाज़

    रक्तपात यह बंद नहीं होगा, जारी है षड्यंत्र

    नामलेवा तक कोई नहीं बचेगा, नया होगा तंत्र

    कैसे मैंने सोच लिया यह—एक दिन लौटेगा तू?

    मैं अलग हुआ क्यों समय से पहले, कैसा हूँ बुद्ध?

    अभी दूर हुआ अँधेरा, मुर्ग़ा अभी बोला नहीं

    चूल्हा अभी जला नहीं है, दूध अभी खौला नहीं

    रात प्राचीरों पर अश्रु-सी, उभर आईं झीनी बूँदें

    औ' नगर महसूस करे, कोई काठ-पसलियों को खूँदे

    बह निकला उन सीढ़ियों पे रक्त, बाढ़-सा धारों-धार

    'औ' जाँबाज़ों ने देखी फिर, वह मोहक छवि तीन बार

    कहाँ है ट्राय? कहाँ नृपति? कहाँ है कन्या-घर?

    बया घोंसले-सा प्रियाम का नष्ट हो जाएगा विवर

    हम पर जारी है तीरों की वर्षा भयावह लगातार

    औ' शँकु-सी उगे धरती पर, बाणों की रौद्र कतार

    बचे सितारों को बुझा रहे अब, तीखे़ तीरों के वार

    अबाबील-सी सुबह सलेटी, झलके खिड़की में, यार

    दिन धीमे से जगा फूस में, खुला, उन्मुक्त, आज़ाद

    हिल-डुल रहा वह अलसाया-सा, लंबी नींद के बाद

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूखी नदी पर ख़ाली नाव (पृष्ठ 304)
    • संपादक : वंशी माहेश्वरी
    • रचनाकार : ओसिप मंदेलश्ताम
    • प्रकाशन : संभावना प्रकाशन
    • संस्करण : 2020

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