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एक राजा ने सिंहासन त्याग दिया

ek raja ne sinhasan tyaag diya

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

दुब्राव्को हौर्वातिच

दुब्राव्को हौर्वातिच

एक राजा ने सिंहासन त्याग दिया

दुब्राव्को हौर्वातिच

और अधिकदुब्राव्को हौर्वातिच

    एक राजा ने सिंहासन त्याग दिया। अपने महल छोड़ दिए,

    सामंतों से गले मिल विदा ली और घने जंगल में चला गया। अब वह

    समारोहों में उपस्थित था शिकार पर, अब वह जीवितों और मृतकों

    को दंड देने के लिए वहाँ नहीं था। नाले के किनारे झोंपड़ी में रहता,

    शहद और फल खाता, चिड़ियों को उड़ना निहारता। वह राजा।

    लेकिन उसकी प्रजा किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई थी। रातें जाग-

    जागकर लोग सोचते रहे कि राजा ने क्यों राजपाट छोड़ दिया। ऐसा

    क्या उन्होंने किया जिससे राजा अप्रसन्न हो गया? वे उसके पास दूत

    भेजने लगे, निष्ठा की सौगंधें खाईं, दया की भीख माँगी।

    परंतु राजा को तो लगन लग गई थी कि फलों के पेड़ लगाए,

    पहाड़ी पानी पीए। वह कुछ अधिक ही राजा बन गया था, अब क्या

    राज्य करता।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 182)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : दुब्राव्को हौर्वातिच
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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