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काठमाण्डू

kathmanDu

बिभा विमर्श

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काठमाण्डू

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    मन्दिरक नगर कहय जाय बला अपन शहर

    काठमाण्डूमे

    ढनमनायल काष्ठमंडप सभकेँ देखैत

    बरमहल हमर मोनमे

    उठैत अछि यक्ष प्रश्न

    कतय छथि हमर नगरक इष्टदेव पशुपतिनाथ

    की आब देखितो छथि एहि नगरकेँ

    आकि चलि गेलाह नंदी संग हिमालक माथिपर

    किंवा, सहास नहि छनि आब एतुक्का हेंच-पेंच

    तेँ बढ़ा लेने छथि आइ-काल्हि अपन डोज

    धुर बौराहबा, एहुना कियो बिसरैत अछि

    अपन गाम

    अपन सखा संतान

    स्वयंभू पुराणमे

    हमर काठमाण्डू, एकटा विशाल सरोवर छल कहियो

    नागदह मंजुश्रीक कथा

    बसल अछि लोकक ठोरपर

    मुदा आइ ताही शहरमे

    अपन आँचरसँ नगरक पाप झपैत

    बागमती मैया

    मरणासन्न भेल छथि अनेक ठाम

    जाहि पानिक गंधसँ पड़ाइत हुए लोक

    ताहि पानिमे

    कोना विहार करैत होयत बागमती

    राजा-मंत्री-संत्री-खड़यंत्री

    सभकेँ बेरा-बेरी देखलक शहर

    आब फेरसँ देखैत अछि हमरा-अहाँ दिस

    जँ एहि उमेदक आँखिकेँ

    अपन आँखिमे बसा ली हम-अहाँ

    तँ फेरो घुरबे करताह पशुपति नाथ

    बागमती मुस्कियाइत अबस्से बहती निर्विकार

    एहि अजब नगरक प्रथा सेहो गजबे

    शंखक तानसँ टूटैत अछि जाहि शहरक निन्न

    से शहर

    सुरुज अस्त होइत भऽ जाइत अछि मस्त

    हमरा फेरोसँ मोन पड़ैत अछि

    लाल कक्काक कहल पॉपुलर डायलॉग

    सूर्य अस्त, काठमाण्डू मस्त...!

    स्रोत :
    • पुस्तक : नहि सीता नहि (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 69)
    • रचनाकार : बिभा विमर्श
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2023

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