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जँ सरिपहुँ रचबाक हो

jan saripahun rachbak ho

ललितेश मिश्र

ललितेश मिश्र

जँ सरिपहुँ रचबाक हो

ललितेश मिश्र

और अधिकललितेश मिश्र

    हत होयबासँ पहिने

    हे हमर हतभागिनी कविता

    गाउ कोनो राग

    कोनो भनिता...

    नहि बाँचत आब अहाँक

    अस्तित्व मर्यादा!

    सत्येक सप्पत लऽ

    घोषित कऽ देलहुँ अछि

    हमरालोकनि स्वयं के आब

    सत्यक हत्यारा।

    थोड़बे रास सुख-सुविधा लेल

    ‘असत्यमेव जयते’क

    सभ केओ

    दऽ रहल अछि गगनभेदी नारा...

    एहि अकाल बेलामे

    असंभव बनल उजासक मेलामे

    जँ रचबाक हो कोनो राग, कोनो देश

    तँ उतारू बन्धु अपन अमानवीय

    छोटका-बड़का भेष

    जाफना सिंध बनैत अपन आँगनमे

    झहरय दिऔक मौलश्री सिंगरहार

    अणु-आयुध नहि होयत रक्षा कवच

    खसय दिऔक सद्भावपूरित

    हमर-अहाँक आँगनमे शीत जलक ढार

    जँ सरिपहुँ रचबाक हो

    कोनो देश, कोनो राग।

    स्रोत :
    • पुस्तक : ई-मिथिला
    • संपादक : बालमुकुन्द
    • रचनाकार : ललितेश मिश्र
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए अनुवादक द्वारा चयनित।
    • संस्करण : 2020

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