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अन्हरिया भागी कइसे

anhariya bhagi kaise

कृष्णानन्द कृष्ण

कृष्णानन्द कृष्ण

अन्हरिया भागी कइसे

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    देखीं परिवर्तन के कइसन हवा बहल बा

    आपन होई राज नगाडा सगरो बाजल

    जात-पात के धारा में सब लोग दहल बा

    जीत मनावल लोग, इहाँ पर लँगटे नाचल।

    आपन जान, बनवले रहीं जेकरे राजा

    सब मिरियास हड़प देखीं कइसे बइठल बा

    दरत मूँग छाती पर बइठ बजावे बाजा

    सीधे मुँह ना बात करे कइसन अइंठल बा।

    एह दुनिया में अवसरवादी लोग भरल बा

    पहिर मुखौटा किसिम-किसिम के खूब ठगत बा

    उपर से चिक्कन, भीतर में भरल गरल बा

    भरल प्रपंची, पाखंडी से इहाँ जगत बा

    मिल के करीं बिचार अन्हरिया भागी कइसे

    जात-जमात मिटाई घर-घर ईस्सर पइसे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आपन गाँव भेंटाते नइखे (पृष्ठ 28)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2012

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