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अपने-अपने झोले : अपने-अपने प्रेमचंद

फिर इलाहाबाद। तारीख़ें 22, 23, 24 और 25 फ़रवरी। चुनी हुई जगह—हिंदुस्तानी अकादेमी का सभागार, सन् 1981

वे अपनी बलिष्ठ भुजाओं पर बल्ले उभारते, मूँछें मरोरते, ताल ठोंकते, शक्ति-प्रदर्शन के तमाशबीनों को बटोरते, अखाड़े में हर तरह के दाँव-पेंच दिखाते हुए अपने-अपने झोलों में ‘प्रेमचंद’ को भरने लगे। कभी उनकी झोली छोटी पड़ती थी—कभी प्रेमचंद झोले में अपनी घुटती साँस की वजह से ख़ुद ही बाहर निकलकर भागते। वे फिर दौड़कर बेकस प्रेमचंद को पकड़ते, उन्हें आगे करके अपने तके हुए विरोधियों पर गोलियों की बौछार करते, फिर अपने बौद्धिक विलास के करतब दिखाकर दर्शकों से तालियाँ बजवाते, क़हवा और नाश्ते की तश्तरियों पर टूट पड़ते। यही क्रम बारंबार लगातार चार दिन सुबह-शाम।

इस तरह प्रेमचंद शताब्दी समारोह का अंतिम दौर प्रयाग विश्वविद्यालय में हिंदी-उर्दू विभाग के सम्मिलित प्रयास और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की सहायता से—तमाम गड़े मुर्दों को उखाड़कर एक बार ‘ममी’ की नुमाइश की तरह सजा गया।

पाँच गोष्ठियों… तथा एक उद्घाटन और एक समापन में फैला हुआ यह आयोजन प्रायः जाने-बूझे विचारों को नए भाड़े-भत्ते के फ़्रेम में रखने की कोशिश जैसा बनकर रह गया। हिंदी साहित्य की मान्य नामावली प्रायः मंच पर थी। उद्घाटन भाषण अज्ञेय का था। समापन किया जैनेन्द्र कुमार ने। बीच की बहस नामवर सिंह ने चलाई। अलबत्ता अज्ञेय के उद्घाटन भाषण में प्रेमचंद के बारे में कुछ नए सिरे से बातें उठाई गईं...

एक तो उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का बुनियादी मूल्य संघर्ष नहीं, बल्कि संवेदना या महाकरुणा है। प्रेमचंद को सिपाही की तरह देखना ग़लत है। वह वस्तुतः एक ‘जागृत आत्मा’ थे। योद्धा पिछड़ सकता है, किंतु जागृत आत्मा से कुछ छूटता नहीं।

उनकी दूसरी स्थापना थी कि प्रेमचंद ने एक नई मूल्य-दृष्टि दी, जिसे उन्होंने नैतिक यथार्थवाद कहा।

तीसरी बात : किसी रचनाकार की एक यह भी कसौटी होती है कि वह कितने पात्र जातीय-स्मृति में छोड़ जाता है। प्रेमचंद के पात्र इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। प्रेमचंद पात्र ‘गढ़ते’ नहीं, उन्हें ‘प्रस्तुत’ करते हैं।

चौथी बात कि भारतीय समाज अपनी जटिलताओं के बावजूद इकहरा है। प्रेमचंद उसी इकहरी अभिव्यक्ति के लेखक हैं।

पाँचवीं बात प्रेमचंद की विरासत को लेकर थी, जहाँ उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि दूसरे की संपत्ति को अपना बना लेने की ‘ललक’ में अक्सर लोग उन्हें अपनी ‘खत्ती’ में डाल लेने की कोशिश करते रहते हैं। प्रेमचंद इस सबसे बड़े हैं।

बहस उठाने के नाम पर नामवर सिंह ने प्रेमचंद की दृष्टि और कला-रचना का प्रवर्तन करने के बजाय अपने भाषण का तीन-चौथाई हिस्सा केवल अज्ञेय बनाम मार्क्सवाद की पुरानी और नई दलीलों को दोहराने में लगा दिया। प्रेमचंद को ‘खत्ती’ में डालने वालों के सिलसिले में उन्होंने किसान रैली की राजनीति का भी हवाला दिया। बहस में उनको ‘महाकरुणा’ भी एक तरह का षड्यंत्र लगने लगी। जगदीश गुप्त ने अपराध और अपराधी के प्रति कलाकार की दृष्टि और उसके विवेक पर आग्रह किया। लेकिन तब तक गोष्ठी का माहौल ऐसा बन चुका था, जहाँ सारी बहस मार्क्सवाद के नाम पर लेखक को पार्टी लाइन देने और उन्हें हाँककर एक बाड़े के अंदर ले जाने की फूहड़ कोशिशों में बदल गई। हस्बमामूल अनेक लेखकों को ‘अमेरिका से पैसा पाने वाले’ और एक ख़ास गुट को ‘महान् जनवादी’ लेखक कहने वालों की जेबों से नामों की घिसी-पिटी फ़ेहरिस्तें निकलीं; जो वस्तुतः इनके चौखटे से अलग होकर कथा-माध्यम को अपनाते रहे हैं, उनके नामों का छूट जाना या उनकी भर्त्सना होना अचरज की बात नहीं थी।

इस तरह के जोशीले गर्मागर्म भाषणों में जब सोचने पर दिमाग़ी नियंत्रण ढीला होने लगा, तब कुछ रोचक मुद्दे और नई सोच के उदाहरण सामने आए। मसलन :

सिंह बंधु (संगीत-जगत् की ही तरह साहित्य-जगत् में भी जुगलबंदी—नामवर सिंह और काशीनाथ सिंह) की धारणा थी कि प्रेमचंद को अस्वीकृत कराने का काम बड़े ही ‘सुनियोजित’ ढंग से परिमल आंदोलन ने किया।

जिन लोगों ने प्रेमचंद को अस्वीकार कराया और जिन्होंने तमाम विदेशी लेखकों की विचारधारा को हिंदी में आयात करके उसे ‘भ्रष्ट’ किया, वे सब अंततः उत्तर प्रदेश में किसानों की दुनिया छोड़कर महानगरों में भाग गए!

तब इलाहाबाद की ज़ेहनियत और समझ वही थी, जो उस वक़्त नई दिल्ली के नाम पर विकसित हो रही थी।

आज का नया कथा-लेखक ‘लेफ़्ट हॉरर’ के आतंक में रच रहा है। आदि-आदि।

श्रोताओं को एक बात यह भी समझ में आई कि बिना अँग्रेज़ी समझे न तो प्रेमचंद को समझा जा सकता है और न प्रेमचंद पर बोलने वालों को। अँग्रेज़ी किताबों का हवाला और अँग्रेज़ी शब्दों की बहुलता हिंदी चिंतकों की विडंबना को ही रेखांकित करती है। बहस का दुःखद हिस्सा युवा वर्ग की स्वतंत्र समझ या सोच के अभाव का था। कुछ तो जोशीले वातावरण में फँसकर सिर्फ़ नारों और चलताऊ मुहावरों को पकड़कर वही बातें कहते रहे, जो बहुत पहले से कही जा रही हैं। वह जब अपनी बात करता है, तो संभवतः उसकी दृष्टि विषय से नहीं टकराती, बल्कि अपने उन अखाड़ेबाज़ गुरुओं पर लगी रहती है, जिनके ‘कृपा-कटाक्ष’ पर उनका भावी कैरियर निर्भर करता है। जिस ताज़गी और निस्संग बेबाक़पन की उसी से अपेक्षा थी, उसी ने ज़्यादा निराश किया। उनकी चुनौतियों में अवसर गोद में गिर जाने की व्याकुलता झाँकती थी। सोच का तीसरा विकल्प देने में अभी भी हिंदी का युवा चिंतक किसी खूँटे की तलाश में पड़ा हुआ है।

गोष्ठियाँ कई तरह से बँटी हुई थीं—‘भारतीय स्वाधीनता आंदोलन और प्रेमचंद की रचनात्मक दृष्टि’ की पहली गोष्ठी का प्रवर्तन डॉ. रघुवंश ने किया था और इसके अध्यक्ष थे दिल्ली के श्री मुहम्मद हसन। दूसरी गोष्ठी मुख्य हो गई—‘प्रेमचंद की दृष्टि और कला-रचना’, जो दिन भर चली। प्रवर्तक नामवर सिंह और अध्यक्ष स. ही. वात्स्यायन ‘अज्ञेय’। तीसरी गोष्ठी थी—‘भारतीय समाज की संरचना और प्रेमचंद की रचनाओं में चिह्नित वर्गीय संबंधों की जटिलताएँ...’ इसका प्रवर्तन किया पटना के नंदकिशोर नवल ने। चौथी गोष्ठी का विषय था—‘प्रेमचंद, गांधी और मार्क्स...’ इसके प्रवर्तक वक्ता थे—बल्लभ विद्यानगर के शिवकुमार मिश्र। पाँचवीं गोष्ठी—‘समकालीन कथा-साहित्य और प्रेमचंद की विरासत का सवाल...’ जिसका प्रवर्तन किया उर्दू के क़मर रईस ने और हिंदी कथा-साहित्य पर बोले काशी के काशीनाथ सिंह।

ज़ाहिर है कि यद्यपि इन सभी गोष्ठियों के विषय अलग थे, लेकिन वक्ताओं के बँधे हुए पूर्वाग्रहों ने सारी बहस की लीपापोती करके उसे दो शिविरों में बाँट दिया। वे अपनी उत्तेजना और आक्रामकता की परख अपने साझीदारों की थपोड़ियों से करते रहे। उर्दू के कई माने हुए आलोचक या लेखक भी, जो शामिल हुए, वे या तो प्रेमचंद के बारे में किताबी बहस में उलझे रहे या उर्दू के कहानी-लेखकों के बारे में पुरानी बातें परिचयात्मक ढंग से दोहराते रहे। चारों दिन लेखकों, विचारकों, अध्यापकों और साहित्य के विद्यार्थियों की भारी भीड़ ने इस समायोजन में हिस्सा लिया। अज्ञेय और जैनेन्द्र के अतिरिक्त सर्वश्री महादेवी वर्मा, अमृतराय, लक्ष्मीकांत वर्मा, परमानंद श्रीवास्तव, चंद्रभूषण तिवारी, डॉ. जाफ़र रज़ा, रामस्वरूप चतुर्वेदी, रमेशकुंतल मेघ, विश्वंभरनाथ उपाध्याय, सुरेंद्र चौधरी, अश्क, शैलेश मटियानी, मार्कण्डेय, कालिया, अब्दुल सत्तार, रामकमल राय, सत्यप्रकाश मिश्र, गिरिराज किशोर तथा विजयदेव नारायण साही आदि भी प्रवर्तकों एवं अध्यक्षों के अतिरिक्त बहस में शामिल होते रहे।

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उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग ने इस समारोह में प्रेमचंद, निराला, महादेवी, पंत तथा मैथिलीशरण गुप्त की जीवनियों पर आधारित वृत्तचित्र दिखवाए, जो इस कठमुल्ली बहस के बीच राहत देने वाला अंतराल था। इन चित्रपटों से सामान्य व्यक्ति की अच्छी जानकारी हिंदी की इन विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व से होती है। इसके और भी प्रदर्शन वांछनीय होंगे। प्रेमचंद पर प्रदर्शनी भी अच्छी थी, लेकिन बहस में उलझे लोगों को वह सब देखने की फ़ुर्सत नहीं थी।

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प्रेमचंद शताब्दी समारोह की सुखद और समाहार करने वाली समापन गोष्ठी थी, जिसमें जैनेंद्र जी ने शब्द की ‘मुखरा’ शक्ति और ‘नीरव’ शक्ति की व्याख्या की। उन्होंने इस ढंग की बहस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रेमचंद को इस तरफ़ खींचने के अर्थ हैं कि साहित्य राजनीति का पिछलग्गू बनकर रह जाए—उसका ‘एडवांस गार्ड’ नहीं—जैसा प्रेमचंद ने कहा था। जैनेंद्र के अनुसार प्रेमचंद का सीधा रिश्ता मनुष्य से था। वह आधुनिक नहीं थे—यह बड़ी ग़नीमत है। ‘आधुनिकता’ केवल ‘सेल्फ़’ को ही आगे बढ़ाने का पर्याय बनकर रह गई है। प्रेमचंद ने अपने सेल्फ़ का—अपने अहं का—विसर्जन करके ‘सामान्य’ का उपार्जन किया था। उनके अनुसार प्रेमचंद की सबसे बड़ी देन थी—‘जो हो, वही रहो।’ नक़ल करने की ज़रूरत नहीं है। प्रेमचंद अपने लेखन का एकमात्र उद्देश्य ‘धन की दुश्मनी’ मानते थे। उनके अनुसार प्रेमचंद के पात्र ‘संघर्ष’ करने के बजाय ‘आत्मा को पहचानने के दूसरे रास्ते अपनाते हैं।’ यहीं पर प्रेमचंद के शब्द किसी भी राजनेता के शब्दों से भिन्न व्यक्तित्व और अर्थ पाते हैं और वे अपनी नीरवता की शक्ति के साथ जनमानस में प्रतिष्ठित होते जाते हैं। उद्घाटन के दिन महादेवी जी ने प्रेमचंद के अंतरंग संस्मरण सुनाए, जो इस कथाकार की व्यापक करुणा के ही प्रसंग थे। मुख्य अतिथि अमृतराय ने प्रेमचंद की ज़िंदगी को सपाट मैदान बताते हुए उन्हें व्यक्ति से अधिक एक ‘अमूर्त विचार’ की संज्ञा दी।

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ताकि सनद रहे [केशवचंद्र वर्मा, लोकभारती प्रकाशन, प्रथम संस्करण : 1991] से साभार।

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