वह मरने के बाद की मुद्रा में खड़ा है
एक ही मुद्रा, जिसमें कोई स्वर, पीड़ा या
कोई उद्दीपन, नहीं बचता है न उसका स्रोत भी—
जैसे यहाँ उपस्थित है शिरीष का अकेला पेड़,
नंगी लॉन, बाथ केबिन और अस्तित्वहीन—पत्थरों;
जैसे शहर की धुँधली गलियों में निरर्थक छाया—घूमती है
अपने स्वप्न को टोकते हुए जैसे आदमी
सड़क से घसीटते हैं सड़क तक
अपने को।
जैसे...
कहीं किसी भी उपमा से ये पुष्ट न हो सकेगा
यह एक संपूर्ण मृत्यु है,
युग की छाती से आती हुई दुर्गंध के ज्वार से—मरने के बाद
भी उसको सताती है।
मैं उसकी आँख को नई दृष्टि और उसकी
मुद्रा को नया आवरण देना चाहता हूँ
मैं जगाना चाहता हूँ उसको
उसकी जन्मपूर्व ली हुई शपथ को
और जन्म पश्चात् बँधी हुई मुट्ठी के अंदर—के संकल्प को
दुहराना चाहता हूँ मैं फिर एक बार।
इतना ही नहीं बर्बरों द्वारा कुचली हुई उसकी आस्था को
और घायल देह को, मैं एक बार खड़ा करना चाहता हूँ
मैं अस्वीकार करता हूँ उसकी 'आदमी' की मृत्यु
मेरे इस प्रयास के बीच से चट्टान—सा वह सिर उठाता है
पर आश्चर्य, किसी ने उसकी आँखें निकाल दी हैं
रक्त को भी सोख लिया है—
—जो उसकी धमनियों में प्रवाहित होता था
वह एक बार जगा-सा दीखता है और एक बार
दृष्टिहीन दृष्टि से
क्षितिज की ओर ताकते हुए वह काँपता है
इन तिक्त पौधों के नारकीय जंगल में
ढल जाता है वह
और अंतर्लोप हो जाता है।
- पुस्तक : नेपाली कविताएँ (पृष्ठ 83)
- संपादक : सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, किशोर नेपाल, जगदीश घिमिरे
- रचनाकार : हरि अधिकारी
- प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन
- संस्करण : 1982
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