Font by Mehr Nastaliq Web

शनिवारेर चिट्ठी : गाली बयान नहीं चीख़ है

सिनेमा 

शासकों को यह भ्रम प्रिय होता है कि वे इतिहास लिखते हैं। वे यह नहीं समझते कि एक पोस्टर, एक भंगिमा, एक नारे, एक मीम से उनके इस कथित इतिहास को चुनौती दी जा सकती है। इन दिनों मुझे एक फ़िल्म याद आई है जो चिली में लोकतांत्रिक पुनर्बहाली के बारे में है। ‘No’ शीर्षक इस फ़िल्म में निर्णायक हथियार कैमरा है और लोकतंत्र का महत्त्वपूर्ण युद्ध टेलीविज़न के पंद्रह मिनटों में लड़ा जाता है। एक पूरा तंत्र अपने नागरिकों से नहीं, उनकी कल्पना से मुक़ाबिल है। इस फ़िल्म का विस्मय सत्ता की हिंसा में नहीं है। हिंसा तो तानाशाही की मातृभाषा ही होती है। विस्मय वहाँ है जहाँ प्रतिरोध अपने शब्दकोश को बदल देता है। जो लोग वर्षों से शोक, क्रोध और न्याय की माँग की भाषा बोल रहे थे, उनसे अचानक कहा जाता है कि वे अपने दुःख को कुछ देर के लिए स्थगित कर दें। विचार यह है कि लोगों को यह नहीं बताया जाए कि वे किस नरक में जी रहे हैं, उन्हें यह दिखाया जाए कि स्वर्ग कैसा हो सकता है। यह विचार अनैतिक प्रतीत होता है। क्या यातना की स्मृति पर बिना अधिक हलचल आशा की कोई परत इतनी आसानी से चढ़ाई जा सकती है? क्या लोकतंत्र को शीतल पेय के किसी विज्ञापन की तरह बेचा जा सकता है? फ़िल्म इन प्रश्नों का उत्तर देने की जल्दबाज़ी नहीं करती। वह यह दिखाती चलती है कि भय की भी एक सीमा होती है। एक समय के बाद मनुष्य अत्याचार से नहीं, उसकी पुनरावृत्ति से थक जाता है। तब वह प्रमाण नहीं, संभावना की माँग रखता है। यहीं ‘No’ अपने समय से बाहर निकलकर हमारे समय की फ़िल्म बन जाती है। राजनीति घोषणापत्रों से कम और छवियों से अधिक संचालित होने लगी है। विचारों की यात्रा अब पुस्तकों से नहीं, स्क्रीन से होकर गुज़रती है। सत्य का भाग्य इस बात पर निर्भर करने लगा है कि उसे किस रंग, किस धुन और किस चेहरे के साथ प्रस्तुत किया गया। 

फ़िल्म का नायक रेने सावेद्रा प्रचलित विरोधाभास का मनुष्य है। वह क्रांतिकारी नहीं है, एक विज्ञापनकर्मी है। यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक योग्यता है। वह जानता है कि सत्ता केवल संस्थाओं पर नहीं, कल्पना पर भी क़ब्ज़ा करती है। इसलिए वह कल्पना को ही वापस छीन लेना चाहता है। उसके अभियान का वास्तविक नारा ‘No’ नहीं, बल्कि यह है कि भविष्य की तस्वीर पर अब केवल सत्ता का अधिकार नहीं रहेगा।

पाब्लो लाराइन ने इस पूरी कथा को एक ऐसी दृश्य-भाषा में रचा है, जहाँ वर्तमान लगातार अतीत की रिकॉर्डिंग जैसा दिखाई देता है। पुराने वीडियो टेप की दानेदार बुनावट, फ़ीके-धुँधले रंग और क्षतिग्रस्त फ़्रेम दर्शक को केवल 1988 में नहीं ले जाते, यह भी याद दिलाते हैं कि स्मृति कभी हाई-रिज़ॉल्यूशन में नहीं लौटती। इतिहास हमेशा थोड़ा धुँधला होता है और शायद इसी कारण अधिक विश्वसनीय भी। कोई चीज़ अधिक शफ़्फ़ाफ़ और मुकम्मल दिखे तो उस पर शक होने लगता है। 

फ़िल्म के अंत में कोई विजयी मुद्रा नहीं है। लोकतंत्र यहाँ एक कठिन रियाज़ की शुरुआत भर है। तानाशाह सत्ता से चला जाता है, पर विडंबना यह कि जीत के तुरंत बाद रेने और उसका प्रतिद्वंद्वी लूचो; दोनों उसी बोर्डरूम में लौट आते हैं, जहाँ से कहानी शुरू हुई थी। उन्हें अब किसी अगले उत्पाद का विज्ञापन गढ़ना है। 

लिटरेचर 

विद्रोह सत्ता का निषेध भर नहीं है। वह मनुष्य की उस गहरी आकांक्षा का प्रतीक भी है जो संसार में अर्थ, न्याय और सौंदर्य की खोज करती है। ‘रिबेलियन एंड आर्ट’ शीर्षक लेख में अल्बैर कामू ने कला और विद्रोह को एक-दूसरे के स्वाभाविक सहचर के रूप में देखा है। वह देखते हैं कि कलाकार और विद्रोही दोनों उस यथार्थ से असंतुष्ट होते हैं जिसमें वे जी रहे हैं, लेकिन उनका असंतोष विनाशकारी नहीं, सृजनात्मक होता है। वह नीत्शे के इस प्रस्ताव—“कोई भी कलाकार यथार्थ के साथ पूरी तरह संतुष्ट नहीं रह सकता”—के तुरंत बाद ही यह कहना आवश्यक समझते हैं कि “कोई कलाकार यथार्थ के बिना जीवित भी नहीं रह सकता।” यही वह द्वंद्व है जो कला को जन्म देता है। कलाकार संसार को अस्वीकार करता है; क्योंकि उसमें कुछ अधूरा है, लेकिन वह उसी संसार के भीतर छिपी संभावनाओं को चिह्नित भी करता है। इसीलिए कामू कहते हैं, “कला यथार्थ से विवाद करती है, लेकिन उससे पलायन नहीं करती।” 

कामू का तीखा प्रतिवाद उन क्रांतिकारी विचारधाराओं से है, जिन्होंने कला को केवल उपयोगिता की कसौटी पर परखा। पिसारेव का यह कथन—“मैं रूसी राफ़ेल बनने के बजाय, रूसी मोची बनना पसंद करूंगा”—और नेक्रासोव का यह कहना कि “पुश्किन की समस्त कविताओं से अधिक मूल्यवान पनीर का एक टुकड़ा है...” कामू के नज़दीक कोई अतिशयोक्ति नहीं हैं। ये कथन सौंदर्य को नैतिक या राजनीतिक उपयोगिता के सामने गौण बना देते हैं। मार्क्सवादी परंपरा में भी कला से अपेक्षा की गई कि वह स्वयं को इतिहास और क्रांति की सेवा में समर्पित कर दे। कामू इस आग्रह को एक प्रकार की वैचारिक हिंसा मानते हैं, क्योंकि इससे कला की स्वतंत्र सत्ता नष्ट हो जाती है।

कामू के यहाँ कला का कार्य किसी विचारधारा की सेवा करना नहीं, बल्कि उस मानवीय अनुभव को रूप प्रदान करना है जो किसी भी विचारधारा से बड़ा है। वह कहते हैं, “हर विद्रोह में एक ऐसी आध्यात्मिक माँग छिपी होती है जो एकता और पूर्णता की खोज करती है... इस दृष्टि से विद्रोह संसारों का निर्माता है और यही कला को भी परिभाषित करता है।” यहाँ कला और विद्रोह दोनों एक वैकल्पिक संसार की रचना करते हैं। वे केवल विरोध नहीं करते, बल्कि संभावना का निर्माण करते हैं। कामू ने सौंदर्य और न्याय के बीच के तनाव पर भी विचार किया है। वह स्वीकार करते हैं कि कभी-कभी सौंदर्य स्वयं विशेषाधिकार का रूप ले सकता है, लेकिन इसके बावजूद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि “कोई भी कला केवल पूर्ण निषेध के आधार पर जीवित नहीं रह सकती।” यदि विद्रोह केवल विनाश है तो वह अंततः तानाशाही में बदल सकता है और यदि कला केवल सजावट है तो वह जीवन से दूर हो जाती है। इसलिए सच्ची कला स्वीकृति और अस्वीकृति, यथार्थ और स्वप्न, इतिहास और कल्पना—इन सबके बीच एक जीवित संतुलन स्थापित करती है।

मीडिया 

इन दिनों मेरे पड़ोस का सोशल मीडिया गालियों के विषय में एक उद्वेग में रहा। मेरा प्रस्ताव रहा है कि गालियाँ भाषा की विशिष्ट आविष्कार रही हैं और भाषा ने इनका आविष्कार आपात स्थितियों और तात्कालिक पूर्ण असर के लिए मंशापूर्वक किया है। ब्रिटिश दार्शनिक और प्राध्यापक रीबेका रोच ने भाषा पर अपने चिंतन में गालियों पर भी विचार किया है। उनकी कृति ‘For F*ck’s Sake: Why Swearing is Shocking, Rude, and Fun’ (ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2023) चर्चित हुई है। उन्होंने विभिन्न साक्षात्कारों में गालियों के विषय में लोकप्रिय प्रश्नों के उत्तर दिए हैं। वह कहती हैं कि गाली देना भावनाओं को व्यक्त करने का एक ऐसा विशिष्ट माध्यम है, जिसे साधारण शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। जब हमें चोट लगती है, जब हम चकित होते हैं या क्रोधित होते हैं, तब हम गालियाँ देते हैं। वह भाषाविद् ज्योफ़्री ननबर्ग के हवाले से बताती हैं कि कई बार गाली एक बयान से अधिक एक चीख़ की तरह होती है। यह इसका एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह है कि हम कभी-कभी जान-बूझकर दूसरों को आहत करने के लिए भी गालियाँ देते हैं। जब गाली अपमान का माध्यम बनती है; तब वह उन विषयों का उल्लेख करती है, जिन्हें समाज वर्जित या असहज मानता है—जैसे यौनिकता, ईशनिंदा या निजी शारीरिक क्रियाएँ। गाली का एक अपमानजनक पक्ष यह है कि आप जानबूझकर ऐसे विषयों का उल्लेख करते हैं, जिन्हें सामने वाला नापसंद करता है और वह भी जानता है कि आप यह बात जानते हैं। इस प्रकार, गाली सामने वाले के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता के अभाव का संकेत बन जाती है। लेकिन गालियाँ केवल इसलिए अपमानजनक नहीं होतीं कि वे वर्जित विषयों का उल्लेख करती हैं। चूँकि हमारे पास वर्जित विषयों को सभ्य भाषा में कहने के विकल्प मौजूद हैं; इसलिए झटका केवल इस बात से नहीं लगता कि हम क्या कहते हैं, बल्कि इस बात से भी कि हम उसे कैसे कहते हैं। 

वह बताती हैं कि गाली की नैतिकता पर चर्चा करते समय हम प्रायः इस बात पर ज़ोर देते हैं कि हमें लोगों को आहत नहीं करना चाहिए—जैसे स्त्री-विरोधी या समलैंगिक-विरोधी अपशब्दों से बचना चाहिए। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि किसी व्यक्ति की दूसरों को आहत करने की क्षमता को नकार देना भी अपने-आप में उसके प्रति अपमान हो सकता है। दिव्यांग लोगों के पास अक्सर दूसरों को आहत करने की उतनी ही कम सामाजिक शक्ति होती है जितनी बच्चों के पास। यही बात उन लोगों पर भी लागू होती है जो अपनी मातृभाषा में नहीं बोल रहे होते। हम मान लेते हैं कि उन्हें अपने शब्दों की तीव्रता का पूरा बोध नहीं है। वह कीथ एलन और केट बरिज की वर्जनाओं पर लिखी कृति ‘the middle-class politeness criterion’ का उल्लेख करती हैं, जहाँ उनका तर्क है कि वर्जित विषयों पर बात न करने का सामाजिक दबाव मुख्यतः मध्यवर्ग पर लागू होता है। यदि कोई निम्नवर्ग से है तो यह मान लिया जाता है कि उसे सामाजिक शिष्टाचार की पूरी समझ नहीं है। यदि कोई उच्चवर्ग से है तो इतना विशेषाधिकार-संपन्न है कि नियम तोड़ने पर भी उसकी प्रतिष्ठा प्रभावित नहीं होती। लेकिन मध्यवर्ग को इस तरह पाला जाता है कि वह नियमों का पालन करे और वह इतना शक्तिशाली भी नहीं होता कि उन्हें तोड़ सके। इस प्रकार अशिष्टता स्वयं सामाजिक पदानुक्रम पर निर्भर करती है।

गाली देने के सकारात्मक प्रभाव पर वह ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक रिचर्ड स्टीवन्स का जिक्र करती हैं जिन्होंने अपने अध्ययन में पाया कि गाली देने से दर्द सहने की क्षमता बढ़ सकती है। स्टीवन्स ने एक प्रयोग किया जिसमें लोगों को अपने हाथ बर्फ़ीले ठंडे पानी में डुबोकर रखने थे। कुछ लोगों को गाली देने की अनुमति थी, कुछ को केवल सामान्य या मनगढ़ंत शब्द बोलने थे, जबकि कुछ को बिल्कुल चुप रहना था। परिणाम यह निकला कि जिन्हें गाली देने की अनुमति थी, वे दूसरों की तुलना में अधिक देर तक दर्द सह सके। शोध में यह भी पाया गया कि यह प्रभाव उन लोगों में अधिक स्पष्ट था जो सामान्य जीवन में बहुत कम गालियाँ देते थे।

वह बताती हैं कि गाली देना एक कैथार्सिस अर्थात् भावनात्मक शुद्धि का कार्य भी है। यह निराशा, पीड़ा और क्रोध को बाहर निकालने में मदद करती है। संभव है कि इसके और भी लाभ हों। कौन जानता है—शायद गाली देकर हम अपने क्रोध को हिंसा में बदलने से रोक लेते हों। कई बार एक-दूसरे को गाली देना, एक-दूसरे पर हाथ उठाने की तुलना में कहीं कम घातक होता है। 

फ़ोटोग्राफ़ी 

मंज, तुम्हारी रुचि इस ख़बर में हो सकती है कि इन्हीं दिनों मार्सेल दुशाँ के 139वें जन्मदिवस के बहाने न्यूयॉर्क के म्यूज़ियम ऑफ़ मॉडर्न आर्ट ने शतरंज पर समर्पित एक विशेष आयोजन की मेज़बानी की। विख्यात ग्रैंडमास्टर सूसन पोल्गार ने एक साथ लगभग पचास खिलाड़ियों के विरुद्ध सिमल्टेनियस चेस एग्ज़िबिशन खेली। ये पेशेवर खिलाड़ी नहीं थे। इनमें कलाकार, कला-इतिहासकार, क्यूरेटर, लेखक और सांस्कृतिक जगत से जुड़े लोग शामिल थे। यह आयोजन केवल जन्मदिन का औपचारिक उत्सव नहीं था, बल्कि दुशाँ के व्यक्तित्व के उस पक्ष का सम्मान था जो शतरंज से जुड़ा है। वह शतरंज को केवल एक खेल नहीं, बल्कि सृजनात्मक चिंतन का माध्यम मानते रहे। उनकी इस आशय की उक्ति प्रसिद्ध है कि सभी कलाकार शतरंज खिलाड़ी नहीं होते, लेकिन सभी शतरंज खिलाड़ी कलाकार होते हैं। 

मार्सेल दुशाँ को बीसवीं शताब्दी की आधुनिक कला के सबसे प्रभावशाली और विचारोत्तेजक कलाकारों में गिना जाता है। यद्यपि वह दादाइज़्म से जुड़े थे, उनका सैद्धांतिक योगदान यहीं तक सीमित नहीं है। उनकी आरंभिक कृति ‘न्यूड डिसेंडिंग अ स्टेयरकेस, नंबर 2 (1912) ने 1913 के आर्मरी शो में प्रदर्शन के साथ ही अमेरिकी कला-जगत में एक तीव्र विवाद उत्पन्न किया। ‘बाइसिकल व्हील’ (1913) और ‘फ़ाउंटेन’ (1917) जैसी कृतियों ने ‘रेडीमेड’ की क्रांतिकारी अवधारणा को जन्म दिया, जहाँ दुशाँ का तर्क था कि कला का मूल्य कलाकार की कारीगरी में नहीं, अपितु उसके पीछे निहित वैचारिक चयन में है। ‘एस्थेटिक इनडिफ़रेंस’ के इस सिद्धांत ने पारंपरिक कला-मानकों और संग्रहालयी संरचनाओं को मूलभूत रूप से चुनौती दी। दुशाँ के वैचारिक हस्तक्षेप ने कॉन्सेप्चुअल आर्ट की सैद्धांतिक नींव रखी और पॉप आर्ट और उत्तर-आधुनिक कला-सिद्धांत को प्रभावित किया।

चूँकि मेरी रुचि फ़ोटोग्राफ़ी में रही है, मार्सेल दुशाँ से जुड़ी एक तस्वीर भी मेरा ध्यान खींचती है। 1963 में फ़ोटोग्राफ़र जूलियन वासर द्वारा पासाडेना आर्ट म्यूज़ियम में दुशाँ की पहली बड़ी रेट्रोस्पेक्टिव प्रदर्शनी के दौरान ली गई इस तस्वीर में मेज़ पर शतरंज है और मार्सेल दुशाँ के सामने युवा लेखिका ईव बेबिट्ज़ नग्न बैठी हैं। यह तस्वीर अपने असामान्य दृश्य के कारण चौंकाती है, लेकिन इसके भीतर 1960 के दशक की अमेरिकी कला-संस्कृति, विद्रोह और प्रदर्शन-कला के साथ ही प्रेम और प्रतिशोध की एक जटिल कहानी छिपी है। 

म्यूज़िक  

अंदर का शोर बाहर के शोर को कुछ समय के लिए मिटा देता है, फिर अंदर के शोर को दबाने के लिए बाहर के शोर का सहारा लेना पड़ता है। जीना जीने के असंबद्ध टुकड़ों को एक साथ जीते जाने के बारे में है। इन दिनों बार-बार ‘अ डे इन द लाइफ़’ सुनता रहा। मुझे लगता रहा कि यह गीत भी किसी एक कहानी को नहीं, बल्कि एक खंडित अस्तित्व को जीता है। गीत की बुनावट इस भावना को दोहराती है। जहाँ लेनन है, एक मृत्यु की ख़बर और फिर गड्ढों की गिनती—वह एक ठंडी और अलग-थलग बाहरी दुनिया है। मैककार्टनी की आवाज़ में अभिव्यक्त दिनचर्या—उठना, कंघी करना, बस पकड़ना—वह आंतरिक यांत्रिक निरंतरता है जो हर त्रासदी के बावजूद नहीं रुकती। और फिर वह अराजक आरोह। निचले सुर से उच्चतम सुर तक जाने का वह क्रेशेंदो, मानो दोनों शोर एक साथ, बिना किसी सुलह के, टकरा जाते हैं। अंत में फिर वह सुदीर्घ और गूँजता हुआ पियानो-कॉर्ड। वह क्षण जब यह सारा शोर कुछ पलों के लिए थम जाता है और मैं एक नए शोर के आगमन की तैयारी में जुट जाता हूँ। 

पैटर्न 

प्रिय, शनिवार की देर दुपहर तुमसे मिलने के पहले मैं कमरा साफ़ करना चाहता हूँ। मैं ख़ुद को बचाने के और कठोर यत्न करना चाहता हूँ। मेरी साध एक अच्छी दिनचर्या की है। इन दिनों कविताएँ हूक मार रही हैं। मैं चाहता हूँ कि रात की रसोई सुस्वादु हो। मैं चाहता हूँ कि मेरे अंदर का आदमी एक बेतरतीब पैटर्न में खप न जाए। मैं देर तक बेतरतीब वाक्य गढ़ना चाहता हूँ।

•••

अन्य शनिवारेर चिट्ठी यहाँ पढ़िए : शनिवारेर चिट्ठी

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट