इकतारे का गीत
iktare ka geet
मेरी बहना!
रात के प्यारे हाथ सहलाते जब पलकें
तो समझ लो कोई लहराता संगीत
पहेली की तरह
उलझा रहा है तुम्हें!
अरे! यह संगीत किसी जंगली भैंसे की
भद्दी आवाज़ की तरह नहीं
न मातमी धुन बजाते ढोलों के मोटे-घप्प चमड़ों की आवाज़ जैसा
न ही किसी नृत्यांगना के झनझनाते
घुँघरुओं की फैलती ध्वनि,
न ओखली में चलती मूसल की भारी धस्स-धस्स
जो चौंका देती नींद में,
न सड़क पर रेंकते
आवारा छोकरों का बेसुरा राग!
अरे! यह तो उसके कोमल क़दमों की
आहट से बजता बेलाफाँग या झिलोफ़ोन है
या दूधिया पंछियों की चहचहाहट!
यह संगीत है इकतारे के तार का
ऊँची, गहरी, मीठी झनझनाहट का;
और थिरकती देह के साथ
बहते गीतों का,
यह उस श्वेत शुतुरमुर्ग़-महारानी के कंठ से फूटी
स्वरलहरी गूँज रही चारों तरफ़;
और तुम जानती हो उस
स्वर-साम्राज्ञी को
जो अपने संगीतात्मक स्पर्श से
बना देती है तुम्हारी पलकें पारदर्शी
मैंने उसे नाम दिया है—
'सिगा के अरफांग की बेटी'
अर्थात् इकतारे की कन्या
लहराती तर्जनी की तरह
और लगता
गा उठे हैं जंगल, पहाड़, नदी, जानवर
सबके सब!
- पुस्तक : पुनर्वसु (पृष्ठ 65)
- संपादक : अशोक वाजपेयी
- रचनाकार : लियोपोल्ड सेडार सेंगोर
- प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
- संस्करण : 1989
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