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स्वर्ग का द्वार

svarg ka dvaar

गौरव त्रिपाठी

गौरव त्रिपाठी

स्वर्ग का द्वार

गौरव त्रिपाठी

और अधिकगौरव त्रिपाठी

    आज की ही बात समझो, या समझ लो युग कथा।

    धर्म में ही स्थित रहा जो, धर्म का ही पुत्र था॥

    युद्ध को जीता था जिसने, राज्य को भूषित किया।

    जिस युधिष्ठिर ने प्रजा को शांति से पोषित किया॥

    गया था आज चल के स्वर्ग के वो द्वार पर।

    एक कुत्ता संग लिए, बोला उसे पुचकार कर॥

    हाय साथी! रास्ते भर तू मेरा संगी रहा।

    भाइयों ने साथ छोड़ा तू मगर अंगी रहा॥

    सिर पे उसके हाथ फेरा, उसको चूमा प्यार से।

    इतने में ही इंद्र निकले, स्वर्ग के उस द्वार से॥

    इंद्र बोले 'हे युधिष्ठिर!' तू यहाँ तक गया।

    इसका मतलब है कि तेरा धर्म मुझको भा गया॥

    साथ में लाया किसे, तुझको नहीं क्या ज्ञात है?

    यज्ञ में और स्वर्ग में कुत्ते का होना पाप है॥

    छोड़ इस कुत्ते को भारत, चल तू मेरे साथ चल।

    स्वर्ग का वैभव दिखाता हूँ तुझे मैं आज चल॥

    इतना सुनना था कि उसके माथे पे चिंता बढ़ी।

    मित्र में और स्वर्ग में, चुनने की आई थी घड़ी॥

    धैर्य से बोला युधिष्ठिर, 'हे प्रभु!' हे सुरपति!

    मित्र को छोड़ूँ अगर तो व्यर्थ मुझको सद्गति॥

    जिस जगह पे योनियों और प्राणियों में भेद हो।

    पा के ऐसे स्वर्ग को मुझको सदा ही खेद हो॥

    और अंदर देखने को ये मुझे क्या मिल रहा।

    भाइयों के साथ दुर्योधन बड़ा ही खिल रहा॥

    ऐसे अत्याचारियों का स्वर्ग में क्या काम है।

    स्वर्ग तो मैंने सुना था देवता का धाम है॥

    योग्यता है गर यहाँ की पुण्य ही और धर्म ही।

    हैं कहाँ पाँडव वो प्यारे, है कहाँ पर द्रौपदी॥

    पापियों को देखकर के इतने अच्छे हाल में।

    सोचता हूँ स्वर्ग तज के मैं रहूँ पाताल में॥

    आप जो कहतें यहाँ कुत्ते का होना पाप है।

    मुझको ऐसे स्वर्ग में जाना लगे अभिशाप है॥

    ऐसा सुन के उसके मुख से, इंद्र तब विचलित हुए।

    और बोले, 'हे युधिष्ठिर!' व्यर्थ तुम क्रोधित हुए॥

    स्वर्ग तुम जिसको समझते, कर्म का ही योग है।

    और जो पाताल है, दुष्कर्म का उपभोग है॥

    स्वर्ग की आलोचना से तुमने धरती सींच दी।

    पर स्वयं के आचरण पे कैसे आँखें मींच लीं॥

    मैंने माना कि सुयोधन था बहुत पापी बड़ा।

    तू भी लेकिन दो घड़ी को धर्म से था गिर पड़ा॥

    याद है तुझको नहीं, कौरव सभा की बात क्या?

    एक औरत को जो तूने दाँव पे था रख दिया॥

    ये नहीं करता अगर तू, युद्ध होता क्या भला?

    और उसका दोष तू कौरव के माथे मढ़ चला?

    इतने वर्षों राज्य भोगा, भाइयों के साथ जो।

    वो नहीं था स्वर्ग क्या? तू काट मेरी बात को॥

    और जो पाताल जाने को तू मुझसे कह रहा।

    मूर्ख! निज पाताल में ही तू अभी तक रह रहा॥

    भाइयों का वध किया जो, और जो हत्याएँ की।

    कूटनीति के सहारे, बात जो मिथ्या कही॥

    नोंचती है याद उनकी, तेरे मन को आज भी।

    सुख को तेरे हर रहा है, तेरा ये पाताल ही॥

    कार्य लेकिन जो किया तूने यहाँ पे आख़िरी।

    एक कुत्ते के लिए जो सद्गति भी त्याग दी॥

    अब जो कहता हूँ मैं तुझसे, सुन मेरी इस बात को।

    ब्रह्म होते हैं वहीं, जहाँ प्रेम हो जहाँ त्याग हो॥

    आज जिस प्राणी के ऊपर आता तुझको प्यार है।

    वो कोई कुत्ता नहीं है, धर्म का अवतार है॥

    इंद्र ने इतना कहा और धर्म ने दर्शन दिया।

    पार्थ ने फिर आँसुओं से दोनों का तर्पण किया॥

    पा के दोनों देवों का आशीष निज व्यवहार से।

    अंदर युधिष्ठिर चल दिए, स्वर्ग के उस द्वार से॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : गौरव त्रिपाठी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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