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सजल कुशल

sajal kushal

आरसी प्रसाद सिंह

और अधिकआरसी प्रसाद सिंह

    दाहरमे डूबि गेल कुशलक सब धान।

    याचक बनि ठाढ अछि एकटंग मचान।

    भासि गेल मूलधन, लाभक की बात?

    चूल्हि कानि-कानि भरल, गील गीत-भात।

    बान्हि कऽ करेज गेल बान्ह पर बथान।

    दाहरमे डूबि गेल कुशलक सब धान।

    कोसी खरिहान भेल, खेत बनल झील।

    बूड़ि गेल मकइ केर राशिफल-फसील।

    आँगनमे बागमती, गण्डकी दलान।

    दाहरमे डूबि गेल कुशलक सब धान।

    खाली शुभकामनाक कोनो ने मानि।

    उपछऽमे लागि गेला हाथे सँ पानि।

    तर्पणमे भीड़ल छथि जूटि कऽ किसान।

    दाहरमे डूबि गेल कुशलक सब धान

    पगहा समेत गेल पानिमे महीस।

    जीबऽ ले काफी अछि गुरुजन-आशीष।

    भोजने नियोजनमे देशक कल्याण।

    दाहरमे डूबि गेल कुशलक सब धान।

    समाचार सभटा कऽ रहल जल-विहार।

    साँप जकाँ हेलइ अछि भावना विचार।

    खाउ हवा शुद्ध, करू गंगाजल पान।

    दाहरमे डूबि गेल कुशलक सब धान।

    सान्त्वनाक हस्तलिखित पोथी गलि गेल।

    पान एक ढोली ले गोली चलि गेल।

    संतोषक अगिले साल फूटत मखान।

    दाहरमे डूबि गेल कुशलक सब धान।

    साम्यवाद सिखबइ अछि बड़-पीपर गाछ।

    कूद-फानमे लागल अनुदानक माछ।

    चलल भगत बगुला केर वितरण-अभियान।

    दाहरमे डूबि गेल कुशलक सब धान।

    अधरतियेसँ झरय आँखि-हरसिंगार।

    फिल्मी धुन रहल बजा जलतरंग-तार।

    नीन कहय, समाधान आइ ने, बिहान।

    दाहरमे डूबि गेल कुशलक सब धान।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूर्यमुखी (पृष्ठ 66)
    • रचनाकार : आरसी प्रसाद सिंह
    • प्रकाशन : मैथिली अकादमी, पटना
    • संस्करण : 2011

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