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अग्नि-स्तोत्र

agni stotr

अनुवाद : शिवम तोमर

केकी एन. दारूवाला

केकी एन. दारूवाला

अग्नि-स्तोत्र

केकी एन. दारूवाला

और अधिककेकी एन. दारूवाला

    शाम के झुटपुटे में घाट पर जलती चिता

    स्फुरदीप्ति हो रही थी

    एक भूतिया छाया उसमें से निकलकर

    राहगीरों को भयभीत कर रही थी

    हड्डियों पर चाँदनी झर रही थी

    एक सवेरे घाट पर टहलते हुए

    उस धूसर राख को देखा

    जो सब कुछ निगल जाती है

    अग्नि की लालिमा भी

    और अग्नि की निर्दयता भी

    अधजले अंग अग्नि की दुष्टता के साक्षी थे

    मेरे पिता ने कहा :

    तुम्हें वह आधी जली हुई उँगलियाँ

    और हड्डियों के ठूँठ दिख रहे हैं?

    अग्नि कभी-कभी अपना कर्त्तव्य भूल जाती है!

    मैं एक पारसी—

    मेरी छोटी-सी उँगलियाँ एक गाँठ में भिंच गईं

    मैंने अग्नि को विस्मृति के पाप से

    बचाने की क़सम खाई

    तब से बीस साल हो गए

    अग्नि ने फिर वह भूल कभी नहीं की

    इसी दौरान मैंने अपने पहली संतान को

    अग्नि के हवाले किया

    क्यूँकि निकटतम दख़मा* एक हज़ार मील दूर था

    तब अग्नि-स्तोत्र ने मुझसे कहा :

    मैंने तुम्हे माफ़ किया

    मैं टूट चुका था

    लेकिन अपनी बची-खुची उद्दंडता को समेटकर

    मैंने अग्नि को क्षमा-पाप से बचाने की क़सम खाई!

    *दख़मा : पारसियों का क़ब्रिस्तान। पारसी रिवाजों में मृत देह को अग्नि के हवाले करने की जगह प्राकृतिक रूप से विघटित होने के लिए छोड़ दिया जाता है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : केकी एन. दारूवाला

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