पृथ्वी से पृथ्वी नहीं दिखती
prithvi se prithvi nahin dikhti
सन्नाटा था चारों तरफ़
कोई आवाज़ नहीं थी वहाँ
दूर से आती हुई सुनी नहीं गई कोई आवाज़
बादल उस दिन नहीं थे आकाश में
और रोशनी,
कहीं नहीं थी
बुझा दिए गए थे शहर के सारे रोशनी बल्ब
गेस्ट हाउस के भीतर भी
वह तारों की रात थी
गगन के जुगनुओं की रात थी
बुझ चुकी ज्वालामुखियों से निकले
मवाद के ठंडे होने से निर्मित पहाड़ों से घिरे
उस जगह होना ब्रह्मांड को भेदने जैसा था
हम भेद रहे थे ब्रह्मांड के रहस्य
सारा आकाश चमकते तारों से भरा था
आकाश कहीं नहीं था
वह नज़ारा शायद जीवन में एक बार ही मिलता है
या नहीं मिलता है
बादलमुक्त आकाश
गलियों और घरों की बत्तियाँ बुझ चुकी होती हैं
आवाज़ें नहीं होतीं
हमें चुपचाप तारों को देखना होता है
अपनी खुली और नंगी आँखों से
तारे हमारे आँगन में उतरने को आतुर
और तारों के चमकने से
रोशनी वाला अँधेरा होता है
बस इतनी-सी रोशनी
तारों को आकाश में निहारने के लिए
तारे बहुत निकट थे सिरों को छूते-छूते हुए
कुछ फर्लांग ऊपर
हमने उछाला अपने आपको
तारों को मुट्ठी में भर लेने के इरादे से,
हमारे इरादे ठीक नहीं थे
धड़ाम से गिरे उलटे पाँव पृथ्वी पर
पृथ्वी ने सँभाला हमें
जैसे माँ हमें सँभाल लेती है
माँ भी उड़ी होगी
पृथ्वी से पृथ्वी वाली एक यात्रा
माँ किस तारे पर बैठी होगी
इस असंभव यात्रा से,
पता नहीं
माँ नहीं गिरती उड़ान भरते
इन तारों के बीच अपनी पृथ्वी नहीं दिख रही
मैंने चीख़ते हुए कहा
मेरी माँ नहीं दिख रही
जो अच्छे इलाज़ अच्छे अस्पताल
अच्छे डॉक्टर के इंतज़ार में
एक दिन तारा बन गई
मेरी बहन नहीं दिख रही
जो हमारी उपेक्षाओं और
अवहेलनाओं की शिकार हो गई
एक दिन नींद में सोई रह गई
नींद से निकल कर सीधे तारा बन गई
उसके तारा बनने का हमने जश्न मनाया
सारे रिश्तेदारों, संबंधियों पड़ोसियों को आमंत्रित किया
और उनसे कहा वह तारा बन गई
उस दिन के बाद आकाश बादलों से घिरा रहा
किसी को फ़ुर्सत नहीं थी बादलों के हटने का इंतज़ार करने का
हमने किसी को यह नहीं बताया कि वह नींद में नहीं, भूख से मरी
उसकी हथेली में किसी ने चार पैसा नहीं रखा
यह मान लिया गया कि एक छोड़ी हुई निःसंतान औरत को
पैसे का क्या काम
चमकते हुए तारे ख़ुश नज़र आते हैं
उनका दुख उनकी चमक के पीछे छिप जाता है
छिपे हुए दुख अदेखे रह जाते हैं
तारों की मौत दिखती नहीं, धीरे-धीरे होती है
कई शताब्दियों में उनकी मौत होती है
इंसान एक शताब्दी भी जीवित नहीं रहता
तारों के दिल में छेद नहीं होता
बहन के दिल में छेद होता है
बहनें उपेक्षित होती हैं, वह भी हुई
उसने एक दिन साफ़-साफ़ कहा था
भाई, हमारे हाथ नहीं छोड़ना
हाथ में हाथ थामे रहने का सुख वह जानती थी
एक दिन उसे हमने एक अज़ीब-सी क्रूर
दुनिया का बाशिंदा बना दिया
उसके दिल से ख़ून रिसता रहा
मवाद बन कर उसके देह के बाहर आता रहा
ख़ून और मवाद के बीच उसकी आत्मा कराहती रही
उसकी कराह किसी तारे की चमक में घुल-मिल गई
उसका दुःख भी तारों के दुःख की तरह छिप गया
तारे बेआवाज़ होते हैं चमकते हैं ग़ायब हो जाते हैं
तारों के बीच बचा रहता है थोड़ा आकाश
मैंने फिर उसी अँधेरे में कहा
अपनी पृथ्वी तारों के बीच नहीं दिख रही
कोई आवाज़ आई
कि पृथ्वी से पृथ्वी नहीं दिखती
बहने नहीं दिखतीं माँएँ नहीं दिखतीं
अब क्यों दिखना!
पृथ्वी से पृथ्वी नहीं दिखती
पृथ्वी से माँ नहीं दिखती
पृथ्वी से बहने नहीं दिखतीं
सबका हाथ मेरे हाथ से छूटता चला गया
मेरा हाथ तारों तक नहीं पहुँचता।
- रचनाकार : मिथिलेश श्रीवास्तव
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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