उपसंहार
upsanhar
...बड़ा हुआ शिशु अति क्षीण, भूख भी, निर्लज्जा भी,
माँ ने त्यागा, मनुष्य का न्याय सौतेली माँ थी।
जब राह पर निकलता, उसको न देखता कोई,
भूखा तो नहीं ये बिखरे बालों का शिशु, न देखता कोई।
श्रीमंत सभी सोने से सजे, पदक धारण किए,
नन्हे शिशु को मोड़ पर घृणा से देखते निकल जाते;
उच्च महिलाएँ कोमल, नन्हे नथुनों को दवा लेतीं
सुगंधित रूमाल से जो कहीं उस शिशु को देख लेतीं :
दुर्गंध उन्हें आती शिशु से तेल, कोलतार, रंग की लकड़ी की,
पुराने लोहे की, चमड़े की और भी किसी मल की...
और यों...शिशु बड़ा हुआ, अब जो हुआ, सो हुआ :
एक दिन सारा लोहा संसार का उसने इकट्ठा किया!
हथौड़े, फावड़े, कुल्हाड़ियाँ—आदि सब लिया,
और जिन्हें लेना पाप, भगवन् : तोप, तलवारों को लिया!
मैदान में बैठ गया शिशु, मोम के समान लोहा मस दिया,
सारा बढ़ने लगा...बढ़ा...बढ़ा। ...सिर ने आकाश छू लिया!
शिखर से भी ऊँचा, जितना कभी होता शिखर, उससे भी ऊँचा
सब फ़राओनों को तर-ऊपर चिनकर, उनसे भी ऊँचा,
—हा, ऊँचे शिखर से सूरज कहाँ चढ़ा जा रहा,
धरती सब लाल हुई विचित्र नायक ज्यों हँस पड़ा,
वैसी लाली दीख पड़ती तभी जब भोर की ऊषा हँसती,
मनहर लाज से नए, सुंदर दिन की घोषणा करती।
भला नायक दायाँ हाथ उठा नाख़ून से नभ भेद देता
मेघवृंद को पतले काग़ज़-सा चीर देता।
बादल वे थे काले, भारी, बर्फ़ीले और घने;
भू पर से भाप बनाया उन्हें कष्टसाध्य, निस्सार युगों ने!
ढाँपा रखा उस तारे को जिसे मनुष्य-हृदय ताड़ता,
मनुष्य-नेत्र पर जिस तक कभी न पहुँच सकता...
प्रकट हुआ नभ के पार मनुष्य-पीड़ा का सकल चित्र,
उसे प्रकाश नभ पर दिनभर चहुँओर भटकाता।
प्रदीप्त हुई धरती, अंतरिक्ष भी रक्तिम, प्रचंड पर्व-अग्नि से,
और चित्र से, ज्यों गंधक से, गर्म आँसू टपकने लगे।
टपके जीवितों पर और उन पर जो कभी जीवित थे,
और सदियों से जो मनुष्य का रक्त बूँद-बूँद पीते।
धरती से मुख फेर लिया इन अभिशप्त चेहरों ने,
जब देख न सके नभ को : उस भयावह प्रतिशोधी पोथी को!
लोबान के मद्धिम धुएँ से दहल उठा विश्व का नीला शिखर,
जो धुआँ छाया भातृ-मानवता, धरती-मातृभूमि पर!
आकाश से हुई वाणी : इधर मेरे पास आओ, न्याय के प्यासो,
इधर मेरे पास, असम्मानितो, भूखो, पददलितो, अभागो!
दंड सँभाला धरती के बीच दमकते नायक ने,
—धन्यवाद ईश्वर को! पुरुष-वृंद मस्तक से श्रमबिंदु पोंछते।
देखता हर्ष से भर, जहाँ उस पर मुस्कराता तारा,
छालों से भरे हाथ दो संतुष्ट फैलाता।
पाषाण-दृढ़ पेशियों से भारी हथौड़ा उठाता,
आगे बढ़ो, कहता, आमीन स्वर्ग इंगित करता!
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 2)
- रचनाकार : सिल्विए स्त्राहीमीर क्राञ्चैविच
- प्रकाशन : ज़ाग्रेब, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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