वृक्ष की छाया में, जिससे पुष्प झर रहे,
जर्जर कुशीनार के आवासों के निकट,
जिनके अनुयायी विलाप-रत,
वे शाक्यमुनि बुद्ध दिवंगत हो रहे।
तम छा रहा पहला, सभी वर्ण बुझ रहे,
देह जिसे अपना ज्ञान कम ही रह गया है,
दे रही अधिकाधिक आभा,
वाणी कह रही उनसे जो रो रहे :
सब जो कभी था,
और है, और होगा, छाया है, शून्य है;
वह तृष्णा है जो अंधजाल में हमें फँसाती
सहस्रों भवों की एक वेदना से दूसरी में;
माया का आवरण है स्नेह, जिसे छल से
हमारे दर्द के तंतुओं से सूत्र बुनती।
सदैव ऐसा ही होगा,
जब तक स्वयं ही मिथ्या को न तोड़ डालें।
पर रोओ मत! —यह मृत्यु मात्र मेरा
परिवर्तन नहीं। मैंने सब जाल तोड़ डाले।
इस बार भी (जब कि टहनी से फूल झर रहे
मेरे ऊपर) लक्ष्य मेरे सारे अस्तित्व का :
मेरे समक्ष शून्यमय, तमरहित, आभारहित,
न कोई सुख, न कोई वेदना जहाँ,
निर्वाण के द्वार खुल रहे।
...रोओ मत, संघर्ष किए जाओ!
तुम्हारे द्वारा वाणी अब प्रबुद्ध प्रेषित करता
सर्व जन को; कहता : न विश्वास करो
देवताओं का! उन अभागों ने भी तो
वेदना से ही निर्मित किया अंतरिक्ष,
बोई पीड़ा सर्वत्र। न विश्वास करो
आत्मा का! वह भी अन्य नहीं, तृष्णा है,
पृथ्वी के सर्व जीवों की सीमा के परे भी वह
अपने लिए कदापि न स्रोत पाएगी :
समाधि के उस ओर क्षुधा सदा शक्तिवर,
पीड़ा उसको तुष्ट करेगी। न विश्वास करो स्त्री का!
उसके नितम्ब नीड़ हैं छल के।
प्रस्रोत अनिष्ट का गर्भाशय उसका,
क्योंकि वह जनती, घातक बीज से,
सर्व जीवन, सब असत्य, हमारी वेदना सब,
चारों ओर विस्तरती चपेटती जाती
मुक्ति का पोतद्वार, भवन निर्वाण का!
कंठ में शब्द। तत्पर शर-सी
रुद्ध हो गया
बुद्धात्मा कि निकल आए,
वासना और स्वप्न को च्युत कर दे ;
पुरातन कुशीनार स्थल पर
आ पहुँची स्त्रियाँ सुगंधियाँ लेकर,
शिरोधान, हथेलियों पर घृत लेकर,
झाड़ियों में से सुमन लेकर ;
चरणों में गिर पड़ीं।
...और बुद्ध की आत्मा ठहर गई
अंतिम रेख पर। —कान सुनते हैं
स्वर जिसमें पता नहीं पीड़ा है बढ़ती हुई
माँ की या वेदना सहोदरा की।
रसगंध नासिका तक आती हुई,
जो नेत्रों का आनंद भड़काती,
जो दहकते घावों को औषधि देती।
सिर के नीचे शिरोधान,
जिस पर सुन्दर सपने बुनता,
सोता, मधुर, किसी शिशु-सा।
...बुद्ध को ज्ञान नहीं, मिथ्या है यह या यथार्थ है।
अंतिम रेखा पर अगणित अपने बंधों के
जब अपनी पीड़ा को सभी शिराओं से च्युत करके,
अब भय हो भी किसका,
क्या तब सब वह—काम, आत्मा—फिर से स्थित
उन हथेलियों पर कर्तकाओं, वयताओं की,
बुन रहीं सर्वदा जो, जिनके हाथों से,
निर्वाण-नगर की सीमा तक से,
अंतरिक्ष में जीवन-सूत्र बँधे जाते?
सुमन वह, जो वक्षस्थल पर
उनके पड़ता, क्या प्रसून है नव आशा का,
चिर वनदेवी जिसको आरोपित करती
उसकी समाधि पर त्याग सका जो सर्वस?
पर कहीं नहीं है सीमा, क्षेत्र
जहाँ युद्ध पीड़ा—जीवन का।
...और बुद्ध की आत्मा —स्त्री के हाथों में
माया के पुनः आवरण में
च्युत हुई, वासना फैंकी,
नव पीड़ा से दारुण
तम में उठी और उत्थत्त हुई।
अंधकार में हरी टहनी से
मृत देह पर पुष्प अब भी झरता।
नभ के तल पर नवतारा उदित हुआ,
नव संसार?...
नहीं, वह थिर हो गया
लक्ष्य के द्वारे आकर,
वह जिसने सारा जीवन प्रत्यादिष्ट किया,
चाहे सशक्त अपनी वेदना में,
लेकिन पीड़ा की गाँठें, राग की कुंडलियाँ,
खोलना उसे न आया,
वे भी नहीं, सांसारिक शिल्पिकाओं
वयताओं के कोमल, अल्पकरों में जो।
तो अब यहाँ चिर दिवसों में,
सदा रहेंगे तृष्णा से पूरे जो,
अग्निशिखा-सा ज्वलित रहेगा शाक्य-मुनि
निर्वाण के बंद सिंहद्वार पर।
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 18)
- रचनाकार : व्लादीमीर नाज़ोर
- प्रकाशन : ज़ाग्रेब, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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