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अत्याचारियों से

atyachariyon se

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

सिल्विए स्त्राहीमीर क्राञ्चैविच

और अधिकसिल्विए स्त्राहीमीर क्राञ्चैविच

    1

    बेड़ियाँ झलवा लो, भले ही षड्यंत्र की बनाओ योजना,

    ये हैं वो दिवस जब क्रूरता मरती है।

    ऊषा का गाता पंछी, तिमिर का पलायन करता;

    बहुत सो लिए, घड़ी जागृति की आती है।

    रक्त का बादल वह उठ रहा है ऊपर,

    देखकर उसे उसका अभिशाप डालता तुम पर!

    2

    जानता हूँ, प्रतिहिंसा से तुम्हारे उन्माद काँप रहे,

    जानता हूँ, तुम इच्छुक हो मेरे होट सीं देने को।

    बिजलियों की दमक से अंधे तुम्हारे नेत्र डूब रहे,

    वे ही पुष्ट करतीं प्रतिशोधी वक्षों को।

    कर सकते हो मुझे प्यासा भी, भूखा तुम,

    कभी नहीं लेकिन विश्वासघातक तुच्छ!

    3

    निकट है तुम्हारा शवाधान—मुझे घोषणा करनी है,

    गीत है, छिपाना नहीं जनता से, कहना है।

    जन्म ले चुका है सेनानी जिसे दासता कुचलनी है :

    पाशबद्ध करों में वह सेनानी लेखनी है!

    सारी तुम्हारी चिंता उसे पीस देने की,

    मानो है ऐंठन हारे हुए कीड़े की!

    4

    जकड़ दीं आत्माएँ हमारी—चाहा तो था ही;

    हृदयों से उनके हृदय ही छीनने चाहे।

    पागल बनो, अरे, स्वतंत्रता जिसने चाही,

    चाहेगा उसे, क्यों भूख से तड़पे चाहे!

    दास जब उफनते, उन्हें ज्ञान नहीं भय का,

    बंदी है विचार यहाँ स्वतंत्र संचरण का!

    5

    आओ, मेरे साथ आओ, डरो मुझसे,

    मृत्यु में ले जाऊँगा, तुम पर खेद होता है।

    कहूँगा केवल भयावह यादें तुमसे,

    सुनोगे, कैसे तब नृशंसत्व रोता है।

    देखोगे, कैसे मरता है समाधि पर सब,

    बस महत्ता नहीं, ही नाम अभिशप्त!

    6

    खोल दूँगा क़ब्र किसी जल्लाद की :

    ये देखो, कीड़े खा गए उसका वैभव।

    ढहा गई उसे शक्ति प्रतिशोधी जात की,

    क्या कहते हो अब, क्या कहते हो अब?

    राख और नमक इतिहास पर जिसने छिड़के,

    आज हड्डी के लिए उसकी कब्र पर कुत्ते लड़ते

    7

    ढेर लगाए उसने जीवन दर जीवन,

    कि दुखी कंधों पर अपना लोहा परखे।

    कितनी जननियाँ थीं—निपूत रह गईं,

    कोसती आत्मा का स्वर नहीं सुना उसने।

    अपने नीचे उसने गहरी खाई खोदी,

    बलियाँ जो गिरीं उसमें, उसकी क़ब्र हुईं।

    8

    हाँ, व्यर्थ है सब—तिमिर रहे तो कहाँ,

    जब तृण-सी प्रकाश-किरण फीका कर देती उसे,

    जकड़ डालेंगी एक दिन पग-गतियाँ,

    जकड़ा क़दम लेकिन समान अन्य तीन के।

    जब तक रहेगा मानव, मानवता नहीं मरती;

    बेड़ियाँ पखेरू जिनसे उड़ने में गति भरती!

    9

    आह एक अग्नि-शिखा पर धधकेंगे मृतक,

    आह एक ज्वाल पर सीने तपेंगे।

    आज हम तुम्हारे तईं क्षुद्र और भिक्षुक,

    पर कौन थे मानव, इतिहास ये लिखेंगे।

    लेखनी ने उठाए प्राचीर और अस्त्र,

    उधर उगते ताल-वृक्ष, लगाए जाते जयपत्र।

    10

    तो मार डालो हमें—कविता में जीएँगे,

    गीत-गान होता जहाँ, स्वतंत्रता की वाणी तहाँ।

    प्रतिशोधी वक्षों से जन हमें लगाएँगे,

    वहीं, हे ईश्वर, जीवन ज्वलंत हो हमारा वहाँ।

    जान लो, बलिदानी का मनन नहीं मात्र दुष्टता,

    मैं अपनी कह चुका, अव निवृत होता!

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 4)
    • रचनाकार : सिल्विए स्त्राहीमीर क्राञ्चैविच
    • प्रकाशन : ज़ाग्रेब, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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