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घड़ी माफिया

ghaDi maphiya

बिभा विमर्श

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घड़ी माफिया

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    देबालपर टाँगल

    घड़ीक सुइ घुमैत अछि अहर्निश

    एकर घुमबाक क्रममे

    कहियो कोनो परिवर्तन कहाँ होइत छैक

    आसकति सेहो नहि होइत छैक एकरा

    संसारकेँ अपन नोकपर जेना

    रखबाक भार लेने अछि ई, से

    खूबे तन्मयतासँ करैए तकर निर्वाह...

    हम जहिया,

    जखन-जखन तकैत छी एकरा दिस

    बेसीकाल तामसे होइत अछि

    देखिते मुँह मलिन भऽ जाइत अछि

    चक्कर देबय लगैत अछि माथा...

    तखन विरक्त भऽ कऽ

    अपन तामसक बात सेहो उगिलि दैत छी

    जे की तोरा टाँगमे घोड़ा बान्हल छह

    मुदा एकरा लेल धन सन

    अपन कर्त्तव्यमे लागल करैत रहैए ड्यूटी

    एकरा बुझले नहि छैक विकलता, जे

    कतेक हरान, परेशान रहैत अछि मनुख

    घरसँ बाहर निकलैत अछि,

    एकरा दिस तकिते बेचैन भऽ जाइत अछि!

    कहिया उठौलक समस्याक झोरी

    जकरा ढोइत झुकि जाइ छै मनुखक धड़

    उड़ि जाइत छैक चानि परहक केस

    ताही व्यथे भऽ जाइत अछि मतिसुन्न!

    जतय-जतय जाइत छी

    संगे जाइत अछि घड़ी

    जीवनपर सदिखन रहैए एकरे कब्जा

    से सत्य कही तँ एकरा बिनु

    भऽ जाइत छी हमहूँ आन्हर-अकान

    हाथमे बान्हल अछि

    देबालपर लटकल अछि

    गाड़ी धरिमे लागल अछि

    से जँ कहियो भागहु चाहैत छी

    तैयो कहाँ छोड़ैत अछि हमर संग

    जकरा ओहिठाम जायब

    स्वागतमे ठाढ़ भेटैत अछि

    से बजार-हाटसँ लऽ कऽ

    शॉपिंग मॉल धरिमे

    हमर मोनक संग घुमैत रहैत अछि

    से आब हमरा

    विश्वास भेल जा रहल अछि

    कि असगर नहि अछि घड़ी

    सगरे संसारमे पसरल छै एकर जाल

    तेँ संसारमे राज करैत छै घड़ी माफिया!

    स्रोत :
    • पुस्तक : नहि सीता नहि (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 29)
    • रचनाकार : बिभा विमर्श
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2023

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