Font by Mehr Nastaliq Web

रात के भेद

raat ke bhed

मिथिलेश ‘गहमरी’

और अधिकमिथिलेश ‘गहमरी’

    रात के भेद खुलल बा अँजोर भइला पर

    चान-जोन्ही के कवन मोल भोर भइला पर

    खेते-खरिहाने रहऽ, चाहे मेला-ठेला में

    नीक लागे ना कुछो मन के थोर भइला पर

    टूट जाई का पता कब पतंग से रिश्ता

    मत करऽ नाज तूँ रेशम के डोर भइला पर

    रूप आ' रंग के कीमत बहुत बा दुनिया में

    भाव पनियो के बढ़ि जाला लोर भइला पर

    आग सुनुगत रहे, तब लोग घीव डाल गइल

    केहू सोचल, करी का, धधोर भइला पर

    हल कइल जाय चलऽ हर सवाल मिलजुल के

    बात अझुरात रही, तोर-मोर भइला पर

    प्यार के राह में 'मिथिलेश' चैन अब कइसन

    दुख के गिनती कहाँ, जग में चकोर भइला पर

    स्रोत :
    • पुस्तक : केकरा से माँगीं अँजोर (पृष्ठ 45)
    • रचनाकार : मिथिलेश ‘गहमरी’
    • प्रकाशन : सत्यांश उपक्रम (प्रा.) लिमिटेड, बलिया
    • संस्करण : 2019

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY