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नखशिख (एक)

nakhshikh (ek)

मलिक मोहम्मद जायसी

का सिगार ओहि बरनौं राजा। ओहिक सिंगार ओहि पै छाजा॥

प्रथमहि सीस कस्तुरी केसा। बलि बासुकि को औरु नरेसा॥

भँवर केस वह मालति रानी। बिसहर लुरहिं लेहिं अरघानी॥

बेनी छोरि झारु जौं बारा। सरग पतार होइ अँधियारा॥

कोंवल कुटिल केस नग कारे। लहरन्हि भरै भुअंग बिसारे॥

बेघे जानु मलैगिरि बासा। सीस चढ़े लोटहिं चहुँ पासा॥

घुँघवारि अलकैं बिख भरीं। सिंकरी पेम चहहिं गियँ परीं॥

अस फँदवारे केस वै राजा परा सीस गियँ फाँद।

अस्टौ कुरी नाग ओरगाने भै केसन्हि के बाँद॥

हीरामन राजा से कहता है कि पद्मावती के शृंगार का क्या बखान करूँ? उसका शृंगार उसी को शोभा देता है। सर्वप्रथम सिर पर कस्तूरी से काले केश हैं, जिन पर नागराज वासुकि भी बलि जाता है, राजा की तो बात क्या? रानी पद्मावती मालती है, उसके सिर पर केश भौंरे हैं। विषधर साँपों की तरह वे केश लहराते और गंध लेते हैं। जब वह बेनी खोलकर केशों को झाड़ती है, तो आकाश से पाताल तक अँधेरा छा जाता है। कोमल कुटिल केश काले नागों की भाँति हैं। वे विषधर भुजंगों की तरह लहरों से भरे हैं। मानो शरीर रूपी मलयगिरि की सुगंध ने उन केश रूपी नागों को बेध रक्खा है। इसी कारण सिर पर चढ़े हुए उसी के चारों ओर लोटते रहते हैं, अन्यत्र नहीं जाते। घुँघराली लटें विष से भरी मूर्छित करने वाली हैं या वे प्रेम की शृंखलाएँ हैं जो किसी की ग्रीवा में पड़ना चाहती हैं।

स्रोत :
  • पुस्तक : पदमावत (पृष्ठ 96)
  • रचनाकार : मलिक मोहम्मद जायसी
  • प्रकाशन : लोकभारती प्रकाशन
  • संस्करण : 2007

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