लोकदूत देवेंद्र सत्यार्थी : बेला फूले आधी रात
ऋषभ पाण्डेय
16 जुलाई 2026
न थका न रुका न हटा न झुका किसी फक्कड़ बाबा का मैं चेला हुआ
हजारीप्रसाद द्विवेदी की उपर्युक्त काव्य-पंक्ति के प्रेरणा पुंजों में कबीर, बनारसीदास चतुर्वेदी आदि का नाम आता है, पर ‘एक युग : एक प्रतीक’ की भूमिका पढ़ने के बाद यह सत्य उजागर हो जाता है कि आचार्य द्विवेदी की उस कविता के प्रेरणास्रोत देवेंद्र सत्यार्थी ही थे। आचार्य द्विवेदी ने उसी भूमिका में कहा था कि आप शाश्वत मानव चित्त के रस निर्झर का संधान खोजने निकल पड़े और मैं रटी-रटाई बोलियों के माध्यम से कविता का रहस्य समझने लगा।
यह भारतीय साहित्य के इतिहास में कितनी अद्भुत घटना है कि महान् देवेंद्र सत्यार्थी ने पूरे देश की धरती, उसके वनों, पहाड़ों का रास्ता तय करके पचास से अधिक भाषाओं के लगभग लाखों लोकगीत खोज निकाले। न थके, न रुके, न हटे, न झुके! प्रकाश मनु ने कितने आश्चर्य से कहा है, “पाँच लाख लोकगीत...! कल्पना करें तो आँखें फटती हैं। इस अकेले आदमी ने एक साथ कितनी ही ज़िंदगियाँ जी लीं। कितनी मशहूर, कितनी गुमनाम! देश के हर हिस्से, हर कोने की धूल, पानी और पगडंडियों का स्वाद जिसके पैर, जुबान और आँखें जानती हैं। और मैं—यानी मुझ जैसा मामूली आदमी उनसे बात कर लेगा? कहाँ ढूँढ़ूँ उन्हें? कोई पता-ठिकाना?”
देवेंद्र सत्यार्थी कभी घर से बिना बताए ही निकल जाते और महीनों बाद जब घर आते तो अपने साथ लाते संस्कृति जन्य लोकगीतों का विराट संग्रह। सुख-दुख के गीत, मिलन के गीत, विछोह के गीत, रख-रखाव के गीत, जीवनचर्या के गीत...
प्रकाश मनु की पुस्तक ‘देवेंद्र सत्यार्थी : नब्बे बरस का सफ़र’ पुस्तक में ज़िक्र है कि एक बार वह घर से बिना बताए चले गए और बहुत दिनों तक नहीं आए। इधर पत्नी (जिन्हें वह प्यार से लोकमाता कहते थे) परेशान हुईं तो बात प्रधानमंत्री नेहरू तक पहुँची। नेहरू ने पता लगवाया तो पता चला कि सत्यार्थी जी पाकिस्तान में हैं। उन्होंने उनके वापस आने का प्रबंध किया और सत्यार्थी जी एक बार फिर ताज़े-ताज़े लोकगीतों के साथ भारत आए।
शांतिनिकेतन देवेंद्र सत्यार्थी प्रिय स्थान था। गुरुदेव रवींद्र के वह प्रिय साहित्यकारों में से एक थे और गुरुदेव उनके अतिप्रिय। शांतिनिकेतन उस दौर का सांस्कृतिक केंद्र था, जहाँ बड़े-बड़े साहित्यकारों का जमावड़ा होता था।
मैंने देवेंद्र सत्यार्थी को वासुदेव शरण अग्रवाल की पुस्तक ‘पृथ्वी पुत्र’ पढ़ते हुए जाना था। पहले ही लेख में उन्होंने देवेंद्र सत्यार्थी को पृथ्वी-पुत्र की संज्ञा दे दी थी। वह कहते हैं, “एक देवेंद्र सत्यार्थी क्या, सैकड़ों सत्यार्थी गाँव-गाँव घूमे, तब कहीं इस सामग्री को समेट पावेंगे। इस देश में मानो साहित्य-सामग्री की प्रतिक्षण वृष्टि हो रही है, उसको एकत्र करने वाले पात्रों की कमी है... जनपदों की भाषाएँ तो साहित्य की साक्षात् कामधेनुएँ हैं। उनके शब्दों से हमारा निरुक्तशास्त्र भरा-पुरा बनेगा। हिंदी शब्द-निरुक्ति जनपदों की बोलियों का सहारा लिए बिना चल ही नहीं सकती।”
सचमुच देवेंद्र सत्यार्थी जनपदीय साहित्य के खगोलवेत्ता थे। महान् यायावर राहुल सांकृत्यायन के साथ उनके प्रिय संबंध थे। ‘एक युग : एक प्रतीक’ में देवेंद्र सत्यार्थी ने लिखा है कि कैसे एक बार की मुलाक़ात में दोनों प्रवाद पुरुष आपस में एक-दूसरे की रचनात्मक ऊर्जा टेर रहे थे। राहुल ने तिब्बत जाने की बात पर सत्यार्थी से कहा था कि एक दिन तुम वहाँ ज़रूर पहुँचोगे। मुझे मालूम है और जिस प्रकार मैं वहाँ से लुप्त ग्रंथों का अनमोल ज़ख़ीरा लेकर लौटा था, तुम भी वहाँ से लोकगीतों की अमर निधि लेकर इससे भारत और विश्व का परिचय कराओगे।
इसके बाद दोनों जनों में चरख़ा कातने के एक मुहावरे पर बात होते-होते राहुल ने कहा कोई चरख़ा कातने पर गीत है सत्यार्थी जी? बस इतने में सत्यार्थी जी ने एक कांगड़ा गीत दे पटका। तो सुनिए :
तन्दनहियों टुट्टड़ी पूणी न हिया मुक्कड़ी
सस्सू न हिया अहदी-पाणिए नू जा!
राहुल ने इसका अर्थ खोज निकाला और कहा कि सुंदर चित्रण है। ग्राम की नारी। सास का डर। विवश होकर चरख़ा कातते रहने की मर्यादा। कुछ अवकाश नहीं। इस अवस्था में नारी यही तो सोचेगी कि काश तार टूट जाए और इसे जोड़ने के बहाने ही कुछ आराम की सांस मिल जाए।”
सत्यार्थी जी ने ख़ुशी से उछलकर कहा कि यही तो गीत का मर्म है।
एक समय में देवेंद्र सत्यार्थी अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में छाए रहे। 1940 के दशक में बनारसीदास चतुर्वेदी, वासुदेव शरण अग्रवाल आदि विद्वानों द्वारा जिस जनपदीय आंदोलन की शुरुआत हुई, देवेंद्र सत्यार्थी उस आंदोलन के केंद्र बिंदु में थे। विशाल भारत, जनपद, ब्रज भारती आदि जनपदीय पत्रिकाओं में उनके द्वारा संकलित लोकगीत प्रकाशित होते रहते थे।
देवेंद्र सत्यार्थी ने न केवल लोकगीतों का संकलन किया, बल्कि उन्होंने लोक-साहित्य के उत्पत्ति की पाठवादी व्याख्या प्रस्तुत की। ‘बाजत आवे ढोल’ जैसी पुस्तक में भारतीय लोक-जीवन में ढोल और गवैये की उपस्थिति दर्ज है। ध्यातव्य हो कि देवेंद्र सत्यार्थी ने बिसनी कुम्हार और रानी ठकुरानी की कहानी पर रचा एक लोकगीत दिल्ली में फ़ुटपाथ पर जा रहे एक व्यक्ति से संकलित किया था। देवेंद्र सत्यार्थी हर आते-जाते आदमी से हामी भरवाकर उनसे लोक-साहित्य का रस खींच लिया करते थे। उन्होंने लिखा है कि उन्होंने बातों ही बातों में उस आदमी से दोस्ती की और उन्होंने उस आदमी से पूरा कहरवा गीत बोल-बोलकर लिखवाया। गीत के बोल थे :
आरे वाजत आवेला ढोल के ढमाका
से नाचत आयेला ऊ बिसनी कहरया नु हो
आरे अपना महलिया से रनिया निरखे
से कतेक नाच ना उ जे नाचेला कहरवा हो
आरे अपना अटरिया से रजावा निरेखे
कॅहरवा सॅगवा ना रनिया उढरलि जात हो
अर्थात् : बिसनी कुम्हार के ढोल और डफ पर रानी मुग्ध होकर उसके साथ निकल भागी थी। रानी को प्यास लगी तो आगे वह कुम्हार की परीक्षा लेने के लिए उसे पगड़ी बेचने के लिए कहती है और बिसनी कुम्हार इस बात से इनकार कर रानी से गहने बेचकर पीतल के गहने पहनने के लिए कहता है। पूरे गीत में आगे का संपूर्ण कथानक दर्ज है। देवेंद्र सत्यार्थी लिखते हैं कि विश्वव्यापी मौखिक परंपराओं में बिसनी कुम्हार और रानी ठकुरानी की इस गाथा को पृथक-पृथक स्थान मिला है। ढोल की आवाज़ का जादू है कि रानी कुम्हार के साथ गाँव-गाँव घूम-घूमकर अपना जीवन बिताएगी। वह कहते हैं कि शायद यह गीत—ढोल के विजय का प्रतीक है।
इस सबका संकलन और विश्लेषण का इतना सुलझा हुआ है कि ऐसे फ़ील्डवर्क प्रस्तुत करते हुए देवेंद्र सत्यार्थी अभिभूत करते हैं। सुनीति कुमार चटर्जी ने कहा था कि देवेंद्र सत्यार्थी ने स्कॉटलैंड के देशभक्त फ़्लैचर के कथन की पुष्टि की है, जिसने कहा था कि ‘किसी भी जाति के लोकगीत उसके विधान से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं।’
अगर आप उनकी पुस्तक ‘बेला फूले आधी रात’ पढ़ें तो यह जानेंगे कि एक-एक फूल, एक-एक परंपरा की तर्ज पर कैसे जनपदीय जीवन में सुंदरता उपस्थित है। सभी जनपदीय भाषाओं में बेला के फूल खिल रहे हैं। इन्हें देवेंद्र सत्यार्थी ने उतनी ही सहजता से व्याख्यायित किया है। भोजपुरी अंचल में एक बिटिया के विवाह गान में, कन्या की तुलना बेला के फूल से की जा रही है :
देत सुघर एक सेंनुर भइउ पराई
बनवा में फूलेली बेइलिया अतिहि रूप आगरि
मलिया त हाथ पसारे तू हौसि जा हमार
देवेंद्र सत्यार्थी के अनुसार कन्या अपने बाबा, भाई आदि को पुकारते हुए कहती है कि एक सुघड़ पुरुष सिंदूर दे रहा है। मैं पराई हो रही हूँ। जैसे वन में बेला खिलते ही माली हाथ पसार देता है। यह गीत सूक्ष्म संवेदनाओं से रचा-बसा हुआ है। देवेंद्र सत्यार्थी ने अलग-अलग भाषाओं में ऐसे विभिन्न गीतों का संकलन किया है जो किसी व्यक्ति, भाषा, स्थान, वस्तु, वनस्पति, लोक-संस्कृति आदि इकाइयों में सन्निबद्ध है।
मौखिक साहित्य परंपरा की विभिन्न परतें होती हैं। देवेंद्र सत्यार्थी ने परत दर परत इस अगाध मौखिक सामग्री का संकलन और अध्ययन किया है। वह लोक-जीवन के समाजशास्त्री थे। बंगाली, असमिया, संथाली, हिंदी, पंजाबी, गढ़वाली आदि से लेकर समूचे भारतीय जनपदीय साहित्य को उन्होंने ढूँढ़-ढूँढ़कर संकलित किया। वह जिस विषय की लाठी को पकड़ लेते उस विषय की गहराई तक जाते थे। ‘मयूर और मानव’ पर संकलित उनका अध्याय भारतीय लोकगीतों में मोर की उपस्थिति पर आधारित है। भिन्न-भिन्न भाषाओं में मोर और मनुष्य के बीच के सह अस्तित्व को उन्होंने लोकगीतों में खोजा। वह एक राजस्थानी गीत उद्धृत करते हैं :
सावण तो लहरयो भादवो रे
बरसे च्यारूं कूंट
म्हारा मोरला सावन लहरयो रे
सावण बाई गवरां सास रे
अर्थात् : सावन लहराने लगा है, बहन ससुराल में है। मयूर ने मनुष्य की भाषा समझी या नहीं किंतु कन्या ने मयूर से आस लगाई है।
इस तरह देवेंद्र सत्यार्थी अलग-अलग जनपदीय भाषाओं में मोर की संवेदनात्मक उपस्थिति को दर्ज करते हैं। देवेंद्र सत्यार्थी ने ब्रिटिश और आज़ाद भारत में सीमाओं की परवाह नहीं की। वह तिब्बत, हिमांचल में बौद्ध भिक्षुओं के पास गए और उनसे संवाद सूत्र स्थापित किया। कहते हैं कि उनकी पत्नी घर सँभालने के लिए सिलाई मशीन पर कपड़े सिलती थीं। देवेंद्र सत्यार्थी ने एक जगह कहा है, “मैं स्वीकार करता हूँ कि सिलाई मशीन ने ही परिवार को बचाया था, मैंने तो बस काग़ज़ पर कुछ लिख दिया था।”
देवेंद्र सत्यार्थी ने अपरिमित सामग्री का संकलन किया जैसे राहुल सांकृत्यायन खच्चरों से अपार बौद्ध साहित्य लाद-लादकर भारत ले आए थे। इन महान् पृथिवी-पुत्रों द्वारा संकलित सामग्रियों से इतिहास को पढ़ना, समझना और उसका अनुकरण करना और भी दिलचस्प हो जाता है।
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