‘चिरई के जान जाई औ’ लइकन के खिलौना’
प्रतीक ओझा
18 जुलाई 2026
लगभग दो दिन बीत चुके हैं किसी किताब को उठाए या ध्यान से कुछ पढ़े हुए। कहीं मन ही नहीं लग रहा। वह तो बार-बार भावुक हुआ जाता है। कई बार रोने का मन करता है। संवेदना की कितनी ही लहरें शरीर के पूरे हिस्से में सिहरन पैदा करती हुई दौड़ जाती हैं। आख़िर एक आदमी करे तो करे क्या! जीवन जीना और मर जाने में आसान स्थिति मर जाने की बनती जा रही है। यह देश धीरे-धीरे मर जाने के लिए ज़्यादा और जीने के लिए कम होता जा रहा है। कितनी सारी सूचनाएँ और तर्कविहीन, बुद्धिविहीन मर जाने को तैयार लोगों में इधर सूचनाओं के ग़लत उपयोग की उपयोगिता ज़्यादा बहुमूल्य समझी जाने लगी है। और यह कठिन से कठिनतम की तरफ़ होता जा रहा है, और यह सब उससे भी ऊपर कहीं जाने को तत्पर है।
इन सब में मैं कहाँ हूँ? मैं क्या कर रहा हूँ? क्या ही कर पा रहा हूँ? कुछ नहीं! आख़िर कुछ नहीं क्यों? इतना सब होते हुए एक आदमी क्यों सिर्फ़ कुछ नहीं कर रहा? स्वयं को एक दिलासा देता हूँ कि पढ़ रहे हो भाई तुम, तुम कुछ नहीं कर सकते। पर क्या यह सच है? अंतरात्मा में कहीं भीतर देखने पर लगता है कि ना बाबू, ई सब बस बहाना बा! असल में तू आत्मकेंद्रित होई गवा हय! तोहके आपन सिवा और केऊ नाय सुझात बा हो! तू दब्बू, डरपोक, बर्दबोंग। तू किरवा, तू नीच, तू हीन-पापी हय हो! पढ़े से का होई जाए? एक नौकरी! लेकिन का बस एक नौकरी ख़ातिर इतना सब पर चुप रही जाब ठीक बा? का बस पढ़े-पढ़े के धुन धुने रहे से ई सब देखे-सुने वाला मनवा, बेचैनी में बुजबुजात रहई वाला मनवा शांत होई जाए? न होय न?
लेकिन फिर सोचता हूँ कि क्या स्व की शांति के लिए जो भी इस संवेदित मन पर गुज़र रहा है, उसे लिख देने से वह सब सही हो जाएगा, जिसके कारण यह मन बेचैन होता है? न होय यार! न होय! लिखब ख़ुद के तसल्ली देय ख़ातिर हय। लिखे से कुछ बाहर बदल जाए, ऊ त मुश्किल बा गुरु! तब? तब का कीहा जाय?
देखऽ गुरु! लिखे तऽ पड़े, और कोनो चारा नाय न। अब चाहे मूड़ी के बल लिखऽ या गोडे के। काहे कि इहई आपन लोग कई सकी थ। हाँ, कुछ लोग आंदोलन जैहिहीं, केउ न भी जाए, लेकिन नियम एहै बनत हऽ कि जे जोन कई सकऽ थ, ओका ऊ करे के चाहे। तब अब बात पे आवा जाई कि काहे बरे दुई दिन से मन ख़राब बा!
देखऽ गुरु! मन तऽ ख़राब सबै चीज़ से बा। शिक्षा, अशिक्षा, घूस, चोरी, ज़बरदस्ती के घर गिराऊब, कतऊँ खड़ा रहऽ तऽ ज़बरदस्ती के नाम पूछब कि कैसेऊ केऊ मुसलमान मिल जाइ त परेशान किहा जाई। मन तऽ ईहु से ख़राब बा कि मनई मरे चाहे जियई, अब केहू से केहू के मतलब नाय रही गवा बा। केउ केहू के हाल पूछे नाय जात बा। ई कही सकत हऽ कि सब खिलवाड़ होई गवा बा! उहई बतिया भऽ कि ‘चिरई के जान जाई औ’ लइकन के खिलौना’।
हाँ हो! उहई बतिया भऽ। अब जब इतना कुछ होत रहा तब मार्केट में लोगन के पता चला कि BAT–BMS नाम से कोनो ऐप हो थऽ, जेसे कोनो भी ई-रिक्शा के काबू में किहा जाई सकत हऽ। बस तब का, जब से पता चला बा, सब ई-रिक्शा बालन के गाड़ी ऊ ऐपवा से रोक देत हयेन। अब जे भी करत बा, उनका त चीबिल्लई सूझी बा! लेकिन ऊ आदमी के का, जोन दिन भर पाँच मनई के बैठाई के पचास-सौ रुपल्ली कमाई के घर चलावत बा। ओकर बेचारे के तऽ पूरा परिवार के संकट पैदा होत बा न। बड़ी मुश्किल से मनई एक-एक सवारी ख़ातिर दूसरे ई-रिक्शा बालन से लड़ी-लड़ी के बैठावयऽ, कुछ पैसा, रोटी-दाना के जुगाड़ करै, और ओकर गाड़ी रोकी-रोकी के ओका तू पचन! भूखन मारत जा। ई कहा के भलमनसी है? उहई बतिया जोन ऊपर कहा कि ‘चिरई के जान जाई औ’ लइकन के खिलौना।’
हम गाँव में ऐसे केतना मनई के जनित हऽ जे बहुत ज़्यादा पढ़ा-लिखा नाय रहें। लरिका रहेन तऽ गोली, चिभ्ही, गुल्ली-डंडा और स्कूल के समय कैथ खाई में अस जीवन बिताई देहेन कि कभो पढ़बई न करेन। औ’ जब मेहरारू आई, लड़िका-बच्चा भयेन, तब मज़दूर चौराहा, अल्लापुर डेली पहुँचा रहेन। लेकिन हज़ारन के भीड़ में कहाँ काम मिलत बा! के का काम मिलत बा? केहू के नाय! उनहुं के नाय मिला कभो। तब थकी-हारी के, जुआ में जोन जीता पैसा रहा, ओका लेहन; मेहरारू के भाई से पैसा लेहेन; मौसी से लेहेन; बड़का भाई से लेहेन; औ’ सब से लै के ई-रिक्शा लोन पर उठायेन। ऐसे केतना मुश्किल से ओनहीं के दईयां ज़्यादातर मनई कोनो न कोनो जुगाड़ कई के लेहे होय कि कुछ नाय तऽ लड़िका-बच्चा भूखन न मरीहीं। आख़िर औ’ कुछ कई पऊतेन तऽ काहे न करतेन। लेकिन का करें, माई-बाप बहुत पढ़ाएन, जब मन न रहा तऽ का करें। तू पचे का समझबऽ! तोहके सबके तऽ उहई बतिया जोन ऊपर कहा कि ‘चिरई के जान जाई औ’ लइकन के खिलौना।’
औ’ तोहार सब के पेट भरा बा तऽ भैया, भरा पेट खीसनिपुरई सबके सूझत हऽ। हम अपने अंखियाँ से देखे हई, ई देश में छोट होब गुनाह कभो उतना नाय रहा जेतना अब होई गवा बा। ऊ फिर चाहे पैसा से होई, या जाति से, या धर्म से, या कोनो औ’ चीज़ी से। मनई कोनो तरह से अगर छोट बा तऽ ओका रही-रही के याद देलावा जात हऽ कि ऊ छोट बा। अगर केउ पूर्र बा तऽ ओका याद देलावा जात हऽ कि ऊ पूर्र हई। केउ ई-रिक्शा चलावत बा तऽ ओका बार-बार याद देलावा जात हऽ कि ऊ ई-रिक्शा चलावत बा। ओका दुपहिया वाला भी गरियाए, औ’ टेंपो वाला भी। चारपहिया वाला तऽ ओका मनई समझी लेई, इहई बड़ी बात बाऽ।
ई बात सोचत-सोचत पिताजी के नौकरी न करे के कारन याद आवत हऽ कि काहे ओ आपन पूरा जीवन, मतलब अभौ भी, ओ ट्यूशन पढ़ाई के गुज़ारा करत हीन। एक दिन ओ ई बात बताए रहेन। कहेन, “बेटवा! अब नौकरी करै जाब तऽ कोनो छोट-मोट सिक्योरिटी गार्ड टाइप के नौकरी मिले। मुला जोन मनई पूरा जीवन सम्मान से गुज़ारे बा, ओका नौकरी पर ओसे आधा उमर के मनई कोनो ग़लती पे गरियाए, तब ऊ हम कैसे सही पाऊब? नाय न?” लेकिन बहुत मनई हेन ई देश में जोन अइसे जीयत हयेन। ओनकर सब के कभो अपमान न कीहऽ। ओनकर अपमान औ’ हमार अपमान हमेशा एकै समझऽ।
तऽ गुरु, समस्या तऽ बा! मुला इहई भर नाय न कि ई-रिक्शा के बालन के परेशानी बा। असल में ई पूरा देशवई में गड़बड़ी होई गऽ बा। सबे मनई परेशान बाटे। जे पढ़त बा, ओका नौकरी नाय मिलत बा। जे पढ़ा चाहत बा, ओका पढ़े नाय देवा जात बा। धर्म बालन सब धर्म के नाम पे कुल मनमानी कई रहा हैन। जे कुछ बोला चाहत बा, रोवा चाहत बा, ओका रोवे तक नाय दिहा जात बा। कुल मिलाई के मनई, मनई के दईया नाय, जानवर के दईया जीयत बा। अब जानवर के सब जानत हीन कि ऊ बेचारा न बोले, न कोनो बाते पर केहू से कुछ कहे। पूरा देशवई ऊ चिरई होई गवा बा जेकर जान जात बा औ’ लइकन के खेल लाग बा। सब खेल होई गवा बा। सब तमाशा। कुछो होई जाई, सबके ख़ातिर खिलौना भव बा। औ’ पूरा देश ऊ खिलौना टीवी पे दिन-रात समाचारे में देखत बा। सब चिरई के मरई के खेल हई। हम सब कब ऊ चिरई होई जाब, कोनो गारंटी नाय न।
सब केउ अब का करे? लागत बा ऐसन तमाशा के खातिरई हिंदी में एक कवि भयेन नवीन सागर, ओन लिखेन : हत्या का विचार होती हुई हत्या देखने की लालसा में छिपा है।
धीमे-धीमे ई देशवा ऐसन लागत बा कि ई विचार से भरी गवा बा। कतौ कोनो घटना घटी तऽ मनई ई बात के तकलीफ़ मनावत बा कि ऊ ओह टाइम हुआँ नाय रहा। रहा होत तऽ देखत कईसे भवा, कईसे आगी लगी, कईसे के मरा, के जरा, रील बनत, नेता जोन अउतेन ओनका देखा जात। कुल मिलाई के तमाशा, सबके तमाशा देखे के बा। ऊ बात अलग हई कि तमाशा तबई तक नीक लागत हऽ जब तक ऊ अपने साथे न होई।
अब ई सब देखी के बाबा के याद आवत हऽ। ओन सही कहे रहेन कि जोने घरे के मुखिया ज़िम्मेदार होत हऽ, ऊ घरे के सब मनई, लड़िका-बच्चा सहित, सब ठीक होत हीन। मुला जोने घरे के मुखिया ख़ुद बर्दबोंग, बैल-बुद्धि निकल जात हीन, ऊ घरे के सब मनई भी वइसे निकल जात हीन। अब ई देश ख़ातिर इहई कही सका जात हऽ कि हमरे घरे के मुखिया ही बर्दबोंग, बैल-बुद्धि निकल गवा बा, तऽ का किहा जाय। ओनका ख़ातिर सब चिरई हयेन अउर ओन लरिका। ओनका बस दिन भर तमाशा चाही, चाहे जोन होई, बस तमाशा। उहई बतिया, जोन रही-रही के ऊपर कहा : ‘चिरई के जान जाई औ’ लइकन के खिलौना।’
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