मुकुल शिवपुत्र : समदरसी है नाम तिहारो, चाहो तो पार करो
नवीन रांगियाल
17 जुलाई 2026
समदरसी है नाम तिहारो, चाहो तो पार करो
ठुमरी सुनी। ख़याल भी। इंदौर और देवास में स्टेज के सामने दरी पर बैठकर घंटों सुना और जी भर के देखा भी उन्हें। लेकिन इन आयोजनों के दीगर कभी पकड़ में नहीं आए। बहुत ढूँढ़ा, जुगत लगाई कि भजन ख़त्म होते ही पीछे के रास्ते से जाकर पकड़ लूँगा; लेकिन ग्रीन रूम के दरवाज़े से निकलकर पता नहीं कब और कहाँ अदृश्य हो जाते थे।
अक्सर यही हुआ। भजन गाकर निकलते ही या तो लोगों ने घेर लिया या अचानक से कहीं ग़ायब हो जाते। जैसे कोई सिद्धि प्राप्त कर रखी हो औचक ग़ायब होने की।
कई महीनों बाद एक दिन पता चला कि होशंगाबाद में रेलवे स्टेशन के आस-पास घूमते नज़र आए हैं। सफ़ेद मैला धोती-कुर्ता पहने और गमछा डाले। निर्गुण पंडित कुमार गंधर्व के बेटे मुकुल शिवपुत्र। अधपकी दाढ़ी। तानपूरा कहीं दूर रखा है, जो बेहोशी में भी उनकी नज़र के घेरे में है।
कोई कहता बीमार हो गए हैं, किसी ने कहा लड़खड़ा रहे हैं। पैर पर नहीं खड़े हो पा रहे हैं। मन हुआ कि चले जाऊँ, लेकिन हिम्मत नहीं हो सकी। यह तय था कि जब तक इंदौर से होशंगाबाद पहुँचेंगे, वह अदृश्य हो चुके होंगे। मामला उस दिन वहीं दफ़ा कर दिया।
अच्छा भी हुआ कि नहीं गए, अगर जाते तो संगत तो दूर रियाज़ भी कानों में नहीं पड़ता। अगले दिन ख़बर में थे कि भोपाल वालों ने उन्हें उठा लिया है। भोपाल में ख़याल-केंद्र खोलेंगे और वहीं रखेंगे। लेकिन मुकुल जी वहाँ कहाँ टिकने वाले थे, यह ख़याल भी सिर्फ़ एक ख़याल ही रह गया।
फिर किसी दिन पता चला कि नेमावर में है नर्मदा किनारे। किसी बाबा की कुटिया में धुनी रमा रहे हैं। वहीं डेरा जमाया है। रात के अँधेरे में गौशाला के बाजू में बैठेते हैं। वहीं अँधेरे में भाँग घिसते-घोटते हैं और कभी-कभार मन होता है तो गा भी लेते हैं। शाम ढले घाट से सटी उस कुटिया से तानपूरे और आलाप की हल्की खरज नर्मदा किनारों से टकराती है। किनारों के साम-सूम अँधेरे और नदी का सँवलाई उजारा पंडित जी के उस रियाज़ का अभी भी गवाह होगा। शायद उस समय उन्होंने कुछ देर के लिए ही सही, नर्मदा किनारे अपना गाम बसाया हो।
फिर एक दिन भनक लगी कि हमारे पिंड इंदौर में ही हैं। एक अखाड़े में रह रहे हैं। उस दिन भी ख़ूब ढूँढ़ा और पता लगाया कि कौन-सा अखाड़ा है। किस मोहल्ले में हैं, किस उस्ताद को अपना चेला बना रहे हैं। कुछ नाम सुनने में आए—कल्लन गुरू व्यायामशाला। सुदामा कुटी व्यायामशाला या बृजलाल उस्ताद व्यायामशाला। वह इनमें से कहीं नहीं थे। दो-तीन दिन बाद पुख़्ता सुबूत मिले कि बड़ा गणपति के आगे पंचकुइयाँ आश्रम में हैं। यहीं दाल-बाटी खा रहे हैं। हनुमान जी के मंदिर के सामने। पंचकुइयाँ अपने घर से दूर नहीं था। क़रीब पाँच-छह किलोमीटर की दूरी पर बस। गाड़ी उठाकर निकल गए। बग़ैर देर किए चप्पल पहनकर। शाम का धुँधलका छा गया था।
इंदौर का धुआँ और धूल आदमी को फ़क़ीर बना देती है। घर से चप्पल पहनकर निकल जाओ तो ख़ैरात में मिलने वाली इंदौर की धुंध-धूल धाम से आदमी ख़ुद को आधा कबीर महसूस करने लगता है। शाम साढ़े सात बजे पंचकुइयाँ पहुँचे तो आरती की ध्वनि थी। घी के फाहों में भींजे दीयों में आग महक रही थी। सफ़ेद और भगवा धोती में अधभींजे पुजारी स्तुतिगान में थे। संध्या-आरती और हनुमान-चालीसा के पाठ की करतल ध्वनियाँ। लेकिन अपना मन नहीं था स्तुति में। फिर भी आरती ख़त्म होने तक इंतिज़ार करना पड़ा। बीच-बीच में यहाँ-वहाँ देखते रहे। ताली बजाते हुए इधर-उधर नज़र फेरते रहे। किसी कुटी में कहीं नज़र आ जाए शिवपुत्र। कहीं से रियाज़ की या किसी आलाप की आवाज़ आ जाए। लेकिन सूना ही नज़र आया आश्रम। आरती ख़त्म होते ही पूछा किसी से... जवाब मिला जानकी महाराज से पूछ लो, उनको पता होगा। जानकी महाराज को ढूँढ़ा तो वह अपने गमछे धो रहे थे। गमछों से उनके पानी झारने और सुखाने तक उनकी प्रतीक्षा की।
जब वह फटका मारकर अपने कमरे से बाहर आए तो उनसे पूछा, "पंडितजी कहाँ बैठे हैं?" उन्होंने बताया कलाकार आए तो थे, लेकिन दुपहर में चले गए। दिल बैठ गया। हमने मुहर लगाने के लिए फिर पूछा कि आप जानते हैं न... मैं किसके बारे में पूछ रहा हूँ? जवाब था, हाँ! महाराज, शिवपुत्र आए थे, लेकिन चले गए। एक गाड़ी आई थी बैठकर चले गए। दो दिन यहीं भाँग खाई, भजन गाए और आटा भी गूँथा। मैं समझ गया कि पंडितजी चले गए यहाँ से भी। थोड़ी-थोड़ी बदरंगी और बेरुख़ी के साथ लौट आए।
यह पंडितजी की ठुमरी और उनकी ख़याल गायकी से दीगर उनकी कबीरियत की संगत और उसे जानने के हमारे करतब थे, जो कभी कामयाब नहीं हुए। मौसिक़ी से परे उनकी बेफ़िक्री से हर किसी का राब्ता रहा है। मेरा कुछ ज़्यादा ही। बीच में एक सुर का अदृश्य तार तो जुड़ा ही रहा हमेशा, लेकिन संगत अब तक नहीं हो पाई। रियाज़ और आलाप तो बहुत दूर है। इसी बीच मुंबई से कुछ फ़िल्ममेकर भी आए थे। वह पंडित जी पर डॉक्युमेंट्री बनाना चाह रहे थे। इस बहाने भी हमने उनको ख़ूब खोजा-पूछा। देवास टेकरी पर ‘माता जी के रास्ते’ पर भी पूछा-ताछा। उनकी खोज में मुंबईवालों की मदद करने का मन कम और अपनी मुराद पूरी करने का इरादा ज़्यादा था, इसलिए नेमावर से लेकर दिल्ली तक फ़ोन लगाए, भोपाल भी पूछा; लेकिन कुछ नहीं हो सका।
फ़िलहाल मैं इंदौर से मुंबई और देवास से नागपुर और फिर से इंदौर लौट आया हूँ। उनका सुना है कि वह पुणे में हैं, लेकिन हमें अपने प्रारब्ध पर यक़ीन कुछ कम ही है। इसलिए वहाँ पुणे भी नहीं जा रहे। क्या पता वहाँ से भी भाँग दबाकर कहीं रफ़ूचक्कर हो जाए पंडित जी।
बहरहाल, मंचों पर गा रहे हैं, लोग उन्हें सुन रहे हैं। और हमें अच्छा लग रहा है यह सुनकर कि पंडित जी गा रहे हैं।
इस सब लिखे कहे के लिए क्षमा... प्रभु मोरे अवगुन चित न धरो
‘अनफ़ैज्ड’ : मुकुल शिवपुत्र
उन दिनों मेरे ऊपर ऊँची इमारतों वाले शहर बंबई का नशा तारी था। मैं रेत और समंदर पर कविताएँ लिखता था। उमस और नमक हर वक़्त साथ होते थे, उन दिनों सुबह-शाम चर्चगेट से लेकर अँधेरी और माहिम तक भीतर लोकल ट्रेन की आवाज़ें धड़कती थी। अपनी जवानी के उन शुरुआती दिनों में मैं एक सधी हुई या फिर एक रैंडम ज़िंदगी के विचार के बीच उल्टा टंगा हुआ था। ज़िंदगी के बारे में तय करने और तय नहीं करने की ऊहापोह से भरा यह विचार भी एक अलग तरह के लापरवाह और रूमानी संसार मे लेकर जाता है।
बंबई में कई लंबी रातों और उबाऊ दुपहरों में भटकने के बाद भी मैं यह तय नहीं कर सका था कि आख़िर कैसे जीना है, कहाँ से जीना है। उस अधपकी जवानी के दिनों में सिर्फ़ एक ही चीज़ तय थी। दिन-रात संगीत सुनते रहना। देर रातों तक उसे घोलकर पीना ताकि आत्मा में ताप और देह का ज्वर बना रहे।
बंबई के बाद कुछ महीने भोपाल और फिर इंदौर। इसके बाद सीधे देवास में एक अख़बार में काम करने का मौक़ा मिला। यहाँ आधे मन से आया था। बंबई के बाद छोटे से नगर देवास में आकर काम करना बिल्कुल भी भा नहीं रहा था, लेकिन मुझे पता था कि मेरे पैरों में चक्कर है और उम्मीद थी कि जल्दी ही यहाँ से निकलकर कहीं और चला जाऊँगा, लेकिन पूरे चार साल से ज़्यादा वक़्त तक देवास में रहा। वह नगर जहाँ से कुमार गंधर्व के निर्गुण का प्रारंभ हुआ हो; जहाँ शीलनाथ ने धुनी रमाई हो और जिस जगह से मुकुल शिवपुत्र दुनिया की ख़ाक छानने के लिए घर से निकल पड़े हो, वहाँ से मेरा छूट जाना आसान नहीं था।
अपने धार्मिक गुण, रियासतकालीन संस्कृति और कुमार गंधर्व के घराने के तौर पर जिस तरह से यह नगर चैतन्य नज़र आता है, वैसा शायद कोई दूसरा शहर नहीं। इसके लिए किसी दिन माँ चामुंडा की टेकरी पर चढ़कर पूरे नगर को समग्र रूप में आँख भर कर देखना होगा। जो नज़र आएगा उसे अध्यात्म और कला का एक सुरीला कोरस कहा जा सकता है, हालाँकि वर्तमान में इस सुर को यहाँ के नगरवासियों ने बहुत ही बे-दिली से बिसरा दिया है। संगीत के समारोह और महफ़िलें अब यहाँ सिर्फ़ औपचारिकता भर बनकर रह गई हैं। कभी-कभार होने वाली सभाओं में गिने-चुने लोग आते हैं और आह, वाह और दाद देकर चले जाते हैं!
इस नगर में मेरी नज़र सबसे पहले जिस रास्ते पर पड़ी उसका नाम था ‘माता जी का रास्ता’। आजकल यहाँ कुमार गंधर्व द्वार बन गया है। देवास टेकरी पर माँ चामुंडा और तुलजा भवानी के मंदिर तक ले जाता यह रास्ता बीच में कुमार गंधर्व के घर की तरफ़ मुड़ जाता है। तब नहीं पता था कि नुसरत फ़तेह अली ख़ान, जगजीत सिंह, फ़्रेडी मरकरी, अडेल, ब्रायन एडम्स, जॉर्ज माइकल और लेड ज़ैप्लीन से शुरू होने वाली संगीत सुनने की यह नियति कबीर के निर्गुण तक लेकर जाएगी। यहाँ पंडित कुमार गंधर्व भी होंगे और मुकुल शिवपुत्र भी मिलेंगे। यहीं से किशोरी अमोनकर भी मिलीं, शोभा गुर्टू और फिर कौशिकी चक्रवर्ती भी। बिल्कुल भनक नहीं थी कि हमने जिस ग़ज़ल, ज़ेज और ब्लूज़ की उँगली पकड़ रखी है वो ख़याल, ठुमरी, दादरा और कजरी से होते हुए हमें निर्गुण भजन के आँगन में ले जाकर छोड़ेगी। उस पर फिर कमाल यह कि यहाँ मिला भी तो मुकुल शिवपुत्र का वो ‘ख़याल’ जो जीना सिखाए और कुमार जी के ‘निर्गुण’ जो मृत्यु सिखाए।
यही वह वक़्त था जब भीतर कहीं अँधेरे में कबीर की एक गली खिंच गई, जिसने आत्मा को दर्शन की एक आहट-सी बख़्श दी। इसी निर्गुणी सबद और आहट ने सुनने का होश फ़रमाया और इसी होश ने बेख़याल होकर फ़क़ीरों की तरह घूमने वाले मुकुल शिवपुत्र से तार जोड़ दिया।
शायद यही वो दिन रहे होंगे, जब तय हो गया होगा कि ज़िंदगी को न तो साधा जा सकता है और न ही वो रैंडम होती है। चलते और गिरते-पड़ते धीमे-धीमे वो अपना मिज़ाज और अपनी नियति ख़ुद ही चुन लेती है।
अप्रैल के महीने में कुमार गंधर्व की जन्मतिथि होती है। इसी मौक़े पर मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग देवास में हर साल उनकी स्मृति में कुमार गंधर्व समारोह करवाता है। अप्रैल के इन्हीं दिनों में पहली बार मुकुल शिवपुत्र को सुना था। गर्मियों के अलसाए हुए दिन और उबासियाँ लेती हुईं दुपहरों में। इन्हीं ख़ाली दुपहरों में बहुत इत्मिनान से मुकुल शिवपुत्र के भजन, ख़याल और ठुमरी ने भीतर कहीं जगह बनाई। हालाँकि इसके पहले कुछ हद तक पंडित कुमार गंधर्व के कुछ प्रचलित निर्गुणी भजन सुन चुके थे, प्रहलाद टिपानिया की ठेठ कबीर लोक-गायकी भी कानों तक पहुँच चुकी थी, लेकिन अप्रैल की जिस दुपहर में देवास के मल्हार स्मृति सभागार में मुकुल शिवपुत्र को सुना उस दिन हमें अपने मार्ग का संगीत (मार्ग संगीत) हासिल हो गया था।
उस साल 8 और 9 अप्रैल के दिन उस्ताद अमीर ख़ाँ के घराने इंदौर से पंडित कुमार गंधर्व के भानुकुल तक की दूरी नापी। वहाँ पहुँचकर जब देवास के मल्हार स्मृति सभागार के फ़र्श पर बैठे तो हमें यक़ीन ही नहीं हुआ कि हम किसी कलाकार या क्लासिकल जगत के सबसे बडे नाम पंडित कुमार गंधर्व के बेटे को सुन रहे हैं। यह एक दूसरी बात है कि मुकुल जी पर कुमार जी की गायिका की कोई छाया नहीं है। उस दिन किसी बेख़याल फ़क़ीर को सुनने की नेमत हासिल हुई। सभागार में उस वक़्त बमुश्किल बारह-पंद्रह लोग मौजूद रहे होंगे। लेकिन आधे-पौन घंटे में पूरा हॉल भर गया।
यह मुकुल जी के नाम का कमाल था, एके-डेढ़ घंटे के इंतिज़ार के बाद कहीं से कोई आवाज़ आई... “मुकुल आ गए हैं...” लोगों के चेहरों पर मन्नत पूरी होने का भाव-सा उभर आया। मैं भी उस अचंभे को देखने के लिए खड़ा हो गया। तक़रीबन पचास-पचपन उम्र। अधपकी दाढ़ी। खादी का भगवा कुर्ता और पीली धोती। कुर्ते के भीतर हाईनेक टीशर्ट। नितांत अकेला और नि:शब्द। निस्संग भी। बग़ैर किसी सेरेमनी के अपना तानपूरा निकाला और उसे क़रीब बीस मिनट तक ट्यून किया।
तानपूरे की थका देने वाली ट्यूनिंग, जिसकी वजह से संगीत और आयोजन के प्रति एक उच्चाटन-सा आ गया था। लग रहा था कि श्रोताओं ने अपना सारा धैर्य बीस मिनट तक चली साज़-ओ-सामान की ट्यूनिंग में ही लगा दिया है। ऐसे में अब अगर कुछ बेहतर सुनने को नहीं मिला तो क्या हासिल होगा इस महफ़िल का, लेकिन जो सुनने को मिला वह ऐसा आलम था जो पहले कभी और कहीं हासिल नहीं हुआ था। एक ऐसा लम्हा जो अब तक कहीं नहीं घटा था। पहले खरज में गला साफ़ किया, उसके बाद जो लंबा आलाप था वो आरामदायक और बेहद सुखद यात्रा में तब्दील हो गया। पहले एक ख़याल। फिर भजन और अंत में एक ठुमरी। ‘बाज़ूबंद खुल-खुल जाए...’ इस सभा ने जीवन के बहुत सारे बंधन और भीतर की गाँठे खोलकर रख दीं।
कई तरह के सुरों में गुम्फित एक फ़क़ीर की इस ध्यानस्थ सभा को सुनकर हम निकले तो बाहर आने तक बहुत कुछ बदल चुका था। यह पहला अनुभव था जब लगा था कि ज़िंदगी सुर में हो तो अवसाद, निराशा और विरह भी सुंदर लगते हैं।
अब इतने सालों बाद समझ में आता है कि कुमार गंधर्व के आँगन और उनके आलोक में पले-बढ़े होने के बावजूद मुकुल शिवपुत्र की गायकी का अपना मार्ग था। दरअस्ल, संगीत की एक ही भाषा होती है, और एक ही ग्रामर भी। फिर भी हर आदमी का संगीत अलग-अलग होता है।
हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक में पंडित कुमार गंधर्व का कोई रास्ता नहीं है, बल्कि वह ख़ुद शास्त्रीय संगीत की एक राह हैं। कुमार गंधर्व के इस विराट गायन के आलोक के बावजूद मुकुल शिवपुत्र के संगीत और उनके गायन पर उसकी कोई छाया मौजूद नहीं है। कोई प्रभाव, कोई इंप्रेशन नहीं है। यह किसी के लिए भी हैरत में डालने वाला है कि एक लिजेंडरी कलाकार की गायन-शैली का उनके बेटे पर कोई इंप्रेशन नहीं है। बावजूद इसके कि हर बेटा जीवन में किसी न किसी दिन पिता हो ही जाता है, लेकिन मुकुल शिवपुत्र वो कलाकार नहीं हैं शायद। वह अपने पिता को भीतर तो लेकर चलते हैं; लेकिन पिता की छाया बनकर नहीं जीते हैं, कम से कम अपनी कला में तो वह बहुत हद तक ऐसे नहीं हैं। वह अपनी कला में नितांत अकेले और रेअर हैं।
इस बारे में ख़ुद मुकुल शिवपुत्र का कहना है कि उनके पिता और गुरु पंडित कुमार गंधर्व ने संगीत के किसी रास्ते को नहीं चुना है, बल्कि उन्होंने ख़ुद अपना एक अलग मार्ग बनाया। उनका अपना 'मार्ग संगीत' था। गुजरे वक़्त में मार्ग संगीत को मोक्ष या मुक्ति प्राप्त करने का संगीत या एक साधन माना जाता रहा है। इसी ‘मार्ग संगीत’ को मुकुल अपने पिता कुमार गंधर्व का संगीत-मार्ग बताते हैं। कमाल की बात यह है कि मुकुल ने भी अपने पिता के इस मार्ग को नहीं चुना। उन्होंने अपना एक नया और अलग मार्ग बनाया, वरना यह कोई नई बात नहीं है कि अपने पुरखे कलाकारों और उनके घरानों की छाया और प्रतिकृति के रूप में आज भी कई हिंदुस्तानी कलाकारों के संगीत का सफ़र गुज़र-बसर कर रहा है। उनकी महफ़िलें अपने पुरखों के घरानों के नाम पर रोशन होकर झिलमिला रही हैं।
इसके ठीक उलट मुकुल शिवपुत्र ने अपने ही घराने की परंपरा को तोड़कर संगीत को अपने ढंग से जाना-समझा और रचा। शायद यही वजह रही होगी कि उन्होंने कर्नाटक संगीत की परंपरा को भी क़रीब से जाना और समझा। कर्नाटक में उन्होंने एमडी रामानाथन को अपना गुरु बनाया। वहाँ उनके पास क़रीब छह से सात महीने रहे और कर्नाटक संगीत की तालीम हासिल की, जबकि यह माना जाता रहा है कि कर्नाटकी गायन में गायिकी की दूसरी विधाओं की तरह मैलोडी नहीं होती है। कुछ ख़ास तरह के संगीत रसिक लोगों के अलावा ज़्यादा लोग इस विधा से ज़्यादा प्रभावित नहीं होते। उत्तर भारत के ज़्यादातर हिस्सों में भी वह उतना पॉपुलर नहीं है, जितना दूसरी तरह का क्लासिकल म्यूजिक प्रसिद्ध है। ऐसे में सिर्फ़ यह जानने के लिए कि कर्नाटक संगीत क्या होता है, मुकुल शिवपुत्र ने इसे सीखा और जाना; जबकि मंच पर कभी इस विधा की प्रस्तुति नहीं दी, ज़ाहिर है संगीत मुकुल जी के लिए खोज का विषय रहा है जो उन्हें अपनी स्वयं की खोज में भी मदद करता है। अपनी गायिकी को उन्होंने संस्कार की तरह अपनाया और यही वजह रही कि वह अपने गान में इतने सहज हैं; ठीक वैसे ही जैसे हम अपने जीवन के छोटे-मोटे संस्कारों के निर्वहन में सहज और सरल हैं, बने रहते हैं। मुकुल शिवपुत्र के लिए संगीत वही संस्कार रहा है। संगीत का उनका यही संस्कार हम सभी को अचंभित करता कि एक ही घराने या कुल के होने के बावजूद पंडित कुमार गंधर्व और मुकुल शिवपुत्र की गायिकी जुदा-जुदा है।
संगीत-सभाओं में प्रस्तुति के दौरान नज़र आता है कि कुमार जी की गायकी में एक मंचीय ड्रामा तैयार होता है, उनके हाथों के उतार-चढ़ाव और चेहरे के हाव-भाव ऊपर-नीचे बहते हैं। उनकी गायिकी में सुर का एक आरंभ है, एक आदि जो ऊँचा उठकर बहुत ऊँचाई पर जाता है और फिर उस ऊँचाई पर एक निर्गुणी क्लाइमैक्स तैयार करता है। उनका आलाप किसी पुकार की तरह हवा में उड़कर दार्शनिक भाव पैदा करता है और उस ऊँचाई पर ले जाकर वहीं छोड़ देता है। कुमार गंधर्व की आवाज़ में एक सुरीली लापरवाही है, यह एक दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करती है। लोक गायिकी के अंदाज़ में उनके पास एक दार्शनिक ऊँचाई है। मुकुल शिवपुत्र ठीक इसके उलट अपने निजी जीवन में ‘अनफैज़्ड’ हैं, जबकि गायकी में बिल्कुल सधे हुए और ध्यानस्थ। जीने में लापरवाह, गायन में खोजी और अंत में एक बेचैन साधक की तरह। एक रेस्टलेस सीकर।
कुमार गंधर्व ने मानो वह पा लिया था जिसकी उन्हें तलाश थी और वह अपने गान में उसका आनंद लेते हैं। मुकुल शिवपुत्र को अपने पाने पर यक़ीन नहीं है। वह लगातार खोजते रहते हैं, शून्य में अपने आलापों के बिंब खोजते रहते हैं, सुरों को खींचकर, मुट्ठी में भींचकर अपने क़रीब लाते हैं। वह ख़ुद को उतनी ही देर पाते हैं, जितनी देर वह गाते हैं। इसके बाद वह फिर से खोजने लग जाते हैं। मुकुल अपने पिता की तरह गाते समय सुनकारों से अपने हाव-भाव की मदद से कन्वर्सेशन नहीं करते। उन्हें अपने ख़याल अपनी खोज में होना ज़्यादा भाता है, इसलिए वह अपने तानपूरे से समरूप होने की कोशिश में होते हैं। गाते वक़्त शायद ही उन्हें पता होता है कि सामने कितने श्रोता बैठकर उन्हें देख-सुन रहे हैं। वह अपने में मग्न होकर अपनी खोज में निरंतर गाते रहते हैं... अंतर के भेद खोलते हुए। वैसे भी जिस ख़याल गायिकी में वह माहिर हैं, वह ध्रुपद का ही एक भेद है। वह अपनी गायिकी में भेद खोलते ही नज़र आते हैं।
उन्हें सुनना किसी क्लासिकल हाइट को हासिल करने जैसा है। गायन की एक ग्रेसफ़ुल अवस्था।
मुकुल शिवपुत्र के कई भजनों और उनकी ख़याल गायिकी में यह क्लासिकल हाइट नज़र आती है और कई बार वह अपनी शैली में से इस क्लासिकल ऊँचाई को जानबूझकर हटा लेते हैं। यहाँ वह बिल्कुल अलग हो जाते हैं। ‘जमुना किनारे मेरो गाँव...’ को गाते हुए उन्होंने अपनी शैली में एक साथ कई सारे वैरिएशन और मूड दिए हैं। इसमें भजन के आस्वाद के साथ ही उनकी आवाज़ में एक बेफ़िक्र मलंगता भी सुनाई देती है। जैसे थोड़ा बहुत गाना या गुनगुनाना जानने वाला कोई आम आदमी काम करते हुए अपनी मौज में गा रहा हो। बड़े ग़ुलाम अली ख़ान साहब की गायक़ी में यह बेफ़िक्री या मौज कुछ-कुछ जगहों में सुनने को मिलती है। कई बार वह ऐसे ही बेफ़िक्र होकर गाते थे।
‘जमुना किनारे मेरो गाँव...’ भजन में मुकुल अपने गले को भारी करके मुरकियाँ लेते हैं और पंक्ति के आख़िरी शब्द को धक्का देकर छोड़ देते हैं। ‘ऊँची हवेली’ शब्द में ‘ऊँचे’ शब्द को खींचकर बहुत ऊँचे तक ले जाना या फिर ‘हवेली’ को एक आदिम या पुरातात्विक और प्राचीनता प्रदान कर अपनी आवाज़ में लपेटना। ताकि उसमें हवेली-सी तस्वीर उभर सके। वह अपने कई ख़याल और बंदिशों में शब्दों से तस्वीर उभारने की कोशिश करते हैं। इसीलिए उनके गायन में नदी भी बहती है और हवेली भी नजर आती है। इस भजन के अंतरे की पंक्ति 'चुन-चुन कलियन सेज बिछाऊ...' में चुन-चुन को गोलाई में लेकर भक्ति का निवेदन लाना और कहना कि मैं सुबह शाम आपकी पूजा करता हूँ, इसलिए आग्रह है कि माखन खाकर जाना। इस भजन में भक्ति का आग्रह भी है और भाव भी। इसमें अपने इष्ट से दूरी का आलाप भी है जो बहुत दूर तक जाता है।
एक दूसरे भजन ‘प्रभू मोरे अवगुण चित न धरो...’ में वह किसी भक्त की तरह बेहद ही सहज गान में ध्यानस्थ नजर आते हैं, जो भजन के बोल हैं, वैसी ही तस्वीर वह अपने गायन में खींचते हैं। स्वयं को पूरी तरह से समर्पित कर अपने गुण-अवगुण के बारे में अपने प्रभु से बात करते हैं और एक बेहद सरल भक्त की तरह सहजता रचते हैं। भजन के बोल के अर्थ के मुताबिक़ ही वह आवाज़ में वैरिएशन और मोड लेकर आते हैं।
ख़याल और भजन की शैली से बिल्कुल अलग जब मुकुल राग भैरवी में ‘मेंडा बिछड़ा यार मिला दां...’ गाते हैं तो इसमें उनका एक अलग ही अंदाज़ मिलता है। इस गीत में विरह की हूक और एक सूफ़ियाना तड़प सुनाई आती है। यह बहुत हैरत में डालने वाली बात है कि ख़ालिस क्लासिकल गायक जब इस तरह का विरह गीत गाता है तो उनकी आवाज़ में पंजाबी और एक सूफ़ी रहस्य अनावृत होता है जो गाने का एक बिल्कुल अलग ढंग ही है। अपनी ठुमरी ‘बाज़ूबंद खुल-खुल जाए...’ में वह बिल्कुल अलग हैं। ख़याल और ठुमरी में वह बिल्कुल सधे हुए हैं। एक-एक शब्द को जैसे किसी चीज़ या धागे में पिरोकर रख रहे हैं। इस ठुमरी में यही सजावट है। उनके मराठी बंदिशों और भजनों में मराठी भाषा का कल्चर सुनाई आता है।
इस सब्लाइम और ग्रेसफ़ुल गायिकी को सुनने के बाद शायद ही आसानी से आप ख़ुद को किसी दूसरे कलाकार को सुनने के लिए तैयार कर सके। जैसे ठीक ऐसा ही मुझे लेखन में भी महसूस होता है। निर्मल वर्मा को पढ़ने के बाद ज़्यादातर पाठकों को किसी दूसरे लेखक को पढ़ने के लिए कई साल लग जाते हैं। निर्मल वर्मा के लेखन से मुक्त होने के बाद ही किसी दूसरे लेखक की किताब को हाथ लगाया जा सकता है। इसका कारण है अपनी कला से कलाकार का एकाकीकार होना। एक अद्वैत की सीमा के आस-पास पहुँचना और उसके बाद अपनी कला को रचना। मुकुल शिवपुत्र के मामले में मुझे कला का यही एकाकार नज़र आता है। कला के किसी एक माध्यम को चुनकर उसमें एक हो जाना। जहाँ दूसरा कोई नहीं होता है।
मुकुल शिवपुत्र को सुनना कला के साथ स्वयं का संबंध दर्शाता है। ख़ासतौर से उनके भजन और ख़याल गायिकी को सुनना। कला और कलाकार का एकरूप ही वह संसार रचता है, जिसे देखकर हम अचंभित हो जाते हैं। मुकुल को देख और सुनकर हम सब इसीलिए अचंभित हैं। वह किसी और के लिए नहीं गाते, उनका गाना उनका ख़ुद का जीना है, उनकी अपनी यात्रा है। उन्होंने संगीत को अपने जीने की शैली बनाया, और अचंभा यह है कि उन्होंने अपने पिता कुमार गंधर्व के आलोक से परे जाकर इस तरीक़े को अपनाया। यह अलग बात है कि हम उस गायन से वह लुत्फ़ हासिल करते हैं या वो हमारे भीतर की अज्ञात संभावनाओं और हमारी अनुभूतियों को छूता और छेड़ता है। उनकी खोज हमें भी प्रभावित करती है।
कोई अगर अपनी ‘खोज यात्रा’ में बेहद ईमानदार है तो निश्चित रूप से वह खोज हमें भी उनके क़रीब लेकर जाएगी। अपनी किसी भी तरह की खोज के प्रति मनुष्य का ईमानदार होना अचंभा ही पैदा करता है, चाहे वह कोई कला हो, लेखन या अध्यात्म। गायिकी की सभा में मुकुल शिवपुत्र भी वही अचंभा हैं।
स्वयं की ईमानदार खोज की स्थिति में मनुष्य का अंतर, उसका घट ही उसे हाँकता और रास्ता दिखाता है। शायद इसीलिए मुकुल शिवपुत्र को कहने-सुनने और गाने के लिए किसी मंच की ज़रूरत नहीं पड़ती। अगर आपकी कला, लेखन या आध्यात्म-दर्शन अपनी खोज में ईमानदार है तो आप उसे कहीं से भी ज़ाहिर कर सकते हैं, किसी भी जगह से दुनिया के सामने उसे पहुँचा सकते हैं। पिछले सालों अपनी फक्कड़ मिज़ाजी के दौरान मुकुल शिवपुत्र को सड़क पर या किसी पेड़ के नीचे अकेले बैठकर गाता देखा गया था। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने कई दफ़ा बड़े समारोह में जाने से ऐन वक़्त पर इनकार कर दिया था, वहीं कभी जबलपुर तो कभी इंदौर और होशंगाबाद में कहीं तानपूरा ट्यून कर गाते सुना गया। फिर किसी दिन पता चलता है कि वह नेमावर में किसी आश्रम में हैं। नर्मदा किनारे किसी बाबा की कुटिया में धुनी रमा रहे हैं, वहीं डेरा जमाया है, रात के अँधेरे में। आश्रम के आस-पास कहीं किसी गौशाला के बाज़ू में बैठेते हैं, जहाँ गायों की ख़ुरों की आवाज़ें आती हैं रात भर। वहीं अँधेरे में भाँग घिसते-घोटते हैं और कभी-कभार मन होता है तो गुनगुना लेते हैं। कई बार जब मन करता है तो आटा गूँथ लेते हैं और बाटियाँ बनाते हैं कच्ची-पक्की और गुनगुनाते रहते हैं... मालकौंस या कोई ठुमरी। कभी निर्गुण गाते हैं, कभी मन हुआ तो अपना प्रिय ख़याल। फिर किसी शाम में हनुमान-चालीसा भी गाते-गुनगुनाते हैं। घाट से सटी उस कुटिया से तानपूरे और आलाप की हल्की खरज नर्मदा के किनारों से टकराती रहती है हरदम। किनारों के सामसूम अँधेरे और नदी का सँवलाई उजाला उनके सभी रागों और आलापों को जानता और पहचानता है। देवास से लेकर इंदौर और नेमावर से लेकर भोपाल की सीमाएँ उनके रियाज़ की गवाह है। पूरा मालवा उनके जीवन की खोज और उनके कला में गुम हो जाने और एक हो जाने की भाषा को जानता-समझता है।
कभी किसी अँधेरे से पूछेंगे तो बताएगा पता उनका, और नदी का घाट कोई कहेगा... हाँ, यहीं इसी जगह मुकुल शिवपुत्र ने अपना गाम बसाया है, मन लगाया है।
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