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आदमी अब हो गइल

adami ab ho gail

कृष्णानन्द कृष्ण

कृष्णानन्द कृष्ण

आदमी अब हो गइल

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    आदमी अब हो गइल बासी खबर अखबार के

    बन गइल बा आदमी बस चीज अब बाजार के

    खूब होला रोज चरचा आदमी के हर गली

    बात मानीं उठ गइल अरथी इहाँ से प्यार के

    चुप हवा के साथ में गुमसुम चलेला कापुरुष

    बीर होला आदमी उलटा बहे जे धार के

    लूट लेलस आदमी के लोग ओकर आपने

    हाल मत पूछीं भइल का हाल अब सरदार के

    'कृष्ण' कइसे बात मन के सामने सबके कहस

    हाल अब गड़बड़ भइल बा देख लीं दरबार के

    स्रोत :
    • पुस्तक : नया सूरज चढ़ल जाता (पृष्ठ 39)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2000

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