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अहाँ जीबिते मनुक्खकेँ जरा रहल छी

ahan jibite manukkhken jara rahal chhi

कलानन्द भट्ट

कलानन्द भट्ट

अहाँ जीबिते मनुक्खकेँ जरा रहल छी

कलानन्द भट्ट

और अधिककलानन्द भट्ट

    अहाँ जीबिते मनुक्खकेँ जरा रहल छी

    घेरि गामेकेँ स्वाहा करा रहल छी।

    हाथ पीड़ाक धनगर विकट शोरमे

    दानवी-वृत्तिकेँ दनदना रहल छी।

    ने बूझल बूढ़, नेना, ने मौगी, मरद

    भागय जे बन्नुकसँ उड़ा रहल छी।

    मनुष्यता भागल क्रूरतासँ अहाँक

    सामंती-प्रथा पुनि चला रहल छी।

    कने सोचू कोना खींचि नूआ अहाँ

    पांचालीकेँ नङटे बना रहल छी।

    कोरवी तत्व लऽ अहाँ शकुनि बनल

    नरमेघक पासा रचा रहल छी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कान्ह पर लहास हमर [मैथिली गजल संग्रह] (पृष्ठ 12)
    • रचनाकार : कलानन्द भट्ट
    • प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
    • संस्करण : 1983

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