Font by Mehr Nastaliq Web

तपी सूरज बहुत

tapi suraj bahut

अशोक द्विवेदी

अशोक द्विवेदी

तपी सूरज बहुत

अशोक द्विवेदी

और अधिकअशोक द्विवेदी

    तपी सूरज बहुत बाकिर साँझ खा ढलबे करी

    बा अन्हार का, कहीं कवनो दिया जलबे करी

    बदरी-बदरी दिन में करिया रात के बाटे असर

    नीक दिन आई सूरज के पता चलबे करी

    खाली समझौता सुबह से साँझि ले बा जिन्दगी

    अपना खुद्दारी का कारन कुछ सजा मिलबे करी

    रोशनाई से लिखल दउरा सकेला खून के

    जाग जाई सब समझीं, किला ढहबे करी

    हिलल पपनी, तनी हरकत देह में जाये दीं

    ओठ के लाली हँसी के रंग से खिलबे करी

    स्रोत :
    • पुस्तक : फूटल किरिन हजार (पृष्ठ 110)
    • रचनाकार : अशोक द्विवेदी
    • प्रकाशन : पाती प्रकाशन, बलिया
    • संस्करण : 2003

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY