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हम नदी के दो किनारे

hum nadi ke do kinare

विशाल समर्पित

विशाल समर्पित

हम नदी के दो किनारे

विशाल समर्पित

और अधिकविशाल समर्पित

    हम नदी के दो किनारे

    चाह कर भी मिल पाए

    मधु-मिलन के मंत्र पावन

    रात-दिन हमने पढ़े थे

    बंधनो की आस बाँधे

    भुज प्रतीक्षारत खड़े थे

    किंतु पग जड़ पर्वतों सम

    लेश भर भी हिल पाए

    हम नदी के दो किनारे

    चाह कर भी मिल पाए

    जब कभी तुमको भुलाया

    तीव्र-गति से याद आई

    दर्द की दारुण कहानी

    झूम कर हमने सुनाई

    इस जहाँ के मन मुताबिक़

    होंठ अपने सिल पाए

    हम नदी के दो किनारे

    चाह कर भी मिल पाए

    दोष इतना था हमारा

    देखते थे मिलन सपना

    इस मिलन की चाह ने हाँ

    खो दिया हर एक अपना

    आँख उपवन में कभी भी

    फूल सुंदर खिल पाए

    हम नदी के दो किनारे

    चाह कर भी मिल पाए

    स्रोत :
    • रचनाकार : विशाल समर्पित
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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