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माया मोह में भुलइली

maya moh mein bhulaili

रामजियावान दास ‘बावला’

रामजियावान दास ‘बावला’

माया मोह में भुलइली

रामजियावान दास ‘बावला’

और अधिकरामजियावान दास ‘बावला’

    माया मोह में भुलइली योग जप कुछऊ ना कइली।

    धइली अपने सिर पर पाप कै गठरिया सजनी॥

    बालपन सब खेल में बीतल युवती संग जवानी

    गजर बजर में सब दिन बीतल अब आइल लटकानी।

    हानी भइलीं बीतल धोखे में उमरिया सजनी॥

    दान में कबों हाथ बँटवली ना कइली शुभ काम

    गर्व में सब दिन भूल के संचत रहली धन धाम।

    राम कवने गुन पर लेइहैं मोर खबरिया सजनी॥

    साधुन संग अनुराग कइली रहली बनल अकेला।

    कोई के कुछ भी ना जनली स्वयं गुरु अरु चेला।

    खेला अजब तरह कै माया कै नगरिया सजनी॥

    रात दिन यह सोचैं पुजारी, करनी बुरी हमारी।

    अन्त समय कोई काम अइहैं सुत कुटुम्ब अरु नारी।

    भारी 'बावला' के दिल में रहै फिकिरिया सजनी॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : गीत मंजरी
    • संपादक : हरिराम द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
    • रचनाकार : रामजियावान दास ‘बावला’
    • प्रकाशन : सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2021

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