बेड़ी पड़ि गइल पाँव में
beDi paDi gail paanv mein
रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’
Rambahadur ‘Adhir Pindvi’
बेड़ी पड़ि गइल पाँव में
beDi paDi gail paanv mein
Rambahadur ‘Adhir Pindvi’
रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’
और अधिकरामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’
चलऽ चलीं दूर कहीं अब,
पीपल वाली छाँव में।
उलटी हवा बहे लागल बा
अब तऽ अपनी गाँव में॥
मंदिर मस्जिद के बतिया,
अब होखे ला खलिहान में।
ना जाने कवन भरि दिहलसि,
जहर ई सबकी कान में॥
एही बाति में कतल हो गइल,
अबकी अपनी गाँव में॥ चल...
चौराहा पर ठेका खूलल,
खुलेआम बीके दारू।
मंदिर की मूरति चोरी में,
पकड़ि के जाला खेदारू॥
सीधा साधा एक गरीब के,
बेड़ी पड़ि गइल पाँव में॥ चल...
भाई चारा खतम हो गइल,
कटुता बढ़लऽ जाता।
सबके मन द्वेश भरल बा,
प्रेम घटल अब जाता॥
एक दूसरे पर घात लगवले,
सब बा अपनी दाँव में॥ चल...
लछुमन जइसन भाई अब ना,
ना सीता जस भउजाई।
मेहरी की देखला में दोसी,
जब लागे सबके माई॥
घर-घर में बटवारा हो गइल,
अब तऽ अपनी गाँव में॥ चल...
- पुस्तक : गँउवा के माटी अनमोल (पृष्ठ 30)
- रचनाकार : रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’
- प्रकाशन : अखिल भारतीय भोजपुरी समाज, गोमतीनगर, लखनऊ
- संस्करण : 2010
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