एक राजा थे। उनका नाम था विक्रमादित्य। वह हमेशा पूजा-पाठ में लीन रहते थे। उनका यह प्रण था कि पूजा-पाठ के बाद सवा मन सोना दान करने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करेंगे और वह नित्य ऐसा ही करते थे।
राजा विक्रमादित्य के राज्य में एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। उसे खाने-पीने के भी लाले पड़े रहते थे। सब दिन भीख माँगकर अपना और अपने परिवार का पेट भरता था। जो मिल जाता था, उसी से गुज़ारा कर लेता था। एक दिन तो बड़ी ही विकट स्थिति उत्पन्न हो गई। चारों तरफ़ आँधी-तूफ़ान। पानी बरस रहा था। लोगों का घर से बाहर निकलना दूभर हो गया था। ऐसे में बेचारा ब्राह्मण क्या करे? यदि घर से न निकले तो उसके परिवार का पेट कैसे भरे? घर में एक भी दाना नहीं था। उस दिन दोनों मियाँ-बीवी ने उपवास रख लिया। और कोई चारा भी तो नहीं था। परिस्थितिवश ऐसा करते उन्हें तीन-चार दिन हो गए थे और भूख-प्यास की ऐसी स्थिति में भी घर से निकलना नहीं हो पा रहा था।
चार दिन बाद जब आँधी-तूफ़ान थम गया और वर्षा बंद हुई तो ब्राह्मण भीख माँगने निकला। भीख माँगते-माँगते वह एक ऐसे दरवाज़े पर पहुँचा जहाँ एक बुढ़िया निकली। ब्राह्मण की दयनीय दशा देखकर वह बोली, “हे विप्र ब्राह्मण! यदि तुम्हें भीख ही माँगनी है तो तुम राजा विक्रमादित्य के दरबार में क्यों नहीं जाते हो। वह सुबह-सुबह पूजा-पाठ के बाद सवा मन सोना दान करते हैं। इसलिए यदि तुम्हें मिल जाता है तो तुम्हारा दलिदर ही भाग जाएगा।”
ब्राह्मण ने जब यह सुना तो उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। दूसरे दिन वह राजा विक्रमादित्य के दरबार में सबसे पहले पहुँचने वालों में से था। उस समय राजा अपने दिनचर्या के अनुसार पूजा-पाठ में लीन थे। जब वह अपनी पूजा समाप्त कर दरबार में आए तब सबसे पहला व्यक्ति जो दिखा वह वही विप्र ब्राह्मण था। राजा ने एक लोटा पानी लेकर उसके पैर पखारे। वह ब्राह्मण पैर धोकर पालथी मारकर खाने के लिए बैठ गया। राजा ने उसे छप्पन प्रकार का भोग परोसा और खा-पीकर जब जाने को हुआ तब उसे सवा मन सोना दान देकर विदा किया। यह सब आव-भगत, छप्पन प्रकार के भोग का रसास्वादन और फिर सवा मन सोना पाकर वह ब्राह्मण फूला नहीं समा रहा था। आज उसकी दीनता उड़न छू हो गई थी। इस बात से वह मन-ही-मन बहुत ख़ुश हो रहा था और रास्ता नाप रहा था।
परंतु यह क्या? वह ब्राह्मण थोड़ी ही दूर चला होगा कि वह घनघोर जंगल में पहुँच गया। हालाँकि वह जंगल उसके गाँव के रास्ते में ही पड़ता था। पर था तो जंगल ही न। सुनसान और निर्जन वन। उसे ऐसा आभास हुआ कि कोई उसका पीछा कर रहा है। वह और तेज़ी से अपना क़दम बढ़ाने लगा। बड़े-बड़े डग भरने लगा। पर यह क्या? पीछा करता वह व्यक्ति उसके और निकट आता जा रहा था। देखते-ही-देखते वह उसके सामने आकर खड़ा हो गया । पर यह क्या? यह तो राजा विक्रमादित्य हैं। उस आदमी की शक्ल बिलकुल राजा विक्रमादित्य से मिल रही थी। वह व्यक्ति ब्राह्मण से उसकी मोटरी छीन कर चलता बना। ब्राह्मण यह सब देखकर अवाक् रह गया।
उदास मन से जब वह ब्राह्मण घर पहुँचा तो ब्राह्मणी ने बड़े प्यार से पूछा, “राजा के दरबार में अहाँ के भीख में कि भेटल अछि?” ब्राह्मण को कुछ बोलते नहीं बन रहा था। बड़े भारी मन से उसने अपनी पत्नी को सारा हाल कह सुनाया कि राजा ने ख़ूब आव-भगत किया, सवा मन सोना भी दान में दिया। परंतु आते समय रास्ते में सबकुछ स्वयं छीन लिया। ब्राह्मणी भी बहुत उदास हो गई और भीख से जो भी थोड़ा-बहुत मिला था, वही बनाकर खाया-पीया और किसी तरह रात गुज़ारी।
दूसरे दिन ब्राह्मण फिर राजा विक्रमादित्य के दरबार में पहुँच गया। राजा ने फिर वैसे ही पूजा-पाठ समाप्ति उपरांत एक लोटा जल से उसके पाँव पखारे और छप्पन प्रकार का भोग परोसा। भोजनोपरांत जब राजा सवा मन सोना देकर विदाई करने लगे तब ब्राह्मण ने कहा, “सरकार, ई हमरा नहि देल जाओ। जखन अपने हमरासँ रस्तामे छीनिए लेब तँई लऽ कऽ की होयत?”
राजा विक्रमादित्य यह बात सुनकर बड़े आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि मेरे राज्य में ऐसा कौन कर सकता है और किसकी हिम्मत हो सकती है कि मेरे दिए दान को मेरा ही रूप धारण कर लूट ले। मैं तो कहीं गया भी नहीं।
उन्होंने ब्राह्मण से कहा, “हे ब्राह्मण! मैं जब आपको सोना दान में दे रहा हूँ तो फिर छिनूँगा क्यों? ज़रूर कोई मेरी वेश-भूषा धारण कर ऐसी हरकत कर रहा है। मुझे तो आश्चर्य हुआ कि कल ही मैंने आपको दान दिया और आज पुनः आप यहाँ उपस्थित कैसे हो गए। मेरे द्वारा दान ग्रहण करने के बाद दोबारा कोई यहाँ आता नहीं जल्दी।”
इतना सुनकर ब्राह्मण ने सारा क़िस्सा कह सुनाया कि जब मैं आपके यहाँ से दान की पोटली लेकर अपने गाँव की ओर चला तो रास्ते में पड़ने वाले जंगल में पहले तो मेरा किसी ने पीछा किया फिर अचानक मेरे सामने उपस्थित होकर सारा सामान छीन लिया। वह देखने में बिल्कुल आपकी तरह लग रहा था।
राजा उधेड़बुन में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि जो ब्राह्मण से धन छीन रहा है, उसका पता लगाना चाहिए। उन्होंने ब्राह्मण से कहा कि आप तो इस दान को स्वीकार कर लो और उसे दान देकर विदा किया। साथ ही राजा भी थोड़ी दूरी बनाकर ब्राह्मण के पीछे-पीछे चल दिए। वह जैसे ही जंगल की ओर बढ़ा, वैसे ही पिछली बार की तरह एक व्यक्ति जो बिल्कुल राजा की तरह ही दिख रहा था, अचानक ब्राह्मण के पास पहुँचकर उससे उसकी दान की पोटली छीनने की कोशिश करने लगा। देखते ही देखते राजा विक्रमादित्य भी अपने अंगरक्षकों के साथ वहाँ पहुँच गए और उसे धर दबोचा।
राजा ने उस रूपधारी व्यक्ति से पूछा, “अहाँ के छी?”
उसने कहा, “मैं इस ब्राह्मण का दलिदर हूँ। मुझे बारह वर्ष तक इस ब्राह्मण के साथ रहना है। इसलिए मैंने इसका धन छीन लिया।”
विक्रमादित्य ने कहा, “मेरा दान किया धन आप कैसे छीन सकते हो?”
इस पर दलिदर ने कहा, “सरकार! यदि इस ब्राह्मण के पास आपका धन रहेगा तो यह धनी हो जाएगा, जबकि इसके भाग्य में धनी होना लिखा ही नहीं है, इसलिए मुझे इसके साथ ही रहना है। यदि इसके पास धन रहेगा तो मैं फिर कहाँ जाऊँगा और किसके साथ रहूँगा?”
राजा विक्रमादित्य ने कहा, “हे दलिदर महाराज! क्या कोई और उपाय नहीं हो सकता कि आप इस ब्राह्मण को छोड़ दें?”
इस पर दलिदर ने कहा, “हे महाराज! उपाय क्यों नही है? यदि कोई दूसरा व्यक्ति अपने माथे पर मुझे स्थान दे देगा तो मैं उसके साथ रह लूँगा और इस ब्राह्मण का साथ छोड़ दूँगा।”
इतना सुनने के बाद राजा विक्रमादित्य ने दलिदर का बोझ अपने माथे पर ले लिया और उस ब्राह्मण को उसकी पोटली के साथ विदा कर दिया। अब दलिदर राजा विक्रमादित्य के माथे पर सवार हो गया और उसने कहा, “हे महाराज! हम अब जखन अहाँ संगे रहब तक सभ दिन अहाँक अंग-भंग होइत रहत!”
राजा विक्रमादित्य ने कहा, “हे दलिदर महाराज! आप मेरे साथ रहिए और मेरे साथ जो भी अनिष्ट करना है, करिए। मेरा बस आपसे यही वरदान चाहिए कि मुझे न कभी भूख लगे और न प्यास।”
दलिदर महाराज ने कहा, “एवमस्तु!”
विक्रमादित्य के ऊपर दलिदर के सवार होते ही उसका राजपाट छिन गया। महल खंडहर हो गया। अंत में राजा विक्रमादित्य अपना महल छोड़कर जंगल की ओर चल दिए।
तो यह था राजा विक्रमादित्य का त्याग! उन्होंने अपना भला न सोचकर उस विप्र ब्राह्मण का भला सोचा, उसका कल्याण किया और उससे छिनी गई उसकी पोटली उसे वापस दिलाई।
उसके भले के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया और यह जानते हुए भी अपने ऊपर दलिदर को धारण किया कि मेरा सर्वस्व लुट जाएगा, बर्बाद हो जाएगा। उन्होंने अपनी भलाई न सोचकर अपनी प्रजा की भलाई सोची। शायद ऐसे ही राजा को प्रजावत्सल कहते हैं । धन्य हैं राजा विक्रमादित्य और धन्य है यह धरती जिसने ऐसे राजा को जन्म दिया और उन्हें इतना बड़ा त्याग करने को तत्पर किया।
ek raja the. unka naam tha vikramaditya. wo hamesha puja paath mein leen rahte the. unka ye pran tha ki puja paath ke baad sava man sona daan karne ke baad hi ann jal grhan karenge aur wo nitya aisa hi karte the.
raja vikramaditya ke rajya mein ek nirdhan brahman rahta tha. use khane pine ke bhi lale paDe rahte the. sab din bheekh mangakar apna aur apne parivar ka pet bharta tha jo mil jata tha, usi se guzara kar leta tha. ek din to baDi hi vikat sthiti utpann ho gai. charon taraf andhi tufan. pani baras raha tha. logon ka ghar se bahar nikalna dubhar ho gaya tha. aise mein bechara brahman kya kare? yadi ghar se na nikle to uske parivar ka pet kaise bhare? ghar mein ek bhi dana nahin tha. us din donon miyan bivi ne upvaas rakh liya aur koi chara bhi to nahin tha. paristhitivash aisa karte unhen teen chaar din ho ge the aur bhookh pyaas ki aisi sthiti mein bhi ghar se nikalna nahin ho pa raha tha.
chaar din baad jab andhi tufan tham gaya aur varsha band hui to brahman bheekh mangne nikla. bheekh mangte mangte wo ek aise darvaze par pahuncha jahan ek buDhiya nikli. brahman ki dayniy dasha dekhkar wo boli, “he vipr brahman! yadi tumhein bheekh hi mangni hai to tum raja vikramaditya ke darbar mein kyon nahin jate ho. wo subah subah puja paath ke baad sava man sona daan karte hain. isliye yadi tumhein mil jata hai to tumhara dalidar hi bhaag jayega. ”
brahman ne jab ye suna to uski khushi ka thikana nahin raha. dusre din wo raja vikramaditya ke darbar mein sabse pahle pahunchne valon mein se tha. us samay raja apne dincharya ke anusar puja paath mein leen the. jab wo apni puja samapt kar darbar mein aaye tab sabse pahla vyakti jo dikha wo vahi vipr brahman tha. raja ne ek lota pani lekar uske pair pakhare. wo brahman pair dhokar palathi markar khane ke liye baith gaya. raja ne use chhappan prakar ka bhog parosa aur kha pikar jab jane ko hua tab use sava man sona daan dekar vida kiya. ye sab aav bhagat, chhappan prakar ke bhog ka rasasvadan aur phir sava man sona pakar wo brahman phula nahin sama raha tha. aaj uski dinta uDan chhu ho gai thi. is baat se wo man hi man bahut khush ho raha tha aur rasta naap raha tha.
parantu ye kyaa? wo brahman thoDi hi door chala hoga ki wo ghanghor jangal mein pahunch gaya. halanki wo jangal uske gaanv ke raste mein hi paDta tha. par tha to jangal hi na. sunsan aur nirjan van. use aisa abhas hua ki koi uska pichha kar raha hai. wo aur tezi se apna qadam baDhane laga. baDe baDe Dag bharne laga. par ye kyaa? pichha karta wo vyakti uske aur nikat aata ja raha tha. dekhte hi dekhte wo uske samne aakar khaDa ho gaya. par ye kyaa? ye to raja vikramaditya hain. us adami ki shakl bilkul raja vikramaditya se mil rahi thi. wo vyakti brahman se uski motari chheen kar chalta bana. brahman ye sab dekhkar avak rah gaya.
udaas man se jab wo brahman ghar pahuncha to brahmni ne baDe pyaar se puchha, “raja ka darbar mein ahan bheekh mein ki bhetal achhi?” brahman ko kuch bolte nahin ban raha tha. baDe bhari man se usne apni patni ko sara haal kah sunaya ki raja ne khoob aav bhagat kiya, sava man sona bhi daan mein diya. parantu aate samay raste mein sabkuchh svayan chheen liya. brahmni bhi bahut udaas ho gai aur bheekh se jo bhi thoDa bahut mila tha, vahi banakar khaya piya aur kisi tarah raat guzari.
dusre din brahman phir raja vikramaditya ke darbar mein pahunch gaya. raja ne phir vaise hi puja paath samapti upraant ek lota jal se uske paanv pakhare aur chhappan prakar ka bhog parosa. bhojnoprant jab raja sava man sona dekar vidai karne lage tab brahman ne kaha, “sarkar, ii hamra nahi del jao. jakhan apne hamarasan rastame chhiniye leb tanii laऽ kaऽ ki hoyat?”
raja vikramaditya ye baat sunkar baDe ashcharya mein paD ge. unhonne socha ki mere rajya mein aisa kaun kar sakta hai aur kiski himmat ho sakti hai ki mere diye daan ko mera hi roop dharan kar loot le. main to kahin gaya bhi nahin.
unhonne brahman se kaha, “he brahman! main jab aapko sona daan mein de raha hoon to phir chhinunga kyon? zarur koi meri vesh bhusha dharan kar aisi harkat kar raha hai. mujhe to ashcharya hua ki kal hi mainne aapko daan diya aur aaj punः aap yahan upasthit kaise ho ge. mere dvara daan grhan karne ke baad dobara koi yahan aata nahin jaldi. ”
itna sunkar brahman ne sara qissa kah sunaya ki jab main aapke yahan se daan ki potli lekar apne gaanv ki or chala to raste mein paDne vale jangal mein pahle to mera kisi ne pichha kiya phir achanak mere samne upasthit hokar sara saman chheen liya. wo dekhne mein bilkul apaki tarah lag raha tha.
raja udheDbun mein paD ge. unhonne socha ki jo brahman se dhan chheen raha hai, uska pata lagana chahiye. unhonne brahman se kaha ki aap to is daan ko svikar kar lo aur use daan dekar vida kiya. saath hi raja bhi thoDi duri banakar brahman ke pichhe pichhe chal diye. wo jaise hi jangal ki or baDha, vaise hi pichhli baar ki tarah ek vyakti jo bilkul raja ki tarah hi dikh raha tha, achanak brahman ke paas pahunchakar usse uski daan ki potli chhinne ki koshish karne laga. dekhte hi dekhte raja vikramaditya bhi apne angrakshkon ke saath vahan pahunch ge aur use dhar dabocha.
raja ne us rupdhari vyakti se puchha, “ahan ke chhee?”
usne kaha, “main is brahman ka dalidar hoon. mujhe barah varsh tak is brahman ke saath rahna hai. isliye mainne iska dhan chheen liya. ”
is par dalidar ne kaha, “sarkar! yadi is brahman ke paas aapka dhan rahega to ye dhani ho jayega, jabki iske bhagya mein dhani hona likha hi nahin hai, isliye mujhe iske saath hi rahna hai. yadi iske paas dhan rahega to main phir kahan jaunga aur kiske saath rahunga?”
raja vikramaditya ne kaha, “he dalidar maharaj! kya koi aur upaay nahin ho sakta ki aap is brahman ko chhoD den?”
is par dalidar ne kaha, “he maharaj! upaay kyon nahi hai? yadi koi dusra vyakti apne mathe par mujhe sthaan de dega to main uske saath rah lunga aur is brahman ka saath chhoD dunga. ”
itna sunne ke baad raja vikramaditya ne dalidar ka bojh apne mathe par le liya aur us brahman ko uski potli ke saath vida kar diya. ab dalidar raja vikramaditya ke mathe par savar ho gaya aur usne kaha, “he maharaj! hum ab jakhan ahan sange rahab tak sabh din ahank ang bhang hoit raht!”
raja vikramaditya ne kaha, “he dalidar maharaj! aap mere saath rahiye aur mere saath jo bhi anisht karna hai, kariye. mera bas aapse yahi vardan chahiye ki mujhe na kabhi bhookh lage aur na pyaas. ”
dalidar maharaj ne kaha, “evmastu!”
vikramaditya ke uupar dalidar ke savar hote hi uska rajapat chhin gaya. mahl khanDhar ho gaya. ant mein raja vikramaditya apna mahl chhoDkar jangal ki or chal diye.
to ye tha raja vikramaditya ka tyaag! unhonne apna bhala na sochkar us vipr brahman ka bhala socha, uska kalyan kiya aur usse chhini gai uski potli use vapas dilai aur uske chakkar mein apna sarvasv nyochhavar kar diya arthat apne uupar dalidar ko dharan kiya ye jante hue bhi ki mera sarvasv lut jayega, barbad ho jayega. unhonne apni bhalai na sochkar apni praja ki bhalai sochi. shayad aise hi raja ko prjavatsal kahte hain. dhanya hain raja vikramaditya aur dhanya hai ye dharti jisne aise raja ko janm diya aur unhen itna baDa tyaag karne ko tatpar kiya.
ek raja the. unka naam tha vikramaditya. wo hamesha puja paath mein leen rahte the. unka ye pran tha ki puja paath ke baad sava man sona daan karne ke baad hi ann jal grhan karenge aur wo nitya aisa hi karte the.
raja vikramaditya ke rajya mein ek nirdhan brahman rahta tha. use khane pine ke bhi lale paDe rahte the. sab din bheekh mangakar apna aur apne parivar ka pet bharta tha jo mil jata tha, usi se guzara kar leta tha. ek din to baDi hi vikat sthiti utpann ho gai. charon taraf andhi tufan. pani baras raha tha. logon ka ghar se bahar nikalna dubhar ho gaya tha. aise mein bechara brahman kya kare? yadi ghar se na nikle to uske parivar ka pet kaise bhare? ghar mein ek bhi dana nahin tha. us din donon miyan bivi ne upvaas rakh liya aur koi chara bhi to nahin tha. paristhitivash aisa karte unhen teen chaar din ho ge the aur bhookh pyaas ki aisi sthiti mein bhi ghar se nikalna nahin ho pa raha tha.
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हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों का व्यापक शब्दकोश : हिन्दवी डिक्शनरी
‘हिन्दवी डिक्शनरी’ हिंदी और हिंदी क्षेत्र की भाषाओं-बोलियों के शब्दों का व्यापक संग्रह है। इसमें अंगिका, अवधी, कन्नौजी, कुमाउँनी, गढ़वाली, बघेली, बज्जिका, बुंदेली, ब्रज, भोजपुरी, मगही, मैथिली और मालवी शामिल हैं। इस शब्दकोश में शब्दों के विस्तृत अर्थ, पर्यायवाची, विलोम, कहावतें और मुहावरे उपलब्ध हैं।
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