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यात्रा नहीं अपने भीतर थोड़ी-सी जगह बनाने का वृत्तांत

 

अकेले यात्रा करने की इच्छा कई सालों से मन में पल रही थी। इसके कई कारण थे। पहला तो यह कि मैं बहुत एकांतप्रिय मनुष्य हूँ, जो अकेले रहने के अवसर खोजता रहता है। मेरे मस्तिष्क में एक अलग ही समानांतर दुनिया हर वक़्त चलती रहती है और सबके साथ रहते हुए उस दुनिया में स्वतंत्रतापूर्वक विचरण कर पाना संभव नहीं हो पाता। अक्सर दुनियादारी की उलझनें उस दुनिया से मेरा संपर्क तोड़ देती हैं।

दूसरा कारण यह कि एक पत्नी और एक माँ की तरह यात्रा करते हुए घर और ज़िम्मेदारियाँ भी साथ यात्रा करती हैं। अक्सर महिलाएँ यात्रा में भी वही कर रही होती हैं, जो वे घर पर करती हैं। परिवार के साथ यात्रा से लौटने पर कोई मुझसे पूछता कि यात्रा कैसी रही, तो मैं कभी उसे किसी सुखद और अभूतपूर्व अनुभव की तरह नहीं देख पाती।

यह मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण है। हो सकता है, दूसरी महिलाओं के अनुभव मेरे जैसे न हों, मगर मेरे साथ अक्सर ऐसा ही रहा है। शायद यह मेरे स्वभाव के कारण हो। यह भी कि परिवार के साथ यात्रा करते हुए अक्सर सारी चीज़ें सबके हिसाब से तय हो रही होती हैं—कहाँ जाना है, कब जाना है, क्या खाना है। व्यक्तिगत चयन की गुंजाइश न के बराबर ही होती है। तो मुझे करनी थी एक ऐसी यात्रा, जिसमें सारे चुनाव मेरे हों, जिसमें मैं अपने साथ रह सकूँ और जिसमें मुझे किसी के लिए कुछ भी न करना पड़े।

जब भी मैं घर पर इस बारे में बात करती, सभी कहने लगते कि अकेले घूमने का क्या मतलब है, अकेले घूमने में क्या ही अच्छा लगेगा, फ़ैमिली ट्रिप प्लान कर लेते हैं वग़ैरा-वग़ैरा।

जिस परिवेश से मैं आती हूँ, वहाँ शायद ही कोई महिला ऐसा करने के बारे में सोचती हो। इसलिए मुझे भी मानसिक रूप से इसके लिए तैयार होने में समय लगा।

अपने परिवेश में जो असामान्य दिखता है, उसे करने के लिए कई बार दूसरों के साथ-साथ स्वयं से भी लड़ना होता है। दूसरों के साथ-साथ ख़ुद को भी ‘कन्विंस’ करना पड़ता है।

बहुत समय से मैं इस विषय में योजना बनाती रही थी और किसी न किसी कारण वे योजनाएँ रद्द होती रही थीं। बीते फ़रवरी, जब उचाट मन में फिर यह इच्छा कुलबुलाने लगी, तो होली बीत जाने के बाद जाने का प्लान बनाया। मेरे परिवारीजन कोई विशेष आपत्ति तो नहीं जता रहे थे, मगर इसे किसी विचित्र मूर्खता की तरह ज़रूर देख रहे थे। इस बार भी उन्हें लग रहा था कि मैं हमेशा की तरह यूँ ही किसी उन्माद में कह रही हूँ, पर करूँगी नहीं। मगर मेरे लिए यह उन्माद नहीं, एक ऐसी ज़रूरत थी, जिसे पूरा करना ख़ुद से जुड़ने के लिए ज़रूरी था और जिसे अब और टाला नहीं जा सकता था।

कहाँ जाना है, यह चुनाव करते हुए कुछ बातें दिमाग़ में थीं। यह पहली एकल यात्रा थी और समय कम था, इसलिए बहुत दूर नहीं जाना था। यातायात की बहुत अधिक पेचीदगियाँ न हों और यह भी कि जहाँ पहले कभी घूमने न गई होऊँ। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए ऋषिकेश का चुनाव किया गया।

मैं बहुत सुनियोजित यात्रा नहीं करना चाहती थी, इसलिए किसी बस, टैक्सी या ट्रेन में आरक्षण किए बिना सरकारी परिवहन की बस से यात्रा करने का मन बनाया। पहले से घूमने की कोई रूपरेखा नहीं बनाई। केवल होटल में बुकिंग अवश्य करा ली, ताकि रात-बिरात पहुँचने पर होटल ढूँढ़ने और कमरे की उपलब्धता-अनुपलब्धता जैसी समस्या का सामना न करना पड़े।

5 मार्च 2026 की दुपहर को झोला उठाकर चल देने के बजाय ट्रॉली बैग घसीटते हुए मैं घर से निकल गई। खुर्जा से ऋषिकेश के लिए कोई बस नहीं थी, वह मेरठ से मिलनी थी, इसलिए पहला पड़ाव मेरठ का तय हुआ। मेरठ पहुँचते-पहुँचते, जाम में फँसते-फँसाते और बस बदलते-बदलते लगभग चार बज चुके थे।

चूँकि यह होली के अगले दिन की बात थी, इसलिए रास्ते भर रंग-बिरंगे लोग नज़र आते रहे। त्योहार की मस्ती और ख़ुशी को समेटकर वापस अपने काम पर लौटते लोग थे। त्योहार पीछे छूट रहा था, रोज़मर्रा की ज़िंदगी अपने ढर्रे पर लौट रही थी। आजकल किसी को इतनी फ़ुर्सत कहाँ कि ठहरकर ज़िंदगी को जी सके। घर से बाहर निकलते ही लगता है, जैसे किसी रेस में आ गए हैं, जहाँ बिना भागे काम नहीं चलेगा। सब भाग रहे हैं, मगर कोई कहीं पहुँच नहीं रहा। अजीब-सी मारा-मारी है हर तरफ़।

होली के बाद बदलते मौसम में गर्मी का असर तेज़ लगने लगा था। धूप चिलचिली थी। पिछले कुछ सालों में मौसमों के बदलने की प्रक्रिया भी बदल-सी गई है। सर्दी और गर्मी के बदलाव के बीच जो एक ख़ुशनुमा-सा मौसम कुछ दिन रहा करता था, वह अब कम महसूस होता है या फिर उसे महसूस करने की सलाहियत ही नहीं रही हममें।

मेरठ बस स्टैंड पर ऋषिकेश जाने वाली बस लग चुकी थी। अभी कोई सवारी उसमें बैठी नहीं थी। मैं बस में बैठ गई और फ़ोन पर ऋषिकेश पर्यटन से जुड़े वी-लॉग देखने लगी। सोशल मीडिया के एल्गोरिद्म को मेरे ऋषिकेश जाने का पता चल गया था, इसलिए वह मुझे उसी से संबंधित चीज़ें दिखा रहा था। आधा-पौना घंटा बस में बैठे-बैठे चलने का इंतज़ार करते गुज़रा। मैं उस बस में चढ़ने वाली पहली सवारी थी। मेरे कुछ देर बाद एक लड़की हाथ में गिटार लिए हुए आई। मैं उससे कुछ बात करती, उससे पहले ही वह बोली, “आप ज़रा मेरे गिटार का ध्यान रखेंगी? मैं अभी आती हूँ।”

उसके वापस आने तक बस काफ़ी भर गई थी और चलने का समय भी हो गया था। फिर उससे बात करने का मौक़ा ही नहीं मिला।

क़रीब साढ़े छह बजे बस रुड़की से पहले एक ढाबे पर रुकी। कंडक्टर ने कहा कि पंद्रह मिनट रुकना होगा। चाय-पानी पीना हो, वॉशरूम जाना हो, तो जा सकते हैं। मैं भी उतर गई। चाय पीने का मन हो रहा था, थोड़ी भूख भी लगी थी। एक और लड़की मेरे साथ उतरी। हम दोनों ने चाय और मैगी मँगाई। यात्राओं में अक्सर युवाओं और बच्चों को मैगी खाते देखा है। मुझे मैगी कुछ ख़ास पसंद नहीं, मगर उस लड़की को देखकर मैंने भी ऑर्डर कर दी थी।

हम कितना कुछ दूसरों की देखा-देखी करने लगे हैं आजकल। सोशल मीडिया के इस समय में देखा-देखी करने को ट्रेंड्स फ़ॉलो करना कहते हैं। इस यात्रा के बाद यह भी तय होना था कि सचमुच मुझे इसकी इच्छा और आवश्यकता थी या मैं भी सोलो ट्रैवल ट्रेंड के प्रभाव में ही थी।

घर से निकलते समय अनुमान लगाया था कि लगभग आठ बजे तक ऋषिकेश पहुँच जाऊँगी, पर घर से निकलने में हुई देरी, कुछ ट्रैफ़िक और बस के चलने में हुई देर के कारण हरिद्वार पहुँचते-पहुँचते ही आठ-साढ़े आठ बज गए। तब तक बस ख़ाली हो गई थी।

कंडक्टर से पूछने पर पता चला कि ऋषिकेश पहुँचने में लगभग एक घंटा और लगेगा। रात में अकेले ड्राइवर और कंडक्टर के साथ एक घंटा यात्रा करनी पड़ेगी, यह सोचकर दिमाग़ हिंदी फ़िल्मों और न्यूज़ चैनलों की भाषा बोलने लगा। कंडक्टर की नज़र भी कुछ अजीब लगने लगी, जबकि वह थी नहीं। जो अजीब था, वह मेरे दिमाग़ में था, जिसके कारण आसपास एकाएक सब अजीब हो गया था।

इससे पहले कि मेरा दिमाग़ किसी संभावित मुसीबत से निपटने के लिए तरक़ीबें खोजना शुरू करता, एक लड़का बस में चढ़ा और मुझसे पीछे वाली सीट पर बैठ गया। मैंने राहत की साँस ली।

मैंने उससे पूछा, “आप कहाँ जा रहे हैं?”

ऋषिकेश बताकर उसने पूछा, “आप भी ऋषिकेश जा रही हैं?”

पूछते हुए वह मेरी ही सीट पर आकर बैठ गया।

बातों में पता चला कि वह ऋषिकेश में नौकरी करता है और वहीं रहता है। उसने मेरे ऋषिकेश जाने का उद्देश्य पूछा। घूमने के बारे में बताने पर वह पूछने लगा, “अकेले जा रही हैं?”

मैंने कहा, “हाँ, पहला सोलो ट्रैवल है।”

वह सुखद रूप से चकित होकर बोला, “डर नहीं लग रहा? और आपके घरवालों ने भेज दिया आपको? आपत्ति नहीं की?”

मैंने कहा, “थोड़ा-बहुत डर और आशंकाएँ तो होती ही हैं, पर कहीं न जाना कोई हल तो नहीं... बाक़ी घरवालों को पता है कि मैं सक्षम हूँ। वे बहुत दकियानूसी नहीं हैं, पर्याप्त सपोर्टिव हैं।”

वह कहने लगा कि उसके घरवाले तो उसे लड़का होकर भी कहीं अकेले जाने नहीं देते। जब भी वह कहीं जाने की योजना बनाता है, तो वे उसके दोस्तों को उसके साथ लगा देते हैं। कारण पूछने पर उसने बताया कि वह अकेली संतान है और उसकी माँ उसकी सुरक्षा को लेकर बहुत चिंता करती हैं।

अकेली संतान या परिवार में इकलौते बेटे के प्रति माता-पिता, विशेषतः माताओं की इस तरह की असुरक्षा और मोह की भावना संतान को अक्सर या तो बहुत बिगड़ैल बना देती है, जहाँ वह किसी की एक नहीं सुनता, या फिर एकदम भीरु, जो अपने लिए कोई निर्णय नहीं ले पाता। दोनों ही परिस्थितियों में वह एक बेहतर मनुष्य बनने की प्रक्रिया में पिछड़ जाता है। अपने आसपास ऐसे बहुत उदाहरण देखे हैं मैंने।

भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों में अक्सर लड़कियों पर सारी बंदिशें होती हैं और लड़कों को पर्याप्त छूट मिलती है, मगर हमेशा ऐसा नहीं होता। बहुत-से परिवारों में लड़के भी लगभग उसी तरह के माहौल में रह रहे होते हैं। हालाँकि वे दबे-छिपे अपनी ज़िद और बाग़ीपन से उन बंदिशों को धीरे-धीरे तोड़ते रहते हैं, पर कई बार वे भी आजीवन माता-पिता के कहे अनुसार दाएँ-बाएँ चलते हैं।

सामाजिक परिवेश और सोशल मीडिया के संदर्भ में इसी तरह की बातें करते हुए हम ऋषिकेश की तरफ़ बढ़ रहे थे। बदलते मौसम की जो गर्माहट हवा में पूरे दिन महसूस हुई थी, वह अब कम हो गई थी। बल्कि बस की खिड़कियों से आती हवा ठंडी हो गई थी। पता चलने लगा था कि पहाड़ और गंगा, दोनों हमारे आसपास हैं।

ऋषिकेश पहुँचने में कुछ ही समय रह गया था। वह कहने लगा, “मुझे आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा। आपकी बातें और विचार मुझे बहुत अच्छे लगे। मुझे बहुत ख़ुशी होती अगर मैं अपनी माँ को आपसे मिला पाता या उनकी बात आपसे करा पाता।”

मैंने हँसते हुए कहा, “पर यह ज़रूरी नहीं कि उन्हें भी मेरी बातें पसंद आतीं। पके हुए लोगों को हम जैसी सोचने-बोलने वाली स्त्रियाँ कम ही पसंद आती हैं।”

उसने हँसते हुए सहमति जताई।

ऋषिकेश बस स्टैंड आ गया था। एक-दूसरे को ‘बाय’ बोलकर हम अपने-अपने बैग उठाकर बस से उतरे और अपने-अपने रास्ते चल दिए।

दस बजने को थे। मैं अपने अनुमानित समय से बहुत लेट थी। होटल रिसेप्शन से भी कॉल आ चुकी थी—“मैडम, कब तक पहुँचेंगी आप?”

बस से उतरकर मैं ऑटो की तरफ़ बढ़ने लगी, तो कई ऑटोवाले आ गए। पूछने लगे कि कहाँ जाना है। बताने लगे कि इस वक़्त शेयरिंग ऑटो नहीं मिलेगा, पर्सनल करके जाना पड़ेगा।

मैंने होटल रिसेप्शन पर कॉल करके सटीक लोकेशन और ऑटो के बारे में पूछा। एक ऑटोवाले से बात की, तो उसने बताया कि वहाँ तक ऑटो दिन में भी नहीं जाते। रात है और आप अकेली हैं, तो चलेंगे, पर किराया ज़्यादा लगेगा।

मैं ऑटो में बैठने के लिए जाने लगी, तो एक आदमी दूर से चलते हुए आया। मुझे अकेले देखकर चिंता जताते हुए बोला, “मैडम, आप चिंता नहीं करो। एकदम ज़िम्मेदारी से आपको सही से पहुँचाकर आएँगे। टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं है। हम भी भाई हैं आपके।”

यह कहकर वह मेरे ऑटोवाले से कहने लगा, “चलूँ क्या साथ?”

ऑटोवाला बोला, “नहीं, मैं ले जाऊँगा।”

मैंने राहत की साँस ली। मुझे देखकर ऑटोवाला मुस्कुराया।

मैंने कहा, “पीए हुए हैं न ये भाई!... कह रहे हैं टेंशन मत लो और ख़ुद ही टेंशन दे रहे हैं।”

वह बोला, “हाँ, पर मैडम, दुनिया में अच्छे लोग भी हैं।”

मैंने कहा, “बिल्कुल हैं। उन्हीं के सहारे दुनिया चल रही है।”

उसने ऑटो स्टार्ट किया और मैंने गूगल मैप खोल लिया।

ऑटो ऋषिकेश की सड़कों पर दौड़ने लगा। कभी हल्का मोड़ आता, कभी तीव्र; कभी ढलान और कभी चढ़ाई। सड़क के दोनों ओर पहाड़ों की धुँधली आकृतियाँ, रोशनी में नहाए होटल और दुकानों के बोर्ड दिखाई दे रहे थे। कभी ढाबों से खाने की महक हवा में तैरती हुई आती, कभी फ़िल्मी गीतों के बोल और धुनें। बहुत भीड़-भाड़ नहीं दिख रही थी और न ही बहुत नीरवता थी। पर्याप्त चहल-पहल थी, जो आशंकाओं और थकान की मनोदशा से निकालकर मन में उत्सुकता का वातावरण बना रही थी।

कोई बीस-पच्चीस मिनट बाद उसने मुझे एक ढाबे के सामने उतारा, जिसका नाम होटल रिसेप्शन से लैंडमार्क के तौर पर पता चला था। मैंने उसे तयशुदा रुपए देकर धन्यवाद दिया और वह चला गया।

गूगल मैप होटल आसपास दिखा रहा था, पर वह होटल कहीं दिख नहीं रहा था। दाएँ-बाएँ होटल ही होटल थे। फिर चाय की टपरी पर खड़े एक लड़के से होटल का नाम बताकर पूछा, तो उसने बताया कि बराबर में, अंदर गली में है।

जाने से पहले मन हुआ कि चाय पी जाए, पर आठ-नौ घंटे के सफ़र के बाद ऐसे खड़े-खड़े नहीं, फ़्रेश होकर सुकून से चाय पीने का मन था। सो बैग घसीटते हुए उस बराबर वाली गली की राह ली।

गली क्या थी, अच्छी-ख़ासी सड़क थी, जो मुख्य सड़क से नीचे की ओर, यानी ढलान पर थी। दोनों ओर होटल थे, लगभग एक जैसे नामों वाले।

मैंने फ़ोन में अपने होटल का नाम एक बार फिर चेक किया और उस नाम वाले होटल में अंदर चली गई।

रिसेप्शन पर जाकर बुकिंग की जानकारी दी। रिसेप्शनिस्ट बहुत सादा, सहज और हँसमुख व्यक्ति था। आईडी माँगते हुए बोला, “लेट हो गईं मैडम आप। कोई परेशानी तो नहीं हुई पहुँचने में?”

आईडी देते हुए मैंने कहा, “नहीं, अच्छा सफ़र रहा। ऑटोवाला भी अच्छा था, सही से पहुँचाकर गया।”

उसने मुझे कमरे की चाबी दी, सामान कमरे में पहुँचाने के लिए एक लड़के को बुलाया और कहा कि कुछ भी चाहिए हो, तो इंटरकॉम पर कॉल कर लूँ। कुछ खाना हो, तो होटल किचन का नंबर डायल करके ऑर्डर कर सकती हूँ।

उसे धन्यवाद कहकर मैं बैग ले जा रहे लड़के के पीछे हो ली।

पहली मंज़िल के कॉरिडोर से होकर आख़िरी वाला कमरा मेरे लिए बुक था। लड़का बैग दरवाज़े पर छोड़कर पानी लाने चला गया।

दरवाज़ा खोलकर मैंने कमरे का मुआयना किया। सफ़ेद बेड पर आसमानी कुशंस, आसमानी पर्दे, टेबल, दो कुर्सियाँ, अलमारी, आईना—सब मेरा स्वागत कर रहे थे।

अब तीन रातों और दो दिनों के लिए यही मेरा ठिकाना था।

इस कमरे तक पहुँचने के लिए जितनी दूरी सड़कों पर तय हुई थी, उससे कहीं ज़्यादा दूरी शायद मुझे अपने भीतर तय करनी पड़ी थी। सबसे मुश्किल बंधन वे होते हैं, जो हम अपने दिमाग़ में लगा लेते हैं। समाज और लोगों द्वारा लगाए गए बंधनों को तोड़ने से कहीं मुश्किल होता है स्वयं के लगाए इन बंधनों को तोड़ना। ऐसे ही भीतरी-बाहरी कई बंधन उस दिन टूटे थे। अब रात भर हैशटैग Breaking the Bias की सुखद और रोमांचक अनुभूति को ठहरकर महसूस करना था।

मैं यह नहीं कहती कि अकेले यात्रा कर लेने भर से कोई अपने सारे बंधनों से मुक्त हो जाता है। न ही यह कि परिवार के साथ यात्रा करने में कोई बुराई है। बात सिर्फ़ इतनी है कि कभी-कभी हमें अपने लिए कुछ ऐसा करना होता है, जिसमें हम बँधी-बँधाई भूमिकाओं से निकलकर केवल अपने लिए मौजूद हों।

इसके आगे के वर्णन में किसी यात्रा के ब्यौरे की तरह मैं लिख सकती हूँ कि कैसे मैंने एक स्कूटी किराए पर ली और उस पर सवार होकर दो दिन ऋषिकेश की सड़कों पर घूमती रही—राम झूला, लक्ष्मण झूला, जानकी ब्रिज, परमार्थ आश्रम, बीटल्स आश्रम, त्रिवेणी घाट, सीक्रेट वॉटरफ़ॉल, रिवर राफ़्टिंग और बाज़ार। मगर वह सब उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। महत्त्वपूर्ण था अकेले घूमने के लिए घर से निकल आना। महत्त्वपूर्ण थी घर से होटल पहुँचने तक की वह यात्रा, जिसमें डर के कई छोटे-बड़े पड़ाव पार हुए। जिसमें अपने पूर्वाग्रहों से बाहर निकलना संभव हुआ, उस कंडीशनिंग को तोड़ना संभव हुआ, जिसमें फँसकर मेरी पिछली पीढ़ियों की स्त्रियों ने ख़ुद को खो दिया।

बाक़ी अनुभव कब और कैसे लिखे जाएँगे, लिखे जाएँगे भी या नहीं, यह इस दिवाली के बाद एक बार फिर ऋषिकेश घूमने के पश्चात् तय होगा। इसका वादा मैंने लौटते वक़्त अपने आप से किया था और अब उस वादे को निभाने का समय आ गया है। यह गद्य उसी की मानसिक तैयारी का एक हिस्सा है। पिछली बार ख़ुद से मिलने गई थी, इस बार ऋषिकेश से मिलने जाना है, जो मुझे नैनीताल, शिमला और मसूरी से कहीं ज़्यादा पसंद आया।

इस बार शायद रास्ते कुछ पहचाने हुए होंगे, कुछ जगहें जानी-पहचानी होंगी। शायद पहली यात्रा जैसा रोमांच न हो, लेकिन फिर भी कुछ चीज़ें बाक़ी हैं करने को और उस यात्रा की स्मृतियों में एक अधूरापन है, जिसे पूरा करना है। यह भी देखना है कि उस यात्रा के दौरान अपने भीतर जो थोड़ी-सी जगह बनाई थी, वह अब भी मेरे भीतर बची हुई है या नहीं। आख़िर अपने लिए जगह बनाना और उस जगह को बचाए रखना, दोनों अलग बातें हैं।

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