Font by Mehr Nastaliq Web

अनफ़्रेम्ड : टैरेंटीनो के बहाने, हॉलीवुड से इलाहाबाद तक

क़रीब सात साल पहले इन्हीं दिनों क्वेंटिन टैरेंटीनो की फ़िल्म ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन हॉलीवुड’ देखी थी। अक्सर बदलता मौसम आपको पुरानी पढ़ी किताबों, देखी गई फ़िल्मों और ज़माने पहले सुने गए संगीत की याद दिला देता है। मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ और उसके असर में मैंने इधर टैरेंटीनो की फ़िल्में दुबारा देखनी शुरू कीं। मैंने पढ़ तो रखा था, मगर उन फ़िल्मों को फिर से देखने पर पाया कि उनकी सिनेमाई फ़ितरत पर हॉलीवुड के बी-ग्रेड सिनेमा, इंडिपेंडेंट सिनेमा और सत्तर के दशक वाले हांगकांग के मार्शल आर्ट सिनेमा का कितना गहरा असर है। यह एक ऐसे व्यक्ति का सिनेमा है जिसकी ज़िंदगी में फ़िल्में दीवानगी की हद तक दाख़िल हैं।

सिनेमा की दीवानगी में थिएटर का बहुत बड़ा योगदान है। हमारी बचपन की स्मृतियों में सिनेमा हॉल घूमता रहता है। टैरेंटीनो की बहुत सारी फ़िल्मों में सत्तर के दौर की फ़िल्मों को ट्रिब्यूट दिखता है। जब सत्तर के दशक की बात चलती है तो मेरा मन इलाहाबाद और गोरखपुर में भटकने लगता है, जहाँ सिनेमा देखने और देखने की इच्छा के बीच मेरे बचपन और किशोरावस्था के दिन बीते थे। ख़ालिद जावेद की कहानी ‘तफ़रीह की एक दोपहर’ में सिनेमा हॉल और उसके अँधेरे का प्रसंग बहुत दिलचस्प है। कहानी में बाहर की दुनिया के बरअक्स सिनेमा हॉल का गाढ़ा अँधेरा ऐसी जगह है जहाँ सिसकियाँ भी उठती हैं और क़हक़हे भी गूँजते हैं। 

ख़ालिद जावेद के यहाँ सिनेमा हॉल का अँधेरा बाहर की दुनिया से थोड़ी देर के लिए मुक्ति देता है। वहाँ बैठा आदमी अपने आस-पास बैठे लोगों से लगभग कट जाता है और पर्दे पर चल रहे काल्पनिक संसार के साथ अकेला रिश्ता बना लेता है। यानी सिनेमा हॉल के भीतर का अकेलापन दरअस्ल अकेलेपन को बढ़ाता नहीं, बल्कि अकेलेपन को सहने योग्य बनाता है। यह बहुत ख़ूबसूरत विडंबना है। टैरेंटीनो की फ़िल्म ‘इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ और ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन हॉलीवुड’ में पुराने थिएटर कहानी का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। इस फ़िल्म का एक सुंदर प्रसंग वह है, जब शैरन टेट अकेले थिएटर जाती है और अपनी ही फ़िल्म देखती है। थिएटर के बाहर उसे अपना नाम और अपनी फ़िल्म देखकर ख़ुशी होती है। वह टिकट खिड़की पर जाकर बताती है कि फ़िल्म में वही है। फिर वह दर्शकों के बीच बैठकर ख़ुद को पर्दे पर देखती है। वह दर्शकों की प्रतिक्रिया देखती है कि कैसे वे उसके अभिनय पर हँस रहे हैं और आनंद ले रहे हैं।

टैरेंटीनो सिनेमा-प्रेमियों के निर्देशक हैं। वह किसी फ़िल्म स्कूल से नहीं निकले हैं। उन्होंने सिनेमा को आम दर्शकों की थिएटर की सीट तक बैठकर देखा और समझा है। उन्होंने हर क़िस्म की फ़िल्में देखीं और दर्शकों से सिनेमा के रिश्ते को समझा। यही वजह है कि उनकी शैली इतनी निजी और अनूठी है। दरअस्ल, उनका सिनेमा ‘ज़िंदगी’ से नहीं बल्कि ‘सिनेमा’ से ही उपजा है। वह बीते दौर की स्मृतियों और सिनेमा की शैली का इस्तेमाल आधुनिक संवेदना के साथ करते हैं और अक्सर उसके नतीजे बहुत शानदार होते हैं। उनकी ख़ूबी है सिनेमा में इस्तेमाल की जा चुकी भाषा की प्रभावशाली पुनर्रचना, याद रह जाने वाले किरदार और कहानी कहने की एक शानदार शैली। टैरेंटीनो का सिनेमा इतना पर्सनल है कि उनकी फ़िल्मों में दिखाए जाने वाले बहुत से ब्रांड उनकी अपनी कल्पना की उपज होते हैं, जैसे ‘रेड ऐपल सिगरेट’ जो उनकी कई फ़िल्मों के किरदार पीते नजर आते हैं। इसी तरह से उनके तमाम फ़ैन उनकी एक फ़िल्म का दूसरी फ़िल्म से कनेक्शन खोजते रहते हैं। टैरेंटीनो जानबूझकर छोटे-छोटे ऐसे सूत्र छोड़ते जाते हैं, जिनकी वजह से उनकी किसी एक फ़िल्म में किसी दूसरी फ़िल्म का संदर्भ मिलता है। 

टैरेंटीनो की यह समानांतर दुनिया इतनी सशक्त है कि वह वैकल्पिक इतिहास भी रचते हैं। ‘इनग्लोरियस बास्टर्ड्स’ हिटलर की मौत का एक अलग आख्यान लेकर आती है। इसी तरह से ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन हॉलीवुड’ में मैनसन मर्डर केस को नए तरीक़े से प्रस्तुत किया जाता है। ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन हॉलीवुड’ में बहुत फ़ुर्सत से ऐसे ब्योरे रचे गए हैं, जिनमें साठ के दशक के उत्तरार्ध और सत्तर के आरंभ का नॉस्टेल्जिया है। टीवी पर दिखाए जा रहे स्पाघेट्टी वेस्टर्न सीरीज़, दूसरे विश्वयुद्ध और नाज़ियों पर आधारित वॉर फ़िल्में, सत्तर के दशक का हिप्पी-कल्चर, उस समय का संगीत... इस सबकी मदद से वह एक उत्तर आधुनिक आख्यान रचते हैं; जिसमें क़िस्सागोई तो है, मगर उस क़िस्से में ढेर सारे संदर्भ हैं।

इसलिए सचेत जेन एक्स पीढ़ी को ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन हॉलीवुड’ बहुत अपरिचित फ़िल्म नहीं लगेगी। भारत में सत्तर से अस्सी के पूर्वार्ध तक का समय पश्चिम के गहरे असर में था, मगर तब हमें उसके ‘ओरिजिनल सोर्स’ नहीं पता थे। वह साठ का दशक था जब एल्विस प्रेसली का अंदाज़ शम्मी कपूर में दिखता था। हम सिनेमा में ‘चाचाचा’ और ‘ट्विस्ट डांस’ देखते थे। जब मैं ‘वन्स अपॉन...’ में साठ के दशक के अंतिम सालों में फैले हिप्पी-कल्चर को देख रहा था तो अनायास ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ जैसी फ़िल्म याद आ जाती है, जिसमें सत्तर के आरंभिक वर्षों में भारत में पनपते हिप्पी-कल्चर को दिखाया गया था। देव आनंद के निर्देशन में बनी यह इकलौती फ़िल्म थी, जिसे याद रखा जाएगा। उन्हें परंपरागत भारतीय समाज से अलग एक दुनिया दिखानी थी; मगर बात भारत के संदर्भ में होनी थी, लिहाज़ा वह दर्शकों को नेपाल लेकर जाते हैं। तब नेपाल दुनिया भर के हिप्पियों का ठिकाना बन गया था। काठमांडू की फ़्रीक स्ट्रीट उनका स्थायी ठिकाना हुआ करता था। भारत में वाराणसी, मनाली और गोवा ठिकाने होते थे। इसी तरह ‘वन्स अपॉन...’ शैरन टेट हत्याकांड के इर्द-गिर्द बुनी गई है और उसमें नव-नाज़ी चार्ल्स मैनसन और हिप्पी-कल्चर को विस्तार से दिखाया गया है।

इसी फ़िल्म में एक जगह ब्रूस ली का मज़ाक़ भी बनाया गया है, उसे एक बड़बोले के रूप में दिखाया गया है और टैरेंटीनो ने यह भी दिखाने की कोशिश की है कि दरअस्ल ब्रूस ली की शारीरिक शक्ति और स्फूर्ति से जुड़ी बातें भी एक मिथ थीं, हालाँकि यह उनको बहुत बुरा लगा होगा जिन्होंने वह दौर देखा जब भारतीय किशोरों के बीच ब्रूस ली को पूजा जाता था। घरों में भी ब्रूस ली के पोस्टर लगा करते थे, जिसमें उनके शरीर पर तीन गहरी रक्तिम ख़राशें उभरी थीं। सन् 1973 में ब्रूस ली की मृत्यु हुई, इसी साल ‘एंटर द ड्रैगन’ फ़िल्म भी आई थी। यह फ़िल्म सारी दुनिया में ज़बरदस्त सफल हुई, भारत में भी। भारत में अगले पाँच-छह सालों तक ब्रूस ली का ज़बरदस्त क्रेज रहा। तब तक मैं भी अपनी उम्र के दोस्तों से ब्रूस ली के बारे में जाने कितनी किंवदंतियां सुन चुका था, इसमें से सबसे ज़बरदस्त थी कि वह एक सेकेंड में दस पंच मार सकता था।

फ़िल्म में स्पाघेट्टी वेस्टर्न के भी काफ़ी संदर्भ हैं, ये वे फ़िल्में हैं जिनके ज़रिये हम बचपन में हॉलीवुड को समझने की कोशिश थे। ख़ास तौर पर इलाहाबाद में उन दिनों ‘मैकेनाज़ गोल्ड’ और ‘टेक अ हार्ड राइड’ की बड़ी धूम थी। ‘मैकेनाज़ गोल्ड’ तो सुबह के शो की बजाय चारों शो में रिलीज़ हुई और कई हफ़्ते चली। इन फ़िल्मों को देखकर हमें लगता था, अमेरिका ऐसा ही है, लोग सूने कँटीले पौधों वाले रेगिस्तान में घूमते हैं, छोटे शहर होते हैं, बार और जुआघर होता है और कोई भी, कभी भी, किसी पर भी गोली चला सकता है। मगर मेरे ज़ेहन में स्पाघेट्टी वेस्टर्न की इससे भी दिलचस्प एक भारतीय स्मृति है, जब मिथुन चक्रवर्ती की एक फ़िल्म आई वांटेड और उसके पोस्टर पर लिखा था, ‘इंडियाज़ फ़र्स्ट वेस्टर्न थ्रिलर’। यह कितना भी हास्यास्पद हो, मगर हुआ यह कि स्कूल के छह-सात बच्चों किफ़ायती दर पर वह फ़िल्म देख ली और उसके बाद से ख़ा पीरियड में ऐसी फ़ाइटिंग शुरू हो जाती थी कि एक दिन स्कूल की बेंच टूट गई।

क्वेंटिन टैरेंटीनो ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन हॉलीवुड’ को हॉलीवुड के नाम एक प्रेमपत्र कहते हैं; मगर यह प्रेमपत्र कहीं न कहीं हमारे नॉस्टेल्जिया को भी छूता है, जिसकी स्मृतियों में पश्चिमी लोकप्रिय संस्कृति की झलक अब भी कहीं बाक़ी है। भारत और पश्चिम की इन स्मृतियों के आधार पर टैरेंटीनो के सिनेमा के साथ यह समझना दिलचस्प है कि लोकप्रिय संस्कृति कैसे काम करती है। जिन फ़िल्मों, सितारों, संगीत और पॉपुलर कल्चर को टैरेंटीनो अपनी स्मृति से उठाते हैं, उनमें से बहुत कुछ आज के युवा ने देखा ही नहीं है। फिर भी वह उनसे जुड़ता है; क्योंकि टैरनटीनो पुरानी चीज़ों को म्यूज़ियम में रखने की वस्तु नहीं मानते, बल्कि वह उसे बेहद ‘कूल’ और जीवंत बना देते हैं। ‘जैंगो अनचेन्ड’ स्पाघेट्टी वेस्टर्न की स्मृतियों से जुड़ा है, वहीं ‘किल बिल’ के ज़रिये आप भारत में रिलीज़ होने वाली मार्शल आर्ट की फ़िल्मों को याद कर सकते हैं। यही उनकी ख़ूबी है कि अगर आप उनके संदर्भों को जानते हैं तो फ़िल्म की एक अतिरिक्त परत खुलती है और नहीं जानते तो फ़िल्म आपको उन संदर्भों को खोजने के लिए प्रेरित करती है।

शायद टैरेंटीनो की लोकप्रियता का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि वह केवल फ़िल्में नहीं बनाते, फ़िल्म देखने की इच्छा पैदा करते हैं। उनकी फ़िल्मों का दर्शक सिर्फ़ वह व्यक्ति नहीं है जो पुराना हॉलीवुड या पुराना सिनेमा याद करता है, वह युवा भी है जो सिनेमा की दुनिया को एक्सप्लोर कर रहा है। एक दर्शक के लिए टैरेंटीनो नॉस्टेल्जिया है तो दूसरे के लिए डिस्कवरी। वह पुराने सिनेमा को दोहराते नहीं, उसे अपनी कल्पना और ऊर्जा से फिर से लोकप्रिय बनाते हैं। इसलिए उनकी फ़िल्में देखने के बाद अक्सर दर्शक किसी पुरानी फ़िल्म, पुराने अभिनेता या किसी संगीतकार को खोजने निकल पड़ता है। लोकप्रिय संस्कृति की असली ताक़त भी यही है कि वह आपके लिए ऐसे संकेत तैयार करता है जो एक बड़ी दुनिया की ओर भेज देते हैं।

•••

अन्य अनफ़्रेम्ड यहाँ पढ़िए : अनफ़्रेम्ड

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट