सौरव गांगुली सिर्फ़ नॉस्टेल्जिया का नाम नहीं
अतुल तिवारी
08 जुलाई 2026
स्टार गोल्ड पर ‘मोहब्बतें’, सेट मैक्स पर ‘करण-अर्जुन’ और ज़ी सिनेमा पर ‘मैं हूँ ना’ शाहरुख़ ख़ान का दीवाना होने के लिए ये तीन फ़िल्में ही काफ़ी थीं। झूठ क्या कहूँ, लेकिन ‘दीवाना’ मैंने सिर्फ़ दिव्या भारती के लिए देखी थी। मैं उस उम्र में था जब शाहरुख़ बड़े पर्दे के अलावा अवार्ड-शो होस्ट करने लगा था। फिर अचानक वह एक दिन केबीसी में दिखा। फिर अचानक एक दिन उसने आईपीएल की टीम ख़रीद ली। उसने मुझे सबसे ज़्यादा तब चौंकाया जब उसने सौरव गांगुली को कलकत्ता-टीम का कप्तान बना दिया। नारा लगा—“कोरबो-लोड़बो-जीतबो!”
कालांतर में इसी शाहरुख़ ख़ान को वानखेड़े स्टेडियम में शराब पीकर झगड़ा करना था। बैन होना था और आगे चलकर किसी ‘वानखेड़े’ के हाथों उसके बेटे को जेल भी जाना था। लेकिन इससे भी पहले वानखेड़े स्टेडियम में एंड्रू फ्लिंटॉफ़ को भारत की हार के बाद में जर्सी निकालकर गांगुली को चिढ़ाना था और जवाब में गांगुली को लॉर्ड्स में जीतकर गोरों की छाती पर मूँग दलना था। उसी लॉर्ड्स में जहाँ गांगुली ने अपना पहला मैच खेला था और शतक बनाया था।
दूसरी बार शाहरुख़ ख़ान ने मुझे तब चौंकाया जब उसने गांगुली को टीम से बाहर निकालकर गंभीर को ‘कोलकाता नाइट राइडर्स’ का कप्तान बना दिया। मुझे कहने दीजिए कि दादा के जर्सी लहराने वाले उस फ़्रेम में आज भी मुझे सबसे ज़्यादा राजीव शुक्ला खटकता है।
पहले आइपीएल यानी साल 2008 के आख़िरी महीनों में दादा को अपना आख़िरी मैच खेलना था। मुझे नहीं पता था जिस गांगुली की तस्वीरों के लिए मैं ‘क्रिकेट सम्राट’ चोरी करता था, वह अचानक उस पत्रिका कम दिखने लगेंगे और भविष्य में उसी ‘क्रिकेट सम्राट’ पर जेएनयू का कोई शोध-छात्र पीएचडी लिखेगा।
मुझे इस बात की भी दूर-दूर तक कोई भनक नहीं थी एक दिन कलकत्ता का राजकुमार मेरे मोबाइल-स्क्रीन पर अचानक प्रकट होगा और कहेगा—जुआ खेलो...
ख़ैर, ‘कोलकाता नाइट राइडर्स’ से रुख़्सती के बहुत पहले दादा के करियर ने एक बार और कलटी मारी थी। जॉन राइट के बाद एक ‘रॉन्ग कोच’ आ गया था जिसे हम लोग ‘ग्रेग चप्पल’ के नाम से गरियाते थे। किसे पता था कि दादा का लाया यही चैपल गांगुली को हटवाकर द्रविड़ को कप्तान बनवा देगा। वही द्रविड़ जिसकी देह-यष्टि और धीरता देखकर मुझे जाने किसकी याद आती थी। वही द्रविड़ जिसके भाग्य में विजय माल्या के ताने सुनना था। वही द्रविड़ जिसकी कप्तानी में टीम 2007 वर्ल्ड-कप के सेमीफ़ाइनल तक का मुँह नहीं देख पाई थी।
मैं यहाँ पूर्वदीप्तियों [फ़्लैशबैक] का और आधिक आश्रय धारण करूँ तो खेलमंत्री सुनील दत्त कार्डिएक अरेस्ट से चल बसे थे। तब युवराज सिंह को कैंसर नहीं हुआ था। पर्दे के पीछे योगराज सिंह व्हिस्की पीने के बाद बेटे की कामयाबी देखकर मूँछों पर ख़िज़ाब लगाता था। अफ़्रीकन टीम ने ग्रीम स्मिथ को आजीवन कप्तान चुन लिया था और शाहिद अफ़रीदी अपने बल्ले से हरभजन सिंह की टाँग तोड़ना चाहता था। इंज़माम हर मैच में रन-आउट हुआ चाहता था और मोहम्मद आसिफ़ मैच-फ़िक्सिंग करने को बेताब था। महेंद्र सिंह धोनी बल्ला ऐसे चलाता था जैसे खेत में हाथा चला रहा हो। इरफ़ान पठान न ढंग से बैटिंग कर पाता था, न बॉलिंग। श्रीलंकाई टीम थकी हुई लगती थी और ऑस्ट्रेलियाई टीम डरावनी। उस टीम में में ग्यारह गॉड थे। पाकिस्तानी टीम का ख़ुदा ही मालिक था। श्रीलंका का भगवान् था—सनथ जयसूर्या। भारतीय टीम में भी डेढ़ ईश्वर थे—एक सचिन तेंदुलकर और आधे सौरव गांगुली... ऑफ़ साइड के भगवान्!
जॉन्टी रोड्स रिटायर हो चुके थे। लेकिन उनसे जुड़ी किंवदंतियाँ और क्षेपक कथाएँ मुझ तक पहुँच चुकी थीं। अजीत अगरकर मुझे हड्डियों का नहीं, बाँस का ढाँचा लगता था। सचिन तेंदुलकर के फ़ॉर्म पर लोगों ने अख़बारों में लिख दिया था कि यह देश के लिए नहीं, अपने लिए खेलता है। अज़हरुद्दीन और जडेजा ग्रीटिंग कार्ड बन चुके थे। मेरे पिता टीवी पर माधुरी दीक्षित की फ़िल्में खोजने लगे थे और मैं करिश्मा कपूर की। मैं जवान हो रहा था और सौरव गांगुली अधेड़। लेकिन मैं इतना भी जवान नहीं हुआ था कि ‘आशिक़ बनाया आपने’ की अंतर्मुखी तनुश्री दत्ता के कपड़े उतरते देखकर कामुक हो जाऊँ।
मैं अपने बाप से ज़्यादा सौरव गांगुली को समय देने लगा और दीवारों पर चिपके पोस्टरों की वजह से गांगुली के नाम की गाली खाने लगा।
कुछ बरस पहले एक रात पिता ने मेरी माँ को बताया कि उनके सीने में कभी-कभी दर्द होता है। मैंने टीवी खोल लिया। पता चला कि सौरव गांगुली को दिल का दौरा पड़ गया है। मुझे सुनील दत्त याद आए। मैं दोनों की मौत से डरने लगा। मैंने गांगुली की उम्र गूगल की तो पता चला कि वह मेरे बाप से बस दो-अढ़ाई बरस ही छोटा है।
मैं जवान हो गया, गांगुली बूढ़े और तनुश्री दत्ता अधेड़। ईश्वर/ईश्वरों में मेरी रुचि कम होने लगी। हीरो बदलने लगे। करिश्मा कपूर की जगह सनी लियोनी ने ले ली और यह जानने में मेरी बिल्कुल रुचि नहीं रह गई कि अमित शाह ने गांगुली से बीसीसीआई की अध्यक्षी क्यों छीन ली या दिल्ली कैपिटल्स ने सौरव गांगुली को अपना डायरेक्टर वग़ैरा क्यों बना लिया। दरअस्ल, मुझे सौरव गांगुली फ़ील्ड से बाहर कभी अच्छा नहीं लगा... न ही वह किसी लोकसभा, राज्यसभा या विधानसभा में लगेगा।
उन दिनों मेरी नींद तो इस बात से हराम रहती थी कि कोलकाता से निकाले जाने के बाद अब गांगुली क्या होगा? कौन उसे ख़रीदेगा? उन्हीं दिनों युवराज सिंह को कैंसर का पता चला और वह इलाज के लिए अमरीका चला गया। आईपीएल-ऑक्शन शुरू गया था और योगराज सिंह का टीवी पर आना बंद। पर नीलामी में दादा ख़ुद को बेच नहीं पाए, शायद दादा ने अपना दाम कुछ ज़्यादा ही लगा दिया था।
ख़ैर... नेहरा के चोटिल हो जाने के बाद जैसे-तैसे पुणे वारियर्स ने उन्हें अपना कप्तान बनाया और दादा को अनुकंपा की नौकरी दी।
आईपीएल के पहले मैच में जो महफ़िल दादा को लूटनी थी, वो मैक्कुलम ने लूट ली थी। आईपीएल के शुरुआत में जो कप्तानी दादा को करनी थी वह शेन वॉर्न, गिलक्रिस्ट और धोनी ने कर दी थी। उसी कप्तान महेंद्र सिंह धोनी ने गांगुली को उनके विदाई मैच के आख़िरी ओवर में कप्तानी सौंपकर मुझे अपना मुरीद बना लिया था। अपने पहले मैच में सौ रन मारने वाला सौरव गांगुली करियर के लास्ट मैच में शून्य पर आउट हुआ। सौ से शून्य तक के इस उत्तरार्ध में कई दस्सी-बिस्सीयाँ और पचासे थे। कुल-मिलाकर गांगुली भारतीय टीम के बहुत सफ़ल और आईपीएल के बहुत असफ़ल कप्तान रहे। करियर के अंतिम दिनों में गांगुली बैटिंग करते हुए आँखे मींचने लगे थे... शायद पहले भी मींचते थे। जब मैच के बाद वह चश्मा लगा लेते तो मुझे डेनियल विटोरी याद आता था। चश्मा लगाकर खेलने वाला कीवी-विटोरी!
सेट मैक्स पर ‘करण-अर्जुन’ कम हो गई। स्टार गोल्ड बदल गया। ज़ी सिनेमा ढल गया। ‘क्रिकेट सम्राट’ लगभग ग़ायब या ग़ैरज़रूरी हो गई। वीडियो लाइब्रेरी बंद हो गई। साइबर कैफ़े बंद हो गए। ऑर्कुट मर गया। फ़ेसबुक बूढ़ा हो गया। ट्विटर का नाम बदल गया। केबल वाला ग़ायब हो गया। सीआरटी टीवी कबाड़ी के यहाँ चला गया। लेकिन लॉर्ड्स की उस बालकनी में खड़ा एक आदमी अब भी अपनी टी-शर्ट घुमा रहा है। दादा आज अपना जन्मदिन मना रहे हैं। इसी दिन उनकी बहुप्रतीक्षित बायोपिक ‘दादा : द सौरव गांगुली स्टोरी’ का पहला और बहुत ख़राब पोस्टर जारी कर दिया गया है।
चंडीदास और निरूपा के सुपुत्र—सौरव गांगुली। आदिकवि चंडीदास के नहीं—क्लब-क्रिकेटर और प्रिंट-व्यापारी चंडीदास गांगुली के। हालाँकि उनका करियर किसी भ्रमरगीत से कम नहीं रहा। लीला-साहित्य ही है सौरव चंडीदास गांगुली का जीवन। ...प्रेम कि बोझे-शोने होए? ऐसा नहीं है दादा! तुमने कितना भी जुआ खेलने को उकसाया... आमी तोके प्रेम कोरते थाकबो...
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