स्मृतियों के सिवा कुछ भी नहीं
मयंक यादव
05 मई 2026
यदि तुम बरसों बाद घर लौटकर आओ—तो वे एकदम पहचान लेते हैं, पर वे यह नहीं जानते, तुम कहाँ से लौटकर आए हो। वे कभी सोच नहीं सकते कि इतनी यातना सहकर उन्होंने जिसे जन्म दिया है, वह बड़ा होकर इतनी यातना बर्दाश्त कर सकता है...
— निर्मल वर्मा
यातना के कितने रूप हैं, कितने माध्यम। कितनी ही यातनाओं से गुज़रते हुए, लगता है कि वे कभी ना ख़त्म होने वाले दुर्गम वनों-सी है, जैसे कि गुज़र जाने के बाद पैर में फँसी रह गई घास-सी। यातना में रहते हुए दुनिया में घटित हो रही तमाम चीज़ों पर अधिक ग़ौर कर पाता हूँ—छोटी-से-छोटी अश्रव्य पीड़ा की गूँज कानों तक पहुँचती है—मसलन माली का फूलों को तोड़ते हुए, किसी अनचाहे फूल के टूट जाने की पीड़ा; दूब के मैदान में पैर रखे जाने पर, किसी दूब का दब जाना और उसके साथी का पीड़ा के साथ बचा रह जाना; पेड़ हिलाते हुए किसी पके फल के साथ अधपके फल के गिर जाने की वह अश्रव्य पीड़ा।
अगर आपके कानों तक इस तरह की गूँज नहीं पहुँच रही है तो आप अभी यातना में नहीं हैं। यातना से गुज़रता व्यक्ति आपको साधारण-सा ही मालूम होगा, यातना के असंख्य क्षणों से बचने के लिए वह आपको अपने दोस्तों के संग घूमता दिखेगा, अपने पसंदीदा रंग के कपड़े पहनकर बार-बार वह ऐसी इच्छाओं को संजोते हुए मिलेगा जिनकी कोई संभावनाएँ नज़र नहीं आती।
प्रेम की यातनाएँ—दी गईं या सहन की गईं—अब तक अपरिभाषित ही रही हैं। प्रेम से होकर गुज़रे लोग अक्सर ‘प्रेम जीवन में एक बार होता है’ कि बात करते हैं और जब वे यह कहते हैं, तब वे प्रेम के सुखद क्षणों की बात नहीं कर रहे होते—बल्कि प्रेम की यातनाओं की बात कर रहे होते हैं।
इन सब से गुज़रते हुए, यह दिन-ब-दिन और कठिन होता जा रहा है। चिड़ियों की चहचहाहट और लोगों के हँसी-ठट्ठे से खचाखच भरे हरे घास के मैदान में भी अब कोई संभावना नज़र नहीं आती।
यह सोचकर आश्चर्य होता है कि ख़ाली-सूखे मैदानों में, जहाँ पेड़ के नाम पर केवल बबूल नज़र आते थे, वहाँ हम ज़्यादा जीवित जान पड़ते थे। कितने ही मक़बरों में घंटों बैठकर हमने जीवन की बातें की हैं। अब, सब कुछ एक खुले घास के मैदान में धूप-छाँव के मानिंद है—जहाँ छाँव केवल दूबों की ओट में ही दिखाई पड़ती है, दूर तक दिखाई देते नीले आसमान में छिटके-बिखरे कुछ ही बादल शेष रह गए हैं, जो घंटों के इंतज़ार के बाद सूरज के सामने आते हैं और चले जाते हैं। हमें ठीक से बात किए हुए दिन को, आज कितने महीने बीत गए। इस बीच कितने ही यातना के क्षणों में मुझे तुम्हारी ज़रूरत महसूस हुई, मैंने यह बात सामने से भी कई दफ़ा कही, पर सब अनसुनी रहीं।
इक फूल और न जाने कितनों की अश्रव्य पीड़ा को सुनने वाले की चीख़ें, किसी तक नहीं पहुँचती—तुम तक भी नहीं।
मैं तुम्हारी कई स्मृतियों का गुप्तदान करने का प्रयास कर चुका हूँ, कुछ में सफल भी रहा, पर यह सब स्मृतियाँ मेरी चीख़ों की प्रतिध्वनियाँ हैं। मैंने कई-कई दिनों तक कुछ ना करके भी देखा है, कई-कई दिनों तक इन्हीं स्मृतियों में डूबता-उतराता भी रहा, मेरे पास अब स्मृतियों के सिवा कुछ भी नहीं। तुम्हारी स्मृतियों के ज़ीने पर बैठना मेरे पूरे जीवन का हासिल है और मैं अब उन तमाम बजबजाते फूलों की बीच उस एक फूल को बचाना चाहता हूँ।
हमारे मिलने पर जन्मी जीवन की वे असंख्य संभावनाएँ अब मेरी उँगलियों पर गिनी जा सकती हैं। प्रेम में भी कोई बनिया हो सकता है, यह आज पता चलता है। मैं तुम्हें रोज़ थोड़ा और प्यार करना चाहता हूँ लेकिन रोज़ प्यार करना थोड़ा कम कर दे रहा हूँ।
मेरे कवि ने कभी किसी चट्टान से मशवरा करके अपनी प्रेमिका से वापस आने की बात कही थी। उसी चट्टान से मशवरा करके आया हूँ और मेरा भी यही मानना है कि तुम्हें चले जाना चाहिए।
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