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शंखनाद : बुक फ़ेयर की रपटीली रपट और कवि का मेलोत्तर काल

दिल्ली के भारत मंडपम में किताबों का सालाना जलसा—विश्व पुस्तक मेला गुलज़ार रहा। भाँति-भाँति के लोग भाँति-भाँति की हरकतें करते हुए भाँति-भाँति के लोगों के साथ भाँति-भाँति की घोषणाएँ कार्यान्वित करते/स्थगित करते हुए घूमते रहे। पुराने घाघ लोग मेले में उत्तर प्रदेश के राष्ट्रीय राजमार्गों पर पूँछ फटकारते आत्मविश्वास से भरे साँड की तरह जुगाली करते हुए घूमते रहे और भक्तों को बग़लगीर करके सेल्फ़ी लेने का सुख देते रहे।

मेले में नौसिखिये घुसते ही किताब ख़रीद लेते हैं, फिर ज्ञान के बोझ से दबे-दबे घूमते हैं। उँगलियाँ बोझा उठाए-उठाए कल्ला जाती हैं और इस प्रकार वे समझ पाते हैं कि ज्ञान कोई भारी-भरकम चीज़ है। पुस्तक मेले के वेटरन और अनुभवी लोग मुँह में लौंग या ख़ुशबूदार सुपारी लिए—‘हें-हें’ और मुँह ऊपर करके बात कर रहे हैं। वे धीरे-धीरे चल रहे हैं। उन्हें पता है चलकर ही कहीं पहुँचा जा सकता है। दिन भर चलना ही है। विजिटिंग कार्ड लेना और देना है। नपा-तुला हँसना और बोलना है। विरोधी-गुट को कैसे नज़रअंदाज़ करना है। उनकी बातों का मुख्य स्वर है : “मेले में अब पहले जैसी बात नहीं रही।” 

“सही कहा पार्टनर। न वे किताबें रहीं, न वे मेले रहे। अरे छोड़िए! मैं तो ख़ुद पाँच साल बाद आया हूँ।”

कुछ लोग हैं जो बहुत जल्दी में हैं, आप उनके चाल-चलन से ही अंदाज़ लगा सकते हैं कि वे मेले के महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हैं और वे सचमुच में हैं भी। वे पेशेवर विमोचन करते और करवाते हैं। इनका एक गिरोह है। वे किताबों को बिना पढ़े उनके बारे में अच्छी राय रखते हैं और ऐसे विशिष्ट वाक्य बोलते हैं जो सामान्यतः सभी किताबों पर लागू होती हैं, मसलन—“कलाओं के लिए यह बड़ा जोखिम का समय है और ऐसे कठिन समय में निरहू जी का यह कहानी-संग्रह हमें आश्वस्त करता है कि जोखिम कितना भी बड़ा क्यों न हो, एक लेखक—ऊपर से प्रतिबद्ध लेखक—में इतना नैतिक बल तो होता ही है कि अपने समय के किसी भी जोखिम से टकरा सके।”

निरहू शादी में दुल्हे की तरह मुंडी हिलाकर अनुमोदन करते हैं, लेकिन वह नैतिक बल वाले मामले में थोड़ा बल खा गए; क्योंकि इस कठिन समय की लड़ाई में उनके प्रकाशक ने उन्हें तीस हज़ार रुपये नकद लेकर शामिल किया है। विमोचक सही कह रहा है, कलाओं के गुणग्राहक नहीं मिल रहे हैं। पब्लिशर्स उनकी मैग्नमओपस बिना पढ़े ही सखेद लौटा दे रहे हैं। किताब छप गई है। कोई ख़रीददार नहीं मिल रहा है। कलाओं के लिए यह सच में जोखिम का समय है! किताब छपने से पहले निरहू जी ख़ुद को लेखक समझते थे, अब वह सिर्फ़ किताब-विक्रेता हैं। इनबॉक्स-इनबॉक्स भटक रहे हैं, अपनी लापता किताबों का पता बता रहे हैं। प्रकाशक हरजाई प्रेमी की तरह निकल गया। किसी और प्रेमिका की तलाश में निकल गया। किताब छपवाने के बाद पता चलता है कि पाठक अब सिर्फ़ अफ़वाहों में पाए जाते हैं।

एक मंच पर उत्साही प्रस्तोता के अनुरोध कर रही हैं कि जिनके भी हाथ ख़ाली हैं, वे टुकड़ों में करतल ध्वनि करते रहें। प्रस्तोता बहुत समझदार हैं, वह फुटकर करतल ध्वनि में तालियों की गड़गड़ाहट सुन लेती हैं। वह दर्शनीय हैं। लिहाज़ा बहुत से लोग कला-फ़लाँ, जोख़िम, फ़ाशीवाद, टकराव, मुठभेड़ से बेख़बर उसे ही सरेआम ताड़ रहे हैं। क्रिकेट की रनिंग कमेंट्री के अंदाज़ में पल-पल उतार-चढ़ाव वाले इस घटनाक्रम में कई नौसिखिया जी हैं। वे रपट गए हैं। वे तय ही नहीं कर पा रहे हैं कि वे चेहरे पर कौन-सा भाव रखें। लिहाज़ा वे स्थाई रूप से हँसने और रोने के नो मैंस लैंड पर खड़े हो गए हैं। उनकी दयनीयता दिव्य रूप से उभर आई है।

एक स्टॉल से एक बड़े और बुज़ुर्ग विमोचक ‘जागृति पर मिलो’ कहकर इतनी तेज़ गति से निकले कि अगर उसैन बोल्ट देख ले तो अपने सारे मेडल उनके श्री चरणों में धर दे। उनके ठीक पीछे आठ-दस यशप्रार्थियों और मेवार्थियों का एक-दूसरे को कुचलते हुए एक जुलूस निकला। रास्ते से भीड़ छँट गई। सबको पता था कि ये साहित्य के अश्वमेधी घोड़े हैं। ये अकादमियों-विभागों को रौद रहे हैं। साहित्यकारों का चैत लगा हुआ है, वे साल भर फ़सल काट रहे हैं। पैर पुजवा रहे हैं। किसी को साहित्य के चोर दरवाज़े से अंदर घुसा ले रहे हैं। किसी को साहित्य के इतिहास से बेदख़ल कर दे रहे हैं। किसी को अकादेमी दिला रहे हैं। किसी को दिलाकर लौटवा रहे हैं। मानव समाज में अनंत सत्ताएँ और अनंत भूमिगत माफ़िया हैं। वे चुप रहने की जगह पर बोल रहे हैं। बोलने की जगह चुप रह रहे हैं। अपना हानि-लाभ तोल रहे हैं। आठवें आश्चर्य की तरह बचे रह गए कुछ पाठक गा रहे हैं। तुझे देवता बनाकर मेरी चाहतों ने पूजा...

एक स्टॉल पर एक बागबहादुर—मैं तो हर मोड़ पर तुझको दूँगा सदा के तर्ज़ पर अकेले ही साहित्य सत्ता का प्रतिपक्ष हैं, की भावना के साथ जनता से मुख़ातिब था। पर अफ़सोस जनता को इससे कोई लेना-देना नहीं था। जनता झुंड में चली जा रही थी। साफ़ पता चल रहा था कि वक्ता कोई प्रोफ़ेसर या उच्चाधिकारी नहीं सिर्फ़ एक मामूली विचारक था। मामूली लोगों को यह देश सिर्फ़ विचार के लिए नहीं सुनता। क्या कहा जा रहा है—यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, महत्त्वपूर्ण यह है कि कौन कह रहा है। कहने वाला कुछ बना-बिगाड़ सकता है तो हम यह भूलकर वह क्या कह रहा है, पूजा-भाव से सुनते हैं। दुख हुआ यह देखकर कि आदमी सिर्फ़ लिखने के दम पर इस कठिन समय में हस्तक्षेप करना चाहता है।

एक स्टॉल पर एक लोकप्रिय बुज़ुर्ग कविता सुना रहे थे। किसे सुना रहे थे यह ज्ञात नहीं हो पा रहा था। पर वह पूरी नाटकीयता और ईमानदारी से अपना काव्य-पाठ जारी रखे थे। साहित्य में बेईमानी के इस युग ऐसी ईमानदारी देखकर मेरी आँख भर आई।

अचानक भभ्भड़ मच गया। कौन आया, कौन आया का हल्ला मचा। पता चला कुमार साहब आए हैं। अब यह कुमार साहब कौन हुए ठहरे बल? एक बुज़ुर्ग ने माथे पर बल डालते हुए जानना चाहा। मंथन के बाद अमृत मिला यह श्री शिव कुमार... वह हिक़ारत से हँसे। यह ससुर कौन से साहित्यकार हैं! वह स्वागत में बोल रहे थे। उम्र के साथ उनके स्वागत का पर्दा फट गया था इसलिए सुना जा सकता वे कह रहे थे—ऐसे-ऐसे! लोग साहित्य में आ गए हैं। हमने तो नाम न सुना। साहित्यकार तो दिनकर थे, बच्चन थे, नीरज थे। बच्चन इतने बड़े कवि थे कि उनका लड़का सीधा अमिताभ बच्चन पैदा हुआ। सब लिख तो रहे हैं, है किसी में दम अमिताभ पैदा कर सके। वह थक गए थे। उम्र के साथ क्रांति की संभावना के धूमिल पड़ते जाने के बीच अब वह अंडरग्राउंड आस्तिक हो चले थे। जैसा कि ऐसी लाचारी और बेबसी की स्थिति में होता है, वह साहित्य को ऐसे साहित्यकारों से बचाने के लिए प्रार्थना पर उतर आए। शिव कुमार जी अपने सर्किल में लोकिप्रय आदमी हैं। दुर्भाग्य से साहित्यकारों को इतनी कम लोकप्रियता नसीब हो पा रही है कि थोड़ी-सी भी लोकप्रियता को चरित्रहीनता मान लिया गया है। इस सब झंझावातों से परे कुमार साहब मंच-मंच एक गर्वीली मुस्कान बिखेर रहे हैं।

मेले से देखें तो हिंदी का कोई भी लेखक सिर्फ़ लिखकर यशस्वी हो सकता है, इसको लेकर आम पाठक में लगभग नास्तिकता का भाव है। आम पाठक तो हिंदी साहित्य को लेकर भी लगभग नास्तिक हो चला है। पाठकों के एक बड़े वर्ग का मानना है कि हिंदी-साहित्य जैसी कोई चीज़ नहीं होती, यह मन का भरम है। यह हिंदी लेखकों, हिंदी विभागों और इसके प्रोत्साहन में लगी संस्थाओं और अकादेमियों का करतब है।

प्रकाशक अलग से दुखी हैं। भीड़ स्टॉल में जिस तेज़ी से घुसती है, उससे दुगुनी तेज़ी से किताब से बचते हुए चली जा रही है। किताबें हाथ में हैं, तो ख़रीद किसके यहाँ से रहे हैं। वह दाढ़ी पर हाथ रखकर सोच रहा है। किसी लेखक से दस-बीस हज़ार ले लो तो नैतिकता बघारने लगते हैं। अरे भाई, दुनिया बचाने/बदलने निकले हैं तो कुछ कलदार भी ख़र्चों। गेट पर खड़े अपने वालंटियर को बिल जाँचने के लिए डपट रहा है। छुटके से एक प्रकाशन पर तनुअंगी कवयित्री खड़ी है। उसका एक संग्रह आया है। वह एक ग्राहक को देखकर मुस्कुराती है। ग्राहक रीझता है। पर ठहरता नहीं। कवयित्री सोचती है, ये कहाँ आ गए!

सेल्फ़ी दद्दाओं का अलग जलवा है। वे हसीनों जहीनों पर न्योछावर हैं। अलग-अलग एंगल, पोज़ और मुद्रा में फ़ोटो/सेल्फ़ी ले रहे हैं। एक सेल्फ़ी दद्दा के आगे हम भी लड़िया गए। उन्होंने मुझे खा जाने वाली नज़रों से देखा और हम भीड़ में बिला गए और धीरे से बाहर निकल लिए। यह अपमानजनक था, लेकिन कितना कुछ अपमानजनक है आदमी जीना थोड़े ही छोड़ देगा। कहानी ऐसे ही ऊपर नीचे होते हुए चलती है। यही उद्विकाश है।

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मेला बीत गया है। मेले बीत ही जाते हैं। पर मेले क्यों बीत जाते हैं? यह विधाता की कौन-सी स्कीम है कि जीवन में जो कुछ भी कवि की नज़र में सत्य, शिव और सुंदर है—वह मुट्ठी की रेत-सा फिसल जाता है, जब बीत ही गया तो, बीत क्यों नहीं जाता! बीत ही गया तो मन स्वीकार क्यों नहीं कर पा रहा है! अंदर सन्नाटा पसरा है। किसको आवाज़ दूँ, किसको पुकारूँ। आँख बंद करता हूँ, सामने माइक और भीड़ दिखती है। शब्द हवा में तैर रहे हैं। मेले की बड़ी बिंदियाँ नक्षत्र-सी रोशन हैं, मन के आँगन में चाँदनी छिटकी है—मैं हाथ बढ़ाकर छू सकता हूँ।

कमरे में लाइट ऑफ़ किए बैठा हूँ। पत्नी कह रही हैं—लाइट जला लीजिए। लाइट हमारा भरम भी बहा ले जाएगी। आँख खोलने से डर लग रहा है। दुनिया में इतनी बीरानी, इतना सन्नाटा! हाय! हाय! तस्वीरें भी फ़ोन में आ गई हैं। एकाध वीडियो भी आ गया है। लेकिन सब बेजान और मुर्दा हैं। जो ज़िंदा है, वही ज़िंदा है। (इस मनहूसियत में भी कवि अपने इस विचार पर फ़िदा है) समय के साथ जब स्मृति का टटकापन उतरेगा, तब तस्वीरों का रंग उभरेगा। अभी तो बस पहलू में फोड़े-सा कुछ टपक रहा है... विधाता का इतना क्रूर मज़ाक़...

मज़ा तो आया था। नब्बे किताबों के विमोचन कार्यक्रम में अध्यक्षता की है। बाक़ी सौ में बतौर वक्ता उपस्थिति रही है। कई-कई किताबों पर राय रखी, जिसमें से दो तीन सच में पढ़ी थी। बाक़ी यूनिवर्सल ट्रुथ से काम चल गया : यह उदारीकरण के बाद के भारत को समझने के लिए ज़रूरी किताब है। यह अभिजन की नज़र से नहीं बहुजन की नज़र से देखने का समय है। यह कविता के क्लासिकल तेवर की वापसी है। इनकी कविताएँ चेतना के तार को झंकृत करती हैं। हालाँकि बाद में पता चला वह कविता-संग्रह नहीं, गद्य-संग्रह है। लेकिन इतना तो चलता है। कविताओं में एक नदी का अल्हड़पन है! कवि अभी नया है चारु दूल्हे-सा शर्मा रहा है। अच्छी बात है कि मेले में सब कहने ही आते हैं। कोई सुनता नहीं। शब्द हवा में चमगादड़ से लटक गए हैं।

लेकिन यही चार दिन की चाँदनी और यही सुख गले में फँस गया है। बुक फ़ेयर का हैंगओवर नहीं उतर रहा। दुनिया उजड़ गई है। दुनिया क्यों उजड़ती है! कहाँ जाए आदमी। किताबों के गट्ठर मुँह बिरा रहे हैं। घर में ताज़ी किताबों की महक है। घर की हर चीज़ कवि की नज़र से देख रहा हूँ। बेसिन पर एक शेविंग ब्रश पड़ा है। मेरा ही है। अपनी ही पत्नी और बच्चों को किरदार की तरह देख रहा हूँ। कुछ है जो उन्हें कलात्मक अनुभव में तब्दील कर रहे हैं।

होता यह है कि बुक फ़ेयर हमारी संवेदनाएँ जगा देता है। भोथरी ज्ञानेंद्रियों से धूल की परत हट जाती है। वे निख़ालिस रिसेप्टिव हो जाती हैं। हम एक अलग गणतंत्र के नागरिक हो जाते हैं। आत्मा मुक्त गगन में विचरती है। बुक फ़ेयर ख़ुद को महान् होने का विश्वसनीय भरम रचता है। बुक फ़ेयर में होने का भरम यह है कि कवि को लगता है कि मैं किसी महान् मार्च का हिस्सा हूँ। अब लग रहा है। समझ, विवेक और सौंदर्य की दुनिया से बाहर धकेल दिया गया हूँ। फिर से आम आदमी हो ही नहीं पा रहा हूँ। बीवी के तसव्वुर में खोया हूँ। बीवी कह रही है कि रोज़ झोला उठाए मेले चले जाते हो घर में राशन-पानी नहीं है। बीवी को क्या शाप दूँ! इसको ख़बर ही नहीं मै कौन हूँ? और सरकार? सरकार से क्या ही उम्मीद करूँ? पुस्तक मेले के बाद सरकार को कवियों के यथार्थ वाली दुनिया में ट्रांजिशन में मदद करने के लिए दो दिन का रिहैबिलिटेशन कैंप चलाना चाहिए। लेकिन कौन समझेगा कि कवि के मन प्राण पर क्या बीत रही है?

दिन बीत रहे हैं। बीत ही जाते हैं। ड्यूल पर्सनेलिटी का जिन्न बैठ रहा है। अब लग रहा है, मेला माया है, भरमा गया है। इसलिए मध्यकालीन कवियों ने माया से दूर रहने की सलाह दी है।

माया क्या है? माया स्मृति है, ऐसी स्मृति ऐसा जादू जिसे दुबारा नहीं जिया जा सकता। बहादुर शाह ज़फ़र ने बुक फ़ेयर से लौटे कवि की मानसिकता का बहुत ऑथिटेंटिक ख़ाका खींचा है :

लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में 
किस की बनी है आलम-ए-ना-पाएदार में

कवि सोचता है कि हमारे साहित्य और संस्कृति में स्वर्ग की ग़लत तस्वीर दिखाई गई है। स्वर्ग में कल्पवृक्ष नहीं होता होगा, बल्कि वहाँ रोज़ी रोटी के टंटे से दूर सतत बुक फ़ेयर लगा रहता होगा। अप्सराएँ बढ़िया महकौवा इत्र लगाए स्टॉल-स्टॉल घूमती होंगी। जगह-जगह जलसा घर और लेखक मंच हैं। डेडीकेटेड श्रोता हैं, जिनके भविष्य में भी लिखने की कोई आशंका नहीं होती। अपरासाएँ कवि की किताब लिए घूमती रहती हैं। पहचानते ही खदेड़ कर चूम लेती होंगी। दारु का झागित मग लिए राह तकती होंगी। लेकिन अफ़सोस हम मृत्युलोक में हैं।

रोज़मर्रा की नून-तेल की इस टुच्ची दुनिया में मन न लग रहा। यथार्थ जिन्न की तरह पीछा कर रहा है। मेरे महबूब कवि हृदय लोगों के लिए यह दुनिया वेस्ट लैंड है, बंजर है। प्रभु कवि तक गनीमत थी, कवि हृदय क्यों बना दिए... हम प्रेम नाड़ी जगाने आए थे, यहाँ अपनी नाड़ी नहीं बैठ रही। आह! कितना दर्दीला है यह संसार...

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अन्य शंखनाद यहाँ पढ़िए : बुक फ़ेयर के लिए मुखौटे...

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