शनिवारेर चिट्ठी : हिन्दवी उत्सव : मेरी दुनिया कविता की दुनिया है
शायक आलोक
29 अगस्त 2026
आगमन
15:17 : तुम सरस जानती हो, मुझे ख़ास संधी पर नए कपड़े पहनना अच्छा लगता है। कारणमूल यही कि मॉल जा पहुँचा। नज़रें उड़ाने भर से ही उभर कर आया दरिद्राभास… सोचने लग पड़ा कि भारतीय मिडिल क्लास में दर्जन से अधिक उप-श्रेणियाँ होनी चाहिए। हम आख़िर से दूसरे-तीसरे तक पहुँचने की ही लायक़ी रखते हैं। चमकते बाज़ार के सामने एक भले कवि का सीना कैसा ढीला पड़ जाता है। प्रीमियम ब्रांडों का कुबेरपन। उन इकाइयों में प्रवेश भर से उत्पन्न नन्नाट—ऐसी अगतिकता, तौबा! हज़ार से दो हज़ार तक की टी-शर्ट—एक ही मिज़ाज। एक-सी नीरसता। तीन-चार हज़ार पार करो तो उनमें कुछ चमकता-सा प्रस्तुत होता है। लेकिन उसी क्षण मेरी ऐपत को चुनौती मिलने लगती है। फिर नाम-मुक्त टी-शर्ट पा सकने की जिद्द-ओ-जहद। ‘लोगो’ मुझे अश्लील लगते हैं। ब्रांड का नाम शरीर पर ढोना—कैसा विचित्र सादरीकरण। ख़ैर, समय ख़र्च हुआ पर पैसे बच गए। लौट आया ख़ाली। मुझे लगता है कि ऑनलाइन शॉपिंग ही मेरी वर्गीय हतबलता का सबसे सोयीस्कर उपचार है।
19:05 : किसी भी सहल, भटकंती या यात्रा से पहले कैसा उद्विग्न हो जाता हूँ। थकाती है यात्रा से अधिक उसकी पूर्वपीठिका। चीज़ों की सूचियाँ बनाए बिना कुछ कर नहीं पाता। एक सूची—फिर उसकी पुनर्विचारित सूची। क्या लेना है, क्या नहीं लेना है। फिर भी कुछ न कुछ छूटने की कुशंका। झोला खुलता-बंद होता रहता है। और बार-बार दर्पण देखता रहता हूँ। जाने किस चेहरे के सम्मुख होना है कि अपना चेहरा बार-बार देखना पड़ता है। बाल ठीक हैं। चेहरा अभी ठीक था, अभी कुछ बुजरा हुआ है। यात्रा शुरू होने के पहले भीतर इतनी घाई मची रहती है कि थककर सोचने लगता हूँ कि मुझे जाने का उपक्रम नहीं करना, किसी तरह अपने को समेटकर अपने ही पास से बस्स्स... निकल पड़ना है।
23:29 : यह रात की ट्रेन है। मैं अपनी बर्थ पर हूँ। खाना हो गया। ‘र’ बिरयानी लाई थी, ‘न’ रोटी-रोल। रोटी-रोल में ‘बेस’ अपनी प्रिया-परिचिता घरेलू रोटी का होता है। भली स्त्रियों ने ही यह दुनिया सुंदर बना रखी है... वगरना इस हफ़्ते के उपद्रवों पर यह विचार जगा था कि दुनिया अब रहने लायक़ जगह नहीं रह गई है, ख़ासकर कवियों के लिए। भले पुरुष दुनिया को सुंदर बनाए रखने में भली स्त्रियों की मदद कर रहे हैं। ‘ह’ ऐसा ही भला पुरुष है। मैंने उसके लिए कुछ नए प्रेमपूर्ण वाक्यों की रचना पर विचार किया है, पर अभी थका हूँ। सामने की बर्थ पर पड़े लड़के का नाम अयाज़ है। वह प्रणयसंवाद में रत है। मैंने उसके लिए ख़ुदा से कहा है कि इसे एक ट्रोल में परिणत होने से बचाए रखे। ऊपर की किसी बर्थ से किसी व्यक्ति ने खर्राटों के हमले शुरू कर दिए हैं। ‘होवे ममलिया, होवे ममलिया, जोखो मत जीजो...’ मैंने अपने कानों में निज-संगीत की मात्रा बढ़ा दी है। घर के बारे में सोचने लगा हूँ। सोच रहा हूँ कि मैं अनंत यात्री हूँ जिसने अभी यहाँ एक लघु गृहस्थापन किया है, वह यहीं अभी रात गुज़ार अगली यात्रा पर निकलेगा।
साक्षात्कार
07:19 : दिल्ली में बारिश थी। इलाहाबाद में बारिश है। हम जैसे बारिश के ही एक सरित में बहते हुए उस शहर से इस शहर आ गए हैं। बीस बरस पहले भी ऐसी ही एक यात्रा की थी। उस रात बार-बार “तू जहाँ, मैं वहाँ, संग-संग यूँ चलूँ तेरे, जैसे तेरा आसमाँ...” सुनता रहा था। इस याद पर अपने उस पुराने आदमी पर थोड़ा स्नेह आया है। उसे क्या मालूम था कि बीस साल बाद ‘जहाँ’ और ‘वहाँ’ के बीच इतने पते, इतने लोग पड़ जाएँगे। मेरी स्मृतियाँ अपने होने की अच्छाई या बुराई में नहीं बची रही हैं। वे मेरे जीते जाने की लापरवाही में बची रही हैं।
09:34 : गेस्ट हाउस। यह तो जैसे पुराने ठाकुरों की कोई पुरानी हवेली है। यहाँ एक भरे-पूरे परिवार की रिहाइश होगी कभी, अभी मेरा मुक्काम है। इन कमरों, बरामदों में पोशाक पहनी स्त्रियाँ फिरती होंगी। इस कल्पना पर मुस्कुराया हूँ कि ऐसी किसी जगह मुझे अचानक एक दिन याद पड़ जाए कि मैं तो किसी पुरानी कहानी का नायक हूँ तो क्या मज़ा हो। वैसे यहाँ कोई गंध नहीं है लेकिन मैंने सोच लिया है कि यहाँ भीतर बीते हुए समय की गंध है। दीवारों पर फ़्रेम में बंदूक़ें सजी हैं। ऊपरी हिस्से में भी एक बड़ा प्रांगण है और चारों ओर कमरे हैं। एक खुले हिस्से की ओर आगे बढ़ा तो इस भयविनोद में पड़ा कि अभी पीछे से इस जगह के किसी पुरखे की आवाज़ आएगी—इधर किधर? नई जगहों में हमेशा पहले कुछ जिज्ञासा आती है मेरे सामने, फिर भय या विनोद, पीछे फिर थोड़ा संकोच।
11:18 : आगे ही मुक्तिबोध दिखे, कुछ पीछे वीरेन डंगवाल। उनके कविता-पोस्टर्स। पूर्व-परिचय ने निकटस्थ असहजता को तुरित ही तोड़ दिया। मैं 'हिन्दवी उत्सव' की इस जगह पर हूँ। यह मेरी अपनी जगह है। ये मेरे अपने लोग हैं। मेरी दुनिया कविता की दुनिया है। बहुत-से वालंटियर बच्चे—गले में कार्ड, चेहरे पर दफ़्तरी तत्परता। जैसे अपनी उम्र से कुछ वर्ष आगे की नौकरी करते हुए। दरवाज़े पर वह महिला गार्ड हैं। उनकी वर्दी इस सम्मुख के बाल-संसार के बीच सबसे वयस्क चीज़। प्रतिभागी बच्चे दिखने लगे हैं। वे सहज दिख रहे हैं। मैं इस उम्र में इतना सहज नहीं हुआ करता था। एक उत्सव तो इन बच्चों की उपस्थिति और आवाजाही में ही शुरू हो चुका है। एक बच्चा किसी दूसरे बच्चे को रास्ता बता रहा है। दूसरा किसी तीसरे का कुरता ठीक कर रहा है। व्यवस्था में संलग्न बच्चे।
संस्पर्श
12:01 : मेरा ध्यान साड़ियों पर गया है। मैं कितनी ही देर गिनती में लगा रहा कि कितनी स्त्रियों ने साड़ी पहन रखी। उन्हें जानता हूँ, उन्हें नहीं भी जानता हूँ। सारी अपने-अपने ढंग से उपस्थित और साड़ियाँ अपने-अपने ढंग से मौजूद। पोशाक कम, मचलती हुई लहर अधिक। नाप का आग्रह नहीं। शरीर को छिपाती भी है, घोषित भी करती है। अन्य कपड़े जब शरीरों पर हजर भर बने रहने को अपनी नियति मान बैठे थे, तब साड़ियों ने खुली बोलाचाली का रास्ता चुना था। वे ससर रही थीं, घिसर रही थीं, पसर रही थीं। वे शरीर के साथ कुछ तो अलग घटित करती हैं। लावण्य में गरिमा की छौंक। समीज़-सलवार में तैयार किसी स्त्री का नाम रूपा हो तो साड़ी में उसका नाम रूपाश्री हो जाना चाहिए।
12:57 : तिग्मांशु धूलिया। ‘हासिल’ की महत्त्वाकांक्षाओं का लड़कपन। पान सिंह तोमर, डकैत नहीं, बाग़ी। साहेब बीवी और गैंगस्टर—विवाह के भीतर राजकारण और राजकारण के भीतर इच्छा। शागिर्द—वर्दी और अपराध के बीच की दूरी उतनी नहीं जितनी दिखाई देती है। जगहें केवल पृष्ठभूमि में कहाँ रहती हैं। इलाहाबाद आदमी की बोली में आ जाता है। चंबल उसकी चाल में। हवेली उसके व्यवहार में। दिल्ली उसकी आँख में। उन्हें देखते हुए मुझे उनके बचे हुए आदमी याद आ रहे हैं।
14:18 : तीन कवियों को पुरस्कार मिल चुके थे। तालियाँ अपने क्रम में थीं। मंच भी। तभी अचानक ज्यूरी पुरस्कार की घोषणा हुई। जैसे कविता को अचानक याद आया हो कि मतगणना का लोकतंत्र क़ायदे के दख़्ल पर ठीक काम करता है। ज्यूरी ने तीन कवयित्रियों को चुना, एक पुरस्कृत हुईं।
तादात्म्य
15:03 : आलोचना पढ़ती है। शब्दों को नहीं, उनके बीच बची हुई जगह को भी। सेंसर की नज़र अर्थ पर नहीं, उसकी हद पर होती है। यह चलेगा। यह नहीं। ट्रोल? उसे पढ़ने की फ़ुर्सत नहीं। उसे नाम चाहिए। चेहरा। एक वाक्य। बस... और लेखक लिखता है। उसके भीतर कोई दूसरा आदमी बैठा रहता है। पहले से चौकन्ना। यह शब्द? यह वाक्य? यहाँ कौन आएगा? उँगली ठिठकती है। वह लड़ता है उस चौकन्ने आदमी से। कभी वाक्य बदल जाता है। कभी लेखक। कभी वह चौकन्ना आदमी। कभी सब चुप। और चुप्पी भी प्रकाशित होती है।
16:49 : कविता। कवि अपनी कविता पढ़ता है, अपने ही लिखे हुए के सामने आ खड़ा होता है। शब्द उसके हैं। आवाज़ भी। फिर भी कविता में जो सबसे अंतरंग है, वह आवाज़ में भी पूरा कहाँ आ पाता होगा। कोई बहुत धीरे पढ़ता है। जैसे किसी ऐसी चीज़ के पास जा रहा हो जिसे जगाना नहीं चाहता। कोई तेज़। जैसे शब्दों को अपने पीछे छोड़ता हुआ। हम कविता सुन रहे हैं। कवि शायद उस मनःस्थिति को फिर छूता है जिसमें वह कविता कभी लिखी गई थी। वह मनोवस्था अब नहीं है। कविता है। आवाज़ उसे थोड़ी देर के लिए फिर उपस्थित कर देती है।
20:13 : अभी कविता-गायन चल रहा था। लोग सुन रहे थे। ख़ुश होकर तालियाँ पीट रहे थे। मेरे साथ फिर वही हुआ। आँखें नम। मैं तो अंधी आस्था के सामूहिक क्षणों में भी द्रवित हो जाता हूँ। इतने सारे अपरिचित मनुष्य। एक ही क्षण में प्रसन्न। एक ही आवेग से आप्लावित। किसी पंक्ति पर एक साथ खुलते हुए। एक क्षण के लिए रोज़मर्रा को भूलते हुए। कार्यक्रम अब अपनी समाप्ति पर था। जब तालियाँ रुक जाती हैं, तब भी लोगों के चेहरों पर उनकी थोड़ी-सी ध्वनि बची रहती है। मैं उसी बची हुई ध्वनि को सुनता रहा। एक क्षण के लिए सबकी हथेलियाँ एक ही काम में लगी रही थीं, फिर प्रत्येक हाथ अपनी देह का हो गया। कोई चश्मा ठीक करने लगा, कोई कपड़े सँभालने लगा।
अंतर्मंथन
23:09 : मुझे कार्यक्रम के बाद के क्षण अच्छे लगते हैं। मंच का औपचारिक वैभव उतर चुका होता है। लोग अपने-अपने परिचय से कुछ बाहर आ जाते हैं। कवि। आयोजक। अतिथि। ये सब अब किनारे लग जाते हैं। बचता है आदमी। फिर स्नेहभेटी। किसी के पास खड़ा होना। किसी की बात में अनायास फँस जाना। थोड़ी देर और। फिर विदा। इन छोटी संगतों में एक ऐसी आत्मीयता होती है, जिसका कोई मंचीय नाम नहीं। कार्यक्रम में हम एक-दूसरे को सुनते हैं। उसके बाद एक-दूसरे को थोड़ा-सा जीते हैं। एक सान्निध्य वहाँ शुरू होता है, जहाँ उसका सार्वजनिक अभिनय समाप्त हो चुका होता है।
05:24 : गेस्टहाउस लौटकर भी सोया नहीं। थकावट थी। नींद नहीं। या नींद थी और मैं उसके पक्ष में नहीं था। बातें होती रहीं। बैठा रहा। मुझे हितगुज इतना पसंद नहीं। इतना घुल-मिल जाना भी नहीं। अपने चारों ओर थोड़ी जगह बची रहे, यह आग्रह पुराना है। फिर भी इस रात उठकर कमरे में चले जाने की इच्छा नहीं हुई। मैं मेरे होने को चुनौती देता रहा। रात आगे सरकती रही। मैं बोल रहा था और मैं ख़ाली हो रहा था। भीतर कोई जगह थी जो भर रही थी। कैसा द्विधाभाव—मुझे लोगों से दूरी भी चाहिए और लोगों की निकटता में रात भी ख़र्च कर ली।
09:17 : लौट रहा हूँ। फिर ट्रेन। यह दिन का समय है। आँखों में नींद की महीन परत है और बाहर बारिश। शीशे के उस पार सब हरा है। दिल्ली से इलाहाबाद गया था—बारिश में। इलाहाबाद से दिल्ली लौट रहा हूँ—बारिश में। जैसे इस यात्रा में मेरी आवाजाही का कोई एक ही मौसम चल रहा हो। मैं उसमें हूँ और फ़िलहाल इतना काफ़ी है। मैं आजकल किसी भी वस्तुस्थिति की शिकायत नहीं रखता। ऐसा नहीं है कि मैं निवांत रहना सीख गया हूँ। बस भीतरी शिकायतकर्ता की उपेक्षा करने लगा हूँ। मैं किसी भी चीज़ को अनुकूल करने की इच्छा के बिना लौटने लगा हूँ।
अपसृत
00:28 : यही कमरा है। सोकर उठा हूँ तो रात हो रही है। दो कृतियाँ झाँक रही हैं ताखे की दो नियत जगहों से। यही मेरी दुनिया है। मेरी दुनिया कविता की दुनिया है।
आज कालके जोग दिए की होबे?
सेटा ना होय भावबो अनेक पोरे।
आपाततो एइ कथाटा भावि—
फुर्ति केनो एतो बिषम जोरे?
— शंख घोष
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