शनिवारेर चिट्ठी : अनुशोचना और बाक़ी गल्प
शायक आलोक
25 अप्रैल 2026
स्फुलिंग
कमरा-तर, कमरा-कम या अ-कमरा जैसे शब्द भी कहीं होते हैं, कहो तो! तो फिर बहुत से कमरों के बारे में अंतर की कुछ-कुछ बातें कहने के लिए यो-वो शब्द न हो तो किस कार्य में लगेगा वह कवि के? अंतर की खोज के अनंतर इस पर भी कुछ विचार करूँगा, तब कहूँगा। घर-दूर-घर का वह पहला ही अनुभव। एक खिड़की। तीन कमरों में एक कमरा और एक कमरे में मैं दो। मैं हमेशा से दो रहा था मंजरी! एक बाहर-बाहर रहा करता था, एक अंदर-अंदर फिरता था। परिणीता चौधुरानी से प्रेम किया वहीं। ऊपर कोठे तक जाती सत्ताईस सीढ़ियों के लिए सत्ताईस चुम्बन। यही रोज़ का हिसाब। फूल-कंकड़-काग़ज़—जो भी उछाले उस पर, एक रोष में वापस माँगकर ले गया कहीं। ऐसा रुष्ट—कैसा दुष्ट, ऐसा उद्गार रहा था उसका। बिदाय के दिवस अलग ही कष्ट होता है सखी। गाड़ी-छकरा पर चार बोरियाँ लादे गली को पीछे छोड़ता जाता है आदमी और खुले शहर में ख़ाली आ गिरता है। वह पीछे भी नहीं देखता भयभीत कि उधर से नहीं देखती होंगी दो आँखें तो हृदय बिंधेगा अलग। आशाकातर पगध्वनि में रोज़ लौटती है उधर, सुबकती हुई रोज़ लौटती है इधर। फ़ोन करो तो दुनिया भर की आवाज़ें आती हैं; वह एक आवाज़ नहीं आती, यह कैसी बुरी बात हुई, कहो तो!
निःशब्द क्षणों में ही सबसे अधिक शोर होता है भीतर, यह बात तब समझ आती है जब बाहर सब थम जाता है। घर-घरांतर की यह जो फाँक है, उसी के भीतर से तो प्रेयस सुनता है अपनी प्रतिध्वनि। खिड़की के काँच पर जैसे जमता है कुहासा, वैसे ही जमा रहती है शेष कथा। उँगली से छूते ही मिट जाती है।
कमरे के गल्प में उस प्रिया की और कथा होगी कैसे करके, कहो तो!
दाहबीज
अरेका पाम! बालकनी को खुलता दरवाज़ा। एक स्थिर दृश्य जो निजेइ निजेर प्रतीक्षा में है। ठीक माथे पर झूलता एक पंखा। उसकी मंद परिक्रमा में कमरे को मिलता एक दीर्घ शेष आवर्तन। स्टोव, कूकर और चार किताबें। सिगरेट और माउथ-ऑर्गन के कश लगाता हूँ। कैसा निसा, अनुनाद, कहाँ की अनुध्वनि कि वे बेसुर ध्वनियाँ स्वरबद्ध हो जाती हैं। आँखें मूँदें सुनता रहता हूँ उसे कुछ क्षण और पंखा बंद कर देता हूँ। पंखा बंद करते वह संगीत बंद हो जाता है। बीथोवेन को बाद में सुना, इस कमरे को पहले। बग़ल के कमरे में कोई गुरु दिन-रात्रि बोलता रहता है। तुँम्हारा आनंद ऊँचाईँ की ओर गति है और तुँम्हारा ध्यान गहराईँ की ओर। मेरे भीतर उस कंठ की अनुनासिक छाप दर्ज हो जाती है। गढ़े शब्दों के भीतर से छनता हुआ मेरा अनगढ़ सत्य। और एक बार जब दोनों ही तुम्हारे पास हों, तुम्हारा जीवन एक उत्सव बन जाता है। यही मेरा काम है, तुम्हारे जीवन के दुःख भरे प्रसंग को उत्सव में रूपांतरित कर देना। हर व्यक्ति की अब यह ज़िम्मेवारी है कि वह अपने चारों ओर एक बुद्ध-क्षेत्र का निर्माण करे, एक ऐसा ऊर्जा क्षेत्र जो बड़े से बड़ा होता जाए।
मेरे बुद्ध-क्षेत्र में मेरे पिता का प्रवेश हुआ एक दिन। मेरी लज्जातुरता सघन हो रही है कि उन्होंने लत्ते बदले हैं और मेरे बासनों को घिसने में लग गए हैं। ...और पिताओं जैसे क्यों नहीं हैं मेरे पिता! अपनी संतानों को भोग का परितोष सौंपने वाले पिताओं-से। प्रचलित पितृ-प्रतिमा के अनुरूप क्यों नहीं है उनका आचरण। मुझे महँगा खाना खिलाने और बाइस्कोप दिखाने क्यों नहीं ले जाते पिता। वह बर्तन धोने की अपनी साधना में इस छोटे से घर को अपने निजी अनुशासन से परिष्कृत करते हुए। इस एकल क्रिया से मेरे बुद्ध-क्षेत्र को अपने बुद्ध-क्षेत्र में रूपांतरित करते हुए। शुचिता है पहला नियम। घर में बनाओ घर में खाओ के सरल बोध से देय स्थिरता। छात्र-जीवन में होनी चाहिए शृंखला। अपना काम आप करने में नहीं है कोई लघुता। भोर चान व ध्यान का जीवन। पृथिबी है भीषण सुंदर, जदि सुंदर जीते हो तुम।
शिखापथ
हर गुहर ने सदफ़ को तोड़ दिया...
— इक़बाल
तीसरे कमरे को सदफ़ का कमरा क्यों न कहूँ! उसे सदफ़ की यौन-क्रियाओं का कमरा कहूँ। उसे सदफ़ का ही कमरा क्यों कहूँ, शिशिर उपाध्याय के छल-प्रयोगों का कमरा क्यों न कहूँ। सदफ़ को जब भी देखा, परदे में देखा। उसके क़िस्से सुने, खुली-ज़ुबाँ सुने। उसके क़िस्से बनाए हमने। कामनिवृत्त मित्र दंपत्ति को की ख़बर कि उनके शीश ऊपर का संग-ए-मरमर फ़र्श मरमरी सदफ़ के श्वेत उच्छ्वासों से दैनिक रूप से बुहारा जाता है। मुझे कभी वह कमरा अपना कमरा नहीं लगा। कोई कमरा अपना कमरा बनाया जाता है कैसे? किराये के कमरे में एक अपनत्व उगाया ही जाता है तो किस विधि, कहो! सामने की सड़क नहीं लगी मुझे अपनी सड़क। वह मोड़ अपना मोड़ नहीं लगा, जहाँ से सदफ़ मुड़ती थी और उधर संसार में विलीन हो जाती थी। इधर संसार में मैं इसे अपना कमरा बनाने के उपाय सोचता था, कैसे होना था यह संभव!
क्या फिर कथा अदिश मुड़ेगी कि कमरे को हम अपना बनाते हैं या कमरा हमें अपना बनाता है। कमरा हमें सौंपता है अपना दृश्य-गुण और ध्वनि-गुण और परिचित बन जाता है या हम उसे सौंपते हैं अपनी श्रुति और लिपि और अनुसारी व्यवहार की आकांक्षा रखते हैं।
तपन-लय
ऊपर के उस कमरे में रहते मैंने चुराए बरखा के वे आधुनिक कपड़े और घूमा क़स्बे में महाशहर से लौटे रूप-रंगत में बदले धुरबा की तरह। वहीं से छुपकर देखा निर्झरा को सप्राण हर बारिश में उसे उसके पानी पारदर्शी हुए वस्त्रों में नग्नता के दूर पार तक। ज़ीने पर वहीं लगाए सावेरी के दरवाज़े पर कान और सुना उसे गुनगुनाते हुए शोक का अभिनव सिनेमाई गीत। जगत् की सब जनानियाँ रहतीं थीं—मेरे आकाश-घर से लंबवत् नीचे सुदूर भूमि-घर में। वहाँ एक साइबर-कैफ़े चलता था। खुली स्त्रियों से पहली बार मिला दिन-रात खुली रहती उस जगह के नीले अँधियारे में। फ़िलिपींस की कोरा डुलर जीने के दुःख दिखाती थी, लघुतम लजाती थी। नेपाल की छमिया ने नेपाली भाषा के सबसे सुंदर शब्दों में देह और आत्मा के सबसे सुंदर वाक्य मेरे लिए गढ़े। उसके वाक्य-खंड बाद की मेरी कई कविताओं के काम आए। वहीं रहती थी पाकिस्तानी कश्मीर की सारा और बेलारूस की त्मारा। वहीं मिली कुमारी कुसुम ने मेरे मुख-सम्मुख पहली बार च-शब्द कहा तो मैं अपनी दुनिया की पहली नई स्त्री से मिला। संकोच टूटने के अंध-आनुगत्य में श्लील बने रहते हुए मुच्च की च-ध्वनि का पहला पाठ भी उसी कमरे में न होता तो किस घर होता, कहो!
ऊष्मा-शेष
वे कमरे एक दूसरे के पड़ोसी थे। पहला कमरा प्रेम का कमरा था, दूसरा अनागत आत्मीयता का। वे दो दूर के शहर थे। एक शहर अनुराग का, दूसरा अनंत ग़लतियों का। एक हत्या इस घर में हुई थी, दूसरी हत्या उस घर में। इस शहर में मेरी हत्या हुई थी, उस शहर में मैंने हत्या की थी। मैं नहीं चाहता था कि एक घर का प्रतिशोध दूसरे घर से लूँ या एक शहर का प्रतिकार हो दूसरे शहर से। हुआ वही। मन में पड़ता है कि ऐसा न होता तो उचित होता। अनुताप मिटेगा नहीं, ऐसा संदेह बना रहता है। कुछ प्रयास करूँगा, ऐसा सोचता हूँ। आत्म-छलना भी तो अपने अंदर बचे रहने का कोई युक्तियुक्त प्रबंध है, नहीं?
तुम सुन रही हो तो कह रहा हूँ—आत्म-छलना का छल किसी और के प्रति नहीं, स्वयं के अनुभव व पहचान के प्रति ही होता है। हम अपने दुःख को तुच्छ बताते हैं, अपनी इच्छाओं को अनुचित। अपनी विफलताओं को परिदृश्यों की गर्द से ढक देते हैं। सत्य को कुछ टाल देने से उसकी तीव्रता के कुछ कम हो जाने का भ्रम बनता है। आत्म-छलना का तो स्वभाव ही यही। वह हमारी दृष्टि में धुंध भर देती है। हम जो देखना चाहते हैं, वही देखने लगते हैं। हम जो सुनना चाहते हैं, वही सुनते हैं। अनुशोचना का संवाद, जो अभी साफ़ और सफ़ेद रहा था, किसी दूर की प्रतिध्वनि में बदल जाता है। अब हम अनुभूत जीवन की ग्लानियों के साक्षी नहीं रहना चाहते, सुभीता की अपनी कथा के गढ़े हुए पात्र बन जाते हैं। किंतु इस छल में एक करुणा ही तो लीन रही है। अपने को बचाए रखने की सहज चेष्टा एक सदिच्छा ही कही जाएगी, आशंका नहीं इसमें कोई। सच को स्वीकार कर पाना हमेशा संभव नहीं होता। संभवतः इसलिए हम अपने ही भीतर एक समय के लिए एक आवरण बुन लेते हैं। लेकिन यह आवरण स्थायी नहीं होता, प्रिये! समय के प्रवाह में आत्म-छलना का ताना-बाना स्वयं उद्घाटित होता चलता है।
छाइरेखा
यह कमरा था हमारा सुपरिचित कमरा। कमरों की कथा में से अनंतिम। ‘हिन्दवी’-जीवन की छूट लूँ तो इसे कह सकता हूँ—समादृत। सुंदर जीवन-कथा से पुरस्कृत! यहाँ मेरे कवि को मिला आश्रय, मेरा प्रेमी हुआ और थिर। यहीं हुआ हमें प्यार और इस इटैलिक पर ठहर यहीं से बढ़ी आगे जीवन की हमारी गाड़ी। सब कमरों में इस कमरे को कहूँ मैं ज़रा अधिक शुक्रिया, कहो!
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शनिवारेर चिट्ठी में यह भी पढ़ सकते हैं : कल से रवैया फ़र्क़ होगा | दिनानुदिन की चूलें बिठाते हुए
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