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संतोष झा और साथी कलाकार : कविता का संगीत-आवास

कविता और संगीत का संबंध केवल कविता को धुन में बाँध देने तक सीमित नहीं है। कविता में शब्दों की ध्वनि, लय, आरोह-अवरोह, विराम और गति पहले से ही एक तरह की संगीतात्मक संरचना बनाते हैं। शोध भी कविता के पाठ और संगीत-प्रस्तुति में लय तथा ध्वनि-संरचना की समानताओं की ओर संकेत करते हैं। इसलिए कविता को संगीत में प्रस्तुत करना उसके अर्थ की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि उसकी ध्वनि से जुड़ी भावात्मक संभावनाओं की नई व्याख्या हो सकता है। सही संगीत कविता के अर्थ पर हावी होने के बजाय उसके भीतर मौजूद लय और संवेदना को उभारता है और श्रोता को कविता को केवल सुनने नहीं, बल्कि ‘एक नए ढंग से महसूस करने’ का अवसर देता है।

‘हिन्दवी उत्सव’ में हिंदी साहित्य के महत्त्वपूर्ण विषयों पर हुए विमर्श-सत्र, कविता-सत्र और संगीत-संध्या सरीखे सत्रों ने एक साथ रचनात्मकता, कलात्मकता और विविध अभिव्यक्ति का ऐसा संगम तैयार किया है, जैसा फ़िलहाल अन्य आयोजनों में एक साथ एक जगह होना संभव नहीं हो पाया है और यही विशिष्टता ‘हिन्दवी उत्सव’ को एक अलग पहचान देती है। इस बार भी हिन्दवी उत्सव, हिंदीप्रेमियों को साहित्य के अलग-अलग रंगों और स्वरों से रूबरू कराने के लिए तैयार है।

इसी क्रम में इस वर्ष ‘संगीत-संध्या’—हिंदी-कविताओं की संगीतमय प्रस्तुति—सत्र के लिए संतोष झा, सुमन कुमार और साथी संगतकार आमंत्रित हैं। इस सत्र में कविताओं को केवल पढ़ा या सुना नहीं जाएगा, बल्कि स्वर, संगीत, संवेदना और रचनात्मकता के मेल से उसे एक नए अनुभव के रूप में महसूस भी किया जा सकेगा। इस सत्र में आप अनुभव कर पाएँगे कि कविता जब गेय रूप ग्रहण करती है, तो वह पाठक से आगे बढ़कर श्रोता के अनुभव का हिस्सा बन जाती है और अपनी संवेदना को अधिक सहजता से जन-मन तक पहुँचाती है।

संतोष झा, सुमन कुमार और साथी कलाकार

संतोष झा लगभग 30 वर्षों से विभिन्न रचनात्मक गतिविधियों में सक्रिय हैं। इस दौरान रंगमंच उनके सृजनात्मक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा है; जहाँ उन्होंने निर्देशन, संगीत, अभिनय और लेखन जैसी विविध भूमिकाएँ निभाई हैं। थिएटर से अपने जुड़ाव के शुरुआती वर्षों से ही वह संगीत-रचना करते आ रहे हैं। कई सांगीतिक नाट्य-प्रस्तुतियों और नाटकों के संगीत की पूरी ज़िम्मेदारी उन्होंने सँभाली है। इसके साथ साथ वह समय-समय पर सामाजिक सरोकारों और विभिन्न मुद्दों पर गीत लिखने और उन्हें संगीतबद्ध करने का काम भी करते रहे हैं। अनुभव और निरंतर अभ्यास से विकसित हुई अपनी संगीत-यात्रा को वह ‘लर्निंग बाय डूइंग’ की प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। अर्थात् : काम करते हुए सीखना, प्रयोग करना और उसी प्रक्रिया में अपनी संगीत-भाषा को विकसित करते जाना।

सुमन कुमार पिछले 25 वर्षों से रंगमंच के क्षेत्र में बतौर अभिनेता सक्रिय हैं। इन वर्षों में उन्होंने विभिन्न नाट्य-प्रस्तुतियों के माध्यम से अभिनय के क्षेत्र में निरंतर काम किया है और रंगमंच की विविध शैलियों एवं प्रयोगों से जुड़े रहे हैं।

संतोष झा और सुमन कुमार पटना की सांस्कृतिक संस्था ‘हिरावल’ से संबद्ध रहे हैं। वह लंबे समय से कविता, संगीत और सामाजिक सरोकारों को एक साथ लेकर चलने वाली प्रस्तुतियों के लिए पहचाने जाते हैं। आज जब हिंदी कविता को अक्सर केवल पढ़ने या पाठ करने तक सीमित मान लिया जाता है, संतोष झा और सुमन कुमार ने इस पारंपरिक ढर्रे को पूरी तरह बदल दिया है। उन्होंने हिंदी कविता को आम जनता तक पहुँचाया और न केवल हिंदी कविता बल्कि भोजपुरी, उर्दू और लोक-आधारित तरानों को भी गीतों में बदला। वे सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, शमशेर बहादुर सिंह, नागार्जुन, त्रिलोचन, गोरख पांडेय और वीरेन डंगवाल जैसे हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवियों की रचनाओं को संगीतमय रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं।

अदिति नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा से संबद्ध रही हैं। साथ ही 2021 से 2023 तक नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा रिपर्टरी कंपनी, नई दिल्ली की कलाकार भी रही हैं। अभिनय के साथ-साथ उन्होंने विभिन्न फ़िल्म संस्थानों में प्रशिक्षक के रूप में काम किया है और अभिनय, विशेष रूप से वॉइस एवं स्पीच पर केंद्रित कई कार्यशालाएँ संचालित की हैं। अपनी थिएटर जर्नी में उन्होंने प्रसन्ना, अनुराधा कपूर, के. एस. राजेंद्रन, अनिरुद्ध खुटवड़ और अतुल कुमार जैसे प्रमुख रंग-निर्देशकों के साथ काम किया है।

राजेश कुमार सिंह तबला और ढोलक के निपुण वादक हैं। वह प्रसिद्ध रंग-निर्देशक संजय उपाध्याय के ‘बिदेसिया’ सहित अनेक नाट्य-प्रस्तुतियों में percussionist के रूप में अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके हैं। दो दशकों से अधिक समय से वह संगीत और रंगमंच के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं।

ख़ुशी भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रशिक्षित गायिका हैं। वह कई वर्षों से गायन के क्षेत्र में सक्रिय हैं।

पंकज प्रशिक्षित अभिनेता और गायक हैं। गए छह वर्षों से वह अभिनय और गायन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं और विभिन्न रचनात्मक प्रस्तुतियों का हिस्सा रहे हैं।

‘हिन्दवी उत्सव’ में होने वाले सत्र के सिलसिले में कविता और संगीत को लेकर संतोष झा से हुई बातचीत में उन्होंने कविता की लयात्मक संभावनाओं और उसे संगीतबद्ध कर गायन में ढालने की रचनात्मक प्रक्रिया से जुड़े सवाल को लेकर कहा कि जब वह किसी अच्छी कविता को पढ़ते हैं, तो उन्हें उसके भीतर एक धीमा और अव्यक्त संगीत सुनाई देने लगता है। एक अच्छी कविता की भाषा भी अच्छी होती है... और जब यह आंतरिक संगीत उनको महसूस होता है तो वह हारमोनियम के साथ आगे बढ़ने की कोशिशें शुरू करते हैं। हालाँकि अच्छी कविताओं को संगीतबद्ध करने की अनिवार्यता के विचार के साथ वह कविता को नहीं पढ़ते। उनके द्वारा कविता को संगीतबद्ध करने का यही उद्देश्य रहता है कि संगीत के साथ उसका प्रभाव कविता के पाठ जितना या उससे भी अधिक हो। जब उन्हें लगता है कि संगीत कविता के भाव और प्रभाव को पूरी तरह उभार रहा है, तभी वह उसे श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करते हैं।

मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ को संगीतबद्ध करने को लेकर वह बताते हैं कि उन्होंने इस कविता के केवल एक छोटे से अंश को ही संगीत के साथ मिलाने की कोशिश की है, जो बेहद चर्चित पंक्ति ‘ओ मेरे आदर्शवादी मन...’ से प्रारंभ है। इस अंश को वह ‘पागल की पुकार’ सदृश्य देखते हैं— जैसे कोई सिरफिरा पागल जैसे अपने भीतर से ज़ोर-ज़ोर से चीख़-चीख़कर कुछ गा रहा है। इस हिस्से के ठीक पहले आए शब्द ‘हृदय रसाल’, ‘करुण रसाल’ जैसे शब्दों का प्रयोग एक पाठक को ख़ुद-ब-ख़ुद यह महसूस कराता है कि इन आगे की पंक्तियों को सामान्य ढंग से नहीं पढ़ा जा सकता। इन्हें पढ़ने या गाने के लिए उसी चीख़, चीत्कार या किसी गहरी पुकार जैसे स्वर की आवश्यकता महसूस होती है।

‘अँधेरे में’ को सुनते हुए ‘एक नए ढंग से महसूस करने’ करने वाली बात फिर याद हो आती है। मतलब यह है कि कविता को संगीत में प्रस्तुत करने पर श्रोता केवल उसके शब्दों और अर्थ को ग्रहण नहीं करता; बल्कि उसकी लय, गति, स्वर, विराम, आवाज़ की ऊँच-नीच और भावनात्मक उतार-चढ़ाव को भी एक साथ अनुभव करता है। संगीत और कविता कि लय और स्वर-लय अपने आपमें भावनाएँ उत्पन्न या बढ़ा सकती हैं; यानी कविता का भाव केवल ‘क्या कहा गया है’ इससे नहीं, बल्कि ‘कैसे सुनाई देता है’ इससे भी बनता है।

मसलन, किसी कविता में ‘दुख’ शब्दों के अर्थ से व्यक्त हो रहा हो; लेकिन धीमी गति, नीचा स्वर और लंबे विराम उस दुख को श्रोता के लिए और अधिक गहरा बना सकते हैं। इसी तरह किसी कविता की बेचैनी को तेज़ लय, ऊँचे स्वर या अचानक बदलती गति अधिक तीव्र बना सकती है। इसलिए संगीत कविता में कोई बाहरी सजावट भर नहीं है, वह कविता के भीतर मौजूद भाव और ध्वनि-संरचना को ‘शारीरिक और भावनात्मक अनुभव’ में बदलने वाला एक माध्यम है।

क्या हर कविता में संगीत छिपा होता है या कई कविताएँ संगीत का प्रतिरोध करती हैं? कविता और संगीत को लेकर ऐसे विरोधाभासी मत रखने वाले लोग कम नहीं हैं। इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि संसार में ऐसी कोई भी कविता नहीं हो सकती जिसके भीतर संगीत मौजूद न हो। इसके पीछे का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि संगीत मूल रूप से ‘ध्वनि’ है। चूँकि हर कविता शब्दों से बनती है और शब्दों की अपनी ध्वनियाँ होती हैं, इसलिए संगीत से रहित किसी कविता की कल्पना नहीं की जा सकती। कविता और संगीत दो अलग-अलग चीज़ें नहीं, अपितु कविता में संगीत अंतर्निहित है।

अंत में यहाँ यह भी कहना ज़रूरी जान पड़ता है कि भले ही आज की समकालीन कविता छंद से कुछ दूर नज़र आती हो, लेकिन हमारी पूरी कविता-परंपरा छंदबद्ध-संगीतबद्ध रूप में ही सबसे अधिक जन-मन तक पहुँची है। ऐसे में समकालीन कविता को स्वरबद्ध करके, उसकी आंतरिक लय को सामने लाकर जन-जन तक पहुँचाना एक महत्त्वपूर्ण और सार्थक कार्य है। इस परंपरा के ही एक नवीन प्रसंग के अंतर्गत आप इस बार के ‘हिन्दवी उत्सव’ की संगीत-संध्या में संतोष झा और उनके साथी-कलाकारों [सुमन कुमार, अदिति, राजेश कुमार सिंह, ख़ुशी, पंकज] की हिंदी-कविताओं पर आधारित संगीतात्मक प्रस्तुति से गुज़रेंगे।

आपको बता दें कि ‘रेख़्ता फ़ाउंडेशन’ का उपक्रम ‘हिन्दवी’ हिंदी-साहित्य-संस्कृति-कला-संसार को समर्पित अपने वार्षिकोत्सव—‘हिन्दवी उत्सव’ के छठे संस्करण का आयोजन करने जा रहा है। यह आयोजन रविवार, 23 अगस्त 2026 को उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र [NCZCC], प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में होगा। इस विषय में और जानकारी के लिए यहाँ देखिए : हिन्दवी उत्सव-2026

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