‘रेत की मछली’ : यथार्थ का विकृत चेहरा
रीना सिंह
09 सितम्बर 2026
कुछ दिनों पहले मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मैं बर्बाद होना चाहती हूँ’ पढ़ी थी। उसमें मलिका ने अपने विवाहित जीवन की पीड़ा को बिना किसी लाग-लपेट के उघाड़कर रख दिया था। हाल ही में ‘रेत की मछली’ उपन्यास पढ़ा, जिसे कांता भारती ने लिखा है। वह धर्मवीर भारती की पहली पत्नी हैं। यद्यपि ‘रेत की मछली’ औपचारिक रूप से एक उपन्यास है, तथापि उसमें निहित संकेतों, परिवर्तित नामों और घटनाओं के अंतःसंबंधों को देखते हुए इसे आत्मकथात्मक अनुभवों की छाया में पढ़ना असंगत नहीं प्रतीत होता। हैरानी होती है यह जानकर कि समाज की नज़र में प्रतिष्ठित पुरुषों से जुड़ी हुई स्त्रियों का जीवन कितना कारुणिक और त्रासद हो सकता है। जिन मूल्यों के नाम पर ये पुरुष समाज में आदर पाते हैं, वही मूल्य उनके निजी जीवन में कितनी आसानी से रौंदे जा सकते हैं।
उपन्यास की नायिका कुंतल एक शांत, शर्मीली और संकोची लड़की है, लेकिन जब वह शोभन के प्रेम में पड़ती है तो उसका एक अलग ही रूप सामने आता है। उसके पिता विजातीय शोभन से उसके विवाह के पक्ष में नहीं थे। शोभन, जो एक प्रोफ़ेसर और साहित्यकार भी है, कुंतल को भगाकर शादी करने के लिए मना ही लेता है और इस प्रकार प्रेम का वह स्वप्निल परिणय वास्तविकता में परिणत हो जाता है। उनकी योजना जानकर अनचाहे मन से ही कुंतल के पिता विवाह के लिए तैयार हो जाते हैं।
विवाह हो भी जाता है। परंतु यहीं से कथा का यथार्थपरक और विडंबनापूर्ण पक्ष उद्घाटित होता है। जिन दो एयों का प्रेम कभी इतना प्रगाढ़ प्रतीत होता था कि वे एक-दूसरे के लिए सर्वस्व न्योछावर करने को तत्पर थे, वही संबंध धीरे-धीरे भावनात्मक दूरी और विखंडन की ओर अग्रसर होने लगता है। यह स्थिति पाठक के मन में यह प्रश्न उपस्थित करती है कि क्या वास्तव में वह प्रेम था या केवल एक क्षणिक आवेग? प्रेम, जो स्वभावतः असीम और स्थायी माना जाता है, यहाँ एकपक्षीय और क्षणभंगुर प्रतीत होता है। इसलिए संबंधों की कली खिलने से पहले ही मुरझा जाती है।
लेखिका ने इस विडंबना को अत्यंत सूक्ष्म और प्रभावी बिंब के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। कुंतल जब अपने पति के घर पहुँचती है, तब वहाँ की फूल-बगिया में उगने वाली एक ‘जंगली लतर’ का उल्लेख बार-बार आता है। यह लतर केवल प्राकृतिक उपस्थिति नहीं, बल्कि एक गहन प्रतीक है—कुंतल के भावी जीवन की उन अदृश्य किंतु विनाशकारी परिस्थितियों का, जो धीरे-धीरे उसके जीवन की कोमलता और सौंदर्य को निगल जाएँगी। यह जंगली लतर जिस प्रकार बगिया के सुसंस्कृत पुष्पों को आच्छादित कर अंततः उन्हें नष्ट कर देती है, उसी प्रकार कुंतल के जीवन में प्रवेश करने वाली विषमताएँ, उपेक्षा और आंतरिक संघर्ष उसके सपनों और संवेदनाओं को क्षीण कर देते हैं। इस प्रकार यह बिंब न केवल कथा को सौंदर्यात्मक गहराई प्रदान करता है, बल्कि नायिका के जीवन की त्रासदी का पूर्वाभास भी कराता है।
उपन्यास का पाठ क्रमशः पाठक को एक ऐसे असह्य यथार्थ के सम्मुख खड़ा कर देता है, जिसे स्वीकार कर पाना सहज नहीं होता। प्रारंभिक चरण में पाठक बार-बार स्वयं को आश्वस्त करता है कि संभवतः कुंतल की आशंकाएँ केवल भ्रम हैं और आगे चलकर सब कुछ स्पष्ट होकर एक सामान्य वैवाहिक जीवन की ओर लौट आएगा। किंतु कथा जैसे-जैसे विकसित होती है, यह आश्वासन धीरे-धीरे विखंडित होता जाता है और एक कठोर, अप्रिय सत्य उद्घाटित होने लगता है।
एक ऐसा संबंध, जिसे भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में पवित्रता और मर्यादा का प्रतीक माना जाता है—मुँहबोली बहन का संबंध—उसी का इस प्रकार विघटन होते देखना पाठक के भीतर गहन वितृष्णा और आक्रोश उत्पन्न करता है। यह केवल एक व्यक्तिगत पतन नहीं, बल्कि उन मूल्यों के क्षरण का संकेत है, जिन पर सभ्यता और संबंधों की नींव टिकी होती है। अपनी ही मुँहबोली बहन, जिससे एक पुरुष राखी बँधवाता है, वह किस प्रकार इस पवित्र रिश्ते की मर्यादा को तार-तार कर सकता है, यह उपन्यास पढ़कर मालूम होता है।
प्रारंभ में पति द्वारा इस संबंध को छिपाने और सामान्य बनाए रखने का प्रयास किया जाता है, किंतु जब वही स्थितियाँ बार-बार प्रकट होने लगती हैं, तब उसका वास्तविक स्वरूप पूरी निर्लज्जता के साथ सामने आ जाता है। उपन्यास में चित्रित यह प्रतिष्ठित साहित्यकार मानवता की निचली पायदान पर पहुँचकर अपनी सारी सीमाओं को लाँघता हुआ अपनी ही पत्नी के समक्ष मुँहबोली बहन से न सिर्फ़ शारीरिक संबंध बनाता है, बल्कि अपनी पत्नी को भी इस क्षण का आनंद उठाने के लिए कहता है, “कुंतल, हम सब आओ एकात्म हो जाएँ। मैं, मीनल, तुम। हम सब में उस सुख को बहने दो।”
ऐसे क्षण में एक स्त्री के मन पर क्या गुज़रती होगी, यह सोचकर ही रूह काँप जाती है। अपने ही पति को किसी अन्य स्त्री के साथ, वह भी अपने समक्ष, इस प्रकार देखना—और उस पर किसी प्रकार की लज्जा, अपराधबोध या संकोच का अभाव—स्त्री के आत्मसम्मान को भीतर तक झकझोर देने वाला अनुभव है।
किसी भी साहित्यकार की रचना में उसके जीवन के अनुभवों और व्यक्तित्व का बिंब-प्रतिबिंब अनिवार्य रूप से झलकता है। जिस लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार को केंद्र में रखकर इस उपन्यास की रचना की गई है, उसके व्यक्तित्व की ओर संकेत करते हुए रचे गए ये प्रसंग मन में गहरी वितृष्णा उत्पन्न होती है। आश्चर्य होता है कि उसके एक चर्चित उपन्यास में भी ऐसे ही पुरुष चरित्र को देवतुल्य बनाकर प्रतिष्ठित किया गया है, जो इस कथा में चित्रित उसके अपने आचरण से अत्यंत साम्य रखता है। अपने कर्मों को महानता का आवरण देते हुए स्त्रियों के जीवन के साथ खिलवाड़ करना—ऐसे चरित्र को कैसे क्षमा किया जा सकता है?
यह चरित्र अपने अनैतिक कर्मों को भी महानता का जामा पहनाने का दुस्साहस करता है। स्त्रियों के जीवन और भावनाओं के साथ खिलवाड़ करते हुए वह अपने आचरण को ‘सृजन की प्रेरणा’ के रूप में प्रस्तुत करता है। उसका यह कथन—“यह तो आवश्यक है कुंतल! मेरे अपने सृजन के लिए आवश्यक है। कुंतल! तुम मुझे महान् लेखक बनाना चाहती हो ना? उसके लिए पत्नी की अतिरिक्त प्रेरणा भी तो लेनी होती है न!”—उसकी मानसिकता की कुटिलता और स्वार्थपरता को उजागर करता है।
वास्तव में यह कैसी प्रेरणा है, जिसमें पत्नी के स्वाभिमान, उसकी भावनाओं और उसके सपनों को रौंदना अनिवार्य माना जाए? यह कैसी सृजन-प्रक्रिया है, जिसमें एक स्त्री के अस्तित्व को नगण्य कर दिया जाता है और उसके सामने ही उसके अधिकारों का हनन किया जाता है? ऐसी सोच न केवल अमानवीय है, बल्कि स्त्री के अस्तित्व और गरिमा पर सीधा आघात भी है। शोभन का यह चरित्र समाज में व्याप्त उस विकृत मानसिकता को उजागर करता है, जो अपनी वासनाओं को वैध ठहराने के लिए ‘कला’ और ‘सृजन’ जैसे पवित्र शब्दों का भी दुरुपयोग करने से नहीं हिचकती।
कांता भारती ने ‘रेत की मछली’ उपन्यास में सांकेतिक रूप से उन सभी घटनाओं को कथा में पिरोया है, जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से उनके अपने जीवन से जुड़ी प्रतीत होती हैं। उपन्यास का नायक शोभन साहित्य-जगत का एक ऐसा चमकता हुआ सितारा है, जो स्वयं को अत्यधिक महिमामंडित करते हुए अपनी तुलना विश्व-प्रसिद्ध चिंतकों से भी ऊपर रखता है। उसका यह कथन—“मीनल, तुमसे सच कहता हूँ मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भारत में पैदा हुआ हूँ, अगर योरोप में होता तो जाँ पॉल सार्त्र को भी लोग इतना बड़ा नहीं मानते।”—उसके अहंकार और आत्ममुग्धता का स्पष्ट परिचायक है।
इतना ही नहीं, वह अपनी कृति ‘अश्वत्थामा’ को रवींद्रनाथ ठाकुर के बाद नोबेल पुरस्कार का सर्वाधिक योग्य दावेदार मानता है। शोभन का व्यक्तित्व विरोधाभासों से भरा हुआ है—अपने साहित्यिक मित्रों से वैसे तो दूरी बनाए रखता था, परंतु जब उसे अपनी महत्वाकांक्षा की सीढ़ी चढ़नी होती, तो उन्हें अपना आत्मीय बना लेता।
वह जिन साहित्यिक सम्मेलनों का आयोजन करता है, उनका समस्त आर्थिक भार चतुराई से प्रकाशकों पर डाल देता है। इन सम्मेलनों में मानव-मूल्यों और साहित्यकार के राजनीतिक दायित्व जैसे गंभीर विषयों पर बड़े ज़ोर-शोर से विमर्श किया जाता है, किंतु यह विमर्श अक्सर औपचारिकता भर रह जाता है। सैद्धांतिक गंभीरता का आभास बनाए रखने के लिए वह वरिष्ठ साहित्यकार वर्मा जी का भरपूर उपयोग करता है। सम्मेलन की राजनीति में भी शोभन अत्यंत चतुर है—जिन लोगों को आमंत्रित नहीं किया जाता, उसका दोष वह संयोजकों पर डालकर स्वयं को निर्दोष सिद्ध कर देता है। साथ ही यह भी साबित कर देता है कि वे लोग उसके लिए बहुत छोटे हैं, इसलिए संयोजक उनका नाम याद नहीं रख पाए।
सम्मेलनों में अपनी ही पुस्तकों का लोकार्पण कर लेना, विषय-प्रवर्तन के समय मित्रों के विचारों को अपने नाम से प्रस्तुत कर देना—ऐसे अनेक कौशलों में शोभन निपुण है। उसका चरित्र न केवल उसकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और अहंकार को उजागर करता है, बल्कि साहित्य-जगत की आंतरिक राजनीति और दिखावटी बौद्धिकता पर भी तीखा व्यंग्य करता है।
इसके बाद प्रसंग आता है उस पत्रिका के संपादकत्व का, जो वर्मा जी का वर्षों पुराना स्वप्न था। साहित्यिक मूल्यों के पुनर्मूल्यांकन की दृष्टि से वे एक ऐसी पुस्तकाकार पत्रिका निकालना चाहते थे, जिसमें लेख, कविताएँ, रिपोर्ताज, लघु उपन्यास और कहानियाँ—साहित्य की विविध विधाएँ—एक साथ समाहित हों और जो किसी लेखक के समग्र सृजन का प्रतिनिधित्व कर सके। वर्मा जी ने इस स्वप्न को साकार करने के लिए अथक परिश्रम किया। दिन-रात की मेहनत से उन्होंने उस ग्रंथ का संपादन किया और पूर्ण विश्वास के साथ उसे प्रकाशन के लिए शोभन को सौंप दिया।
किंतु जब पत्रिका ‘कसौटी’ का मुखपृष्ठ प्रकाशित हुआ, तो उस पर बड़े अक्षरों में ‘संपादक’ के रूप में शोभन का नाम अंकित था, जबकि वर्मा जी का नाम इस प्रकार नीचे दिया गया था, मानो वे केवल सहायक भर रहे हों।
यह स्थिति न केवल वर्मा जी के श्रम का अवमूल्यन थी, बल्कि साहित्यिक नैतिकता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। तथापि, वर्मा जी ने इस अन्याय के प्रति कोई कटु प्रतिक्रिया नहीं दी, क्योंकि वे स्वयं को शोभन के स्तर तक गिराना नहीं चाहते थे। उनका शांत किंतु व्यंग्यपूर्ण कथन—“शोभन, तुम शायद इससे भी ज़्यादा बड़े हो। संपादकत्व तुम्हारे लिए छोटा है। अपने आप को इतना छोटा क्यों करते हो।”—वस्तुतः शोभन को उसकी वास्तविक स्थिति का बोध करा देता है। यह प्रसंग साहित्यिक जगत में व्याप्त स्वार्थ, अवसरवादिता और श्रेय-हड़पने की प्रवृत्ति पर अत्यंत सूक्ष्म किंतु तीखा प्रहार करता है।
यह तथाकथित ‘महान्’ व्यक्ति केवल अपने पारिवारिक संबंधों में ही नहीं, बल्कि साहित्यिक रिश्तों में भी विश्वासघाती सिद्ध होता है। उसने हर संबंध को स्वार्थ और अवसर की कसौटी पर परखा। हाँ, एक रिश्ता अवश्य ऐसा था, जिसे उसने पूरी शिद्दत के साथ निभाया—पर विडंबना यह है कि वही रिश्ता संबंधों की मर्यादा पर एक कलंक बनकर उभरता है।
पति-पत्नी के संबंधों में आई दरार को भरने का एकमात्र सहारा अक्सर उनकी संतान मानी जाती है, किंतु यहाँ स्थिति बिल्कुल विपरीत है। इस प्रसंग में नायक का क्रूर और संवेदनहीन चेहरा और भी स्पष्ट रूप से सामने आता है। वह न केवल अपनी पत्नी की उपेक्षा करता है, बल्कि अपनी मासूम बच्ची के प्रति भी किसी प्रकार की ज़िम्मेदारी या स्नेह नहीं दिखाता। अपनी तुतलाती बच्ची को शोभन को सौंपने का निर्णय कुंतल के हृदय को मानो असंख्य टुकड़ों में विभाजित कर देता है।
किसी भी माँ के लिए अपने बच्चे को स्वयं से दूर करने का निर्णय लेना यह सिद्ध करता है कि उसके जीवन में अब शून्य के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रह गया है। यह दृश्य पाठक के मन में गहरी व्याकुलता और असहनीय पीड़ा उत्पन्न करता है। ऐसी स्थिति में आगे के पृष्ठों को पलटना भी मानो साहस का काम बन जाता है। विडंबना तो यह है कि नायक उस बच्ची को अपनाने के लिए भी शर्त रखता है—कि उसकी माँ कभी उस पर अपना अधिकार नहीं जताएगी और वर्ष में केवल एक बार उससे मिल सकेगी, वह भी बिना यह बताए कि वह उसकी माँ है।
इलाहाबाद के अतरसुइया से शोभन का मुंबई पहुँचना और मीनल के साथ नया संसार बसाना उसके व्यक्तित्व के दोहरेपन को उजागर करता है। एक ओर वह बाहरी दुनिया में सफलता और प्रतिष्ठा अर्जित करता हुआ दिखाई देता है, वहीं दूसरी ओर अपने निजी जीवन में उसकी क्रूरता निरंतर बढ़ती जाती है। अपनी पत्नी के प्रति उसका व्यवहार अत्यंत अमानवीय हो जाता है—वह न केवल उससे मारपीट करता है, बल्कि उसे अपने जीवन से अलग करने के लिए उसे ही दुश्चरित्र सिद्ध करने का प्रयास करता है।
इन समस्त घटनाओं का वर्णन करते हुए लेखिका अत्यंत सहज और संयत भाषा का प्रयोग करती हैं, किंतु इसी सरलता के माध्यम से वह उस तथाकथित ‘श्रेष्ठ’ व्यक्ति के भीतर छिपे क्रूर और भयावह चेहरे को पूरी स्पष्टता के साथ उजागर कर देती हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि उपन्यास में साहित्य-जगत के चमकते हुए इस सितारे का बाहरी व्यक्तित्व और निजी आचरण किस गहरे विरोधाभास में खड़े दिखाई देते हैं।
उसके वास्तविक व्यक्तित्व को पहचान पाना या उसका सही अनुमान लगा पाना अत्यंत कठिन है। उसके चित्रित आचरण ऐसे हैं, जो न केवल नैतिकता की सीमाओं को लाँघते हैं, बल्कि मानवता को भी गहरे स्तर पर शर्मसार कर देते हैं।
यदि शोभन का चरित्र नैतिक पतन का द्योतक है, तो मीनल का आचरण भी उससे अलग नहीं ठहरता। राखी जैसे पवित्र बंधन को निभाने के बावजूद उसी संबंध की मर्यादा का उल्लंघन करना उसके चरित्र पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। इस दृष्टि से वह भी शोभन के समान नैतिक रूप से दोषी प्रतीत होती है। उपन्यास में उसके संबंधों की जटिलता—यहाँ तक कि अपने जीजा से जुड़ने के संकेत—उसके व्यक्तित्व के नैतिक द्वंद्व और मूल्यहीनता को उजागर करते हैं। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरता है कि कोई भी स्त्री किस प्रकार किसी दूसरी स्त्री के जीवन को संकट में डालकर स्वयं की ‘जीत’ का अनुभव कर सकती है।
मीनल का चरित्र केवल एक व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें स्वार्थ और वासना के आगे मानवीय संवेदनाएँ और संबंधों की पवित्रता गौण हो जाती हैं।
कुंतल एक रेत की मछली है। रेत की मछली, जो पानी के अभाव में तड़पती है। लेकिन जब पानी से बाहर फेंक दिए जाने के बाद वही उसकी नियति बन जाती है, तब रेत उसे पराई नहीं लगती। उपन्यास की अंतिम पंक्तियाँ सांकेतिक और मार्मिक हैं :
“कितनी सम्मोहक है यह रेत। घर नहीं बनाने देती लेकिन हर रखा हुआ पाँव कोमलता से समेट तो लेती है और फिर उतनी ही कोमलता से उसे छोड़ भी देती है। मोह न सही, सहृदयता तो है। इसकी तपन मन को नहीं तन को जलाती है। मुझे और चाहिए भी क्या? मन की बलात् हत्या के बाद तन इस तरह जले तो सुख ही होगा। रिश्तों की आग में मन जहाँ जला था वहाँ तो कुछ नहीं उगेगा अब। लेकिन इस तपती रेत में अब जो जलता है वहाँ कुछ उग रहा है। देखो, कहीं वह मैं तो नहीं।”
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