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रील रसाचार्य : वो जो कहते हैं करवा चौथ का चाँद नहीं निकला

करवा चौथ की रील के इंतिज़ार में यह सप्ताह पिछले सालों के करवा चौथ के कुछ ऐतिहासिक वीडियोज़ से दो-चार होते हुए गुज़रा। किसी वीडियो में एक पुरुष 30 सेकंड की रील में उतना निरीह लग रहा है, जितनी निरीह इस देश में आमतौर पर स्त्रियाँ सालों से होती रही हैं। एक स्त्री, जिसे सही उम्र में सही ट्रेनिंग और मार्गदर्शन मिला होता, तो अच्छी जिमनास्ट हो सकती थी, फ़िलहाल करवा चौथ पर अपने संतुलन और पति के स्थायित्व का प्रदर्शन कर रही है। कह सकते हैं कि लंबी उम्र के व्रत के पारायण का यह तरीक़ा थोड़ा कैज़ुअल है। कैज़ुअल अब इतना कॉमन हो गया है कि अब कुछ भी कैज़ुअल नहीं लगता। एकमात्र अनकैज़ुअल बात, जो मुझे इस करवा चौथ पर अलग लगी, उसका संबंध पति-पत्नी से नहीं, बल्कि धरती की जलवायु से है। इस बेमौसम के मौसम की वजह से इस बार करवा चौथ पर बादल कुछ इस क़दर छाए थे कि करवा चौथ का चाँद ईद का चाँद हो गया था और चाँद नहीं निकला, तो नहीं निकला। गूगल सर्च से चंद्रोदय का समय देखकर व्रतधारियों को व्रत खोलना पड़ा। मन मारकर आसमान के चाँद के बजाय अपने ही चाँद से संतुष्ट होना पड़ा।

माइथोलॉजी कहती है कि बारिश और बादलों का देवता इंद्र है। इंद्र को टीवी सीरियलों और फ़िल्मों में जैसा दिखाया गया है, उस आधार पर यह आदमी सही तो नहीं ही लगता। देवताओं के इस अय्याश राजा को हर संयमी और व्रतधारी अपने लिए ख़तरा लगता है। एक रील में यह कहते हुए युवा भी दिखाई दिए “इन्हीं हरकतों से असुर इन्हें कूट देते हैं।” इंद्र मूलतः एक फ़्रस्ट्रेटेड कॉर्पोरेट बॉस है, जिस पर ख़ूब अथॉरिटी है, लेकिन वह इस अथॉरिटी को इतना ज़्यादा सिद्ध करने में लगा रहता है कि उसकी अथॉरिटी को चैलेंज करने के अलावा लोगों के पास कोई चारा नहीं रह जाता। इस इनसिक्योर कॉर्पोरेट बॉस को हर काम में उँगली (बल्कि वज्र, बादल, जो भी उपलब्ध है) करने की बड़ी चुल्ल है।

द्वापर में कृष्ण और गोकुलवासियों को औक़ात दिखाने के लिए इन्होंने अपने एम्प्लॉई मेघों से इतना ओवरटाइम करवाया कि बेचारे सात दिन घर तक नहीं जा पाए। पता नहीं बेचारों को इसका कॉम्प ऑफ़ मिला होगा या नहीं। कल करवा चौथ पर भी बॉस इंद्र देव ने मेघों से ऐसा ही ओवरटाइम करवाया। बेचारे बादलों की पत्नियाँ (ज़ाहिर है, बादल हिंदू ही होंगे, तो उनकी पत्नियों ने ज़रूर उनके लिए भी व्रत रखा होगा... और संभव है, एक-आध प्रगतिशील बादल ने भी अपनी पत्नी या होने वाली पत्नी के लिए व्रत रखा हो) करवा का कलश लिए खड़ी रह गईं। न चाँद निकला, न उनके पति घर आ पाए। कुल मिलाकर यह कि कॉर्पोरेट बॉस से सब परेशान हैं : बादल भी, उनकी पत्नियाँ भी, कृष्ण, गोकुल, गोपियाँ, नंद बाबा, मेरी मम्मी, भाभियाँ और वो भी। इसी से परेशान एक प्रेमी कवि कह रहा था :

"इंद्र देव जी, इस मौसम में ऐसी बारिश, हद करते हो!
फिर मथुरा का कोई ग्वाला पर्वत लेकर अड़ जाएगा..."

बहरहाल, करवा चौथ के चाँद की इस चाँदमारी से मुझे एक और चाँदमारी की याद आ गई। इसका संबंध ईद के चाँद से है। जैसा कि आप जानते ही हैं, ईद पर भी चाँद की बड़ी पूछ होती है। हर जगह चाँद कमेटियाँ हैं, जिनका काम है चाँद देखना। यह भी कमाल है कि चाँद अगर निकला हो तो उसे न देखना मुश्किल है। ऐसे में उसे देखने के लिए अलग से लोग, अलग से कमेटी! ख़ैर, अगेन ए फ़नी कॉर्पोरेट थिंग।

नियम-रीति-रिवाज के नाम पर ऐसी बहुत-सी चीज़ें धार्मिक संस्कृतियों का हिस्सा हैं ही, क्या किया जा सकता है। तो हुआ यह कि पाकिस्तान की चाँद कमेटी को चाँद नहीं दिखा और तय हुआ कि चाँद अगले दिन देखा जाएगा और ईद उसके अगले दिन। लेकिन इस बीच पता यह चला कि पेशावर के एक शाइर को चाँद दिख गया। मीडिया और पॉप कल्चर में इस घटना पर ख़ूब मौज ली गई। यहाँ तक कि एक दूसरे शाइर ने इस पर बड़े मज़े की शाइराना टिप्पणी की :

"वो जो कहते हैं चाँद नहीं निकला, निकला नहीं तो कल ईद नहीं
चाँद अपनी आँख से देखा है पेशावर में, कोई कहता है
अये चाँद कमेटी वालो, तुम क्यों चाँद फ़लक पर ढूँढ़ते हो
मेरे सामने वाली खिड़की में एक चाँद का टुकड़ा रहता है"

इस घटना के बाद प्लेटो के उस कथन पर मेरा भरोसा मज़बूत ही हुआ कि शाइरों, कवियों और फ़लसफ़ियों की सभ्य समाज में कोई जगह नहीं होनी चाहिए। ये अपनी महबूबा को चाँद कहते हैं और उस पर तवक़्क़ो यह कि पूरी दुनिया भी उसी के दिखने पर ईद कर ले।

चाँदनी भले चार दिन की होती हो, लेकिन हिंदुस्तानी तहज़ीब में, ख़ासकर उत्तर भारत में, चाँद के यही दो दिन हैं : ईद और करवा चौथ। वरना चाँद की किसे पड़ी है, सिवाय चाँदमारी करने वालों और छत पर मिलनातुर ‘आवारा’ के नरगिस और राज कपूर के।

"दम-भर जो उधर मुँह फेरे, ओ चंदा
मैं उनसे प्यार कर लूँगी, बातें हज़ार कर लूँगी..."

साथी के न होने पर चाँद से बातें करने वाले प्रेमी-प्रेमिकाएँ, साथी के मिलते ही चाँद के लिए वक़्त बदल दिया, जज़्बात बदल दिए टाइप हो जाते हैं। दरअस्ल, चाँद एक पुराना कॉर्पोरेट एम्प्लॉई है, जो सालों से एक ही कंपनी में एक ही कुर्सी पर बैठा है। उसका काम बहुत थैंकलेस क़िस्म का है। साल में एक-दो बार लोगों को उससे काम पड़ता है, बेचारा फटाफट कर देता है। लेट-लतीफ़ी नहीं करता, नख़रे नहीं करता, तो लोगों को उसकी उपस्थिति, उसकी अहमियत फ़ील नहीं होती। बेचारा रोज़ अपनी डेस्क पर बैठा रहता है। किसी दिन औरतें आकर जल चढ़ा जाती हैं, किसी दिन चाँद कमेटी हेलीकॉप्टर से आकर उसका दीदार कर जाती है, फिर उसे साल भर चिलम पीकर ट्यूबलाइट देखने वाले स्मैकिए निहारते हैं या फिर मौक़ापरस्त आशिक़, जिनकी प्रेमिकाओं के छत पर आते ही वे उससे मुँह फेरने को कहने लगते हैं।

ख़ैर, मेरे भाई, डोंट वरी। इन शाइरों-कवियों पर लानत भेजो, मैं तुम्हें रोज़ देखूँगा, वादा!

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