रील रसाचार्य : रील बीच नाना
रचित
11 अक्तूबर 2026
मैं संभवत: तीसरी या चौथी कक्षा में था जब छोटे भाई ने कहा सिर के पीछे नहीं मारना चाहिए यहाँ पे छोटा दिमाग़ होता है। यह बात उसने एक फ़िल्म से सीखी थी जिसमें कोई अजीब-सा हीरो था जो हीरो कम ग़द्दार (विलेन) ज़्यादा लगता और सब पे चिल्लाता रहता... यह मेरा नाना पाटेकर से पहला परिचय था। इसके बाद बड़े पर्दे पर नाना को पहली बार देखा ‘अग्निसाक्षी’ में। यही राय बनी कि यह आदमी जो भी है, न तो हीरो है, न ही एक्टिंग कर रहा है। यह आदमी सच में ही दुष्ट है, गड़बड़ ही है। इसके बाद ‘तिरंगा’ के इंस्पेक्टर वागले दूरदर्शन की कृपा से हमारे सालाना दोस्त बन गए और हमें महसूस हुआ यह चिड़चिड़ा आदमी इतना भी बुरा नहीं है। फिर इसी तरह के दूसरे रोल्स से नाना पाटेकर धीरे-धीरे हमें अच्छे लगने लगे और ‘वेलकम’ के उदय शेट्टी ने जैसे हमें जीत ही लिया। इस लंबे अंतराल में कुछ नाना हम तक आए कुछ हमें उन्हें समझने लायक़ हुए। वह नाना ही था और ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी ही था जो कॉमेडी करते हुए सिर्फ़ अपनी आवाज़ से हमें रुला सकता था :
“मजनू, बचपन में मेरा बाप मेरी उँगली पकड़ के मंदिर लेकर जाता था मंदिर की दीवार पर एक बात लिखी थी कि इंसान को अपने बुरे कर्मों की सजा इसी ज़िंदगी भुगतनी पड़ती है। बचपन की सभी यादें धुँधली हो गईं, लेकिन वह दीवार की बात अभी तक यहाँ चिपकी पड़ी है...”
ऐसे ही अभिनय से नाना हमें अपना मुरीद बनाते चले गए। प्रकाश झा के ‘महाभारत’ पर आधारित पॉलिटिकल ड्रामा ‘राजनीति’ में नाना पाटेकर का काम, ख़ासकर उनकी आँखें और आवाज़, कृष्ण के आधुनिक स्वरूप को जिस अंदाज़ में प्रस्तुत करती हैं, उससे बेहतर कृष्ण की कोई और संभावना मुझे तो कम-से-कम नहीं दिखती।
इसके बाद मीम और रील का ज़माना आया, यहाँ भी नाना की उपस्थिति रही। पॉप-कल्चर में उनकी उपस्थिति लगातार बनी रही। फिर 8 अक्टूबर की सुबह, एक फ़ोन रिसीव करते ही सुना, “शायद नाना पाटेकर की डेथ हो गई है, ज़रा चेक करो।” चेक किया। डेथ हो गई थी।
नाना पाटेकर नहीं रहे। एक अभिनेता रह गया, एक भंगिमा रह गई और रह गया मीम्स के बीच आकर “कंट्रोल मजनू” कहने वाला एक वायरल टेम्पलेट। इस सप्ताह रील की दुनिया में नाना को ख़ूब देखा-दिखाया गया। यह स्वाभाविक भी है। मृत्यु कैसे किसी दीपक की लौ को फड़फड़ाकर हमेशा के लिए बुझा देती है। नाना पाटेकर नाम की यह चिंगारी बुझ गई। लौ का आख़िरी पराक्रम इस सप्ताह सोशल मीडिया पर चमकता रहा :
“हमारे बा'द अब महफ़िल में अफ़साने बयाँ होंगे
बहारें हम को ढूँढ़ेंगी न जाने हम कहाँ होंगे”
यह शे’र कहते हुए नाना भी अपनी मृत्यु के सोशल मीडिया जनाज़े में शामिल दिखे। यूँ नाना ख़ुद को असुंदर मानते थे। उनके लिए किसी भी भीड़ में गुम हो जाना बहुत आसान था। उन्हें अगर सुंदरता के मानकों और उसकी अतिव्याप्ति से आक्रांत फ़िल्मोद्योग में अपनी पहचान बनानी थी; तो वह सिर्फ़ और सिर्फ़ उत्कृष्ट प्रतिभा, असाधारण धैर्य और ख़ुद पर अटल आस्था से ही संभव था। प्रतिभा उनमें थी ही, रंगमंच के अनुशासन में तपा-दहकता लावे जैसा व्यक्तित्व था। एक बहुत सर्दी खाई हुई उम्र की ठहरी हुई आवाज़ उनके कंठ में बसती थी और भंगिमा में ऐसा खाँटीपन था जिससे सच्चाई टपकती थी।
इसमें हैरानी नहीं कि ‘वजूद’ में रंगमंच के कलाकार का अभिनय करते नाना अपने चरित्र में इतने घुल गए कि दर्शकों के साथ-साथ उनके साथी कलाकारों तक ने इसे महसूस किया और नाना को फ़िल्म ख़त्म होने के बाद भी इस किरदार से निकलने में वक़्त लगा। इसी फ़िल्म के दृश्य में अश्वत्थामा के अभिनय में ईश्वरों को चुनौती देने वाला वह छोटा-सा मोनोलॉग कैसे अभिनय का शीर्ष छू लेने का उदाहरण है। नाना भी बहुत सारी असुरक्षाओं, सौतलेपन और उसी तिरस्कार को जीते हुए यहाँ पहुँचे थे जहाँ उन्हें अपना रूपक मिला। शापित अश्वत्थामा। अश्वत्थामा का द्वंद्व नाना के जीवन का भी द्वंद्व था, जहाँ अपना पालन-पोषण ख़ुद करते हुए अपने समय के देवताओं को वे जीवन भर चुनौती देते रहे :
“देखो! देखो! इस मुट्ठी भर धूल को। चार साँसों में जकड़ लिया है किसी की वासना ने। उन्हीं चार साँसों का मोल चुका रहा हूँ आज तक। नहीं ब्रह्मा नहीं, मैं नहीं हूँ प्रेम और श्रद्धा की संतान, मैं हूँ उपज घृणा, उपेक्षा, तिरस्कार की। हे विष्णु! अब मेरे पालन का दायित्व तुम्हारा नहीं है। नहीं शिवशंकर, अब मैं स्वयं मृत्यु देवता हूँ। आज मैं प्रलय पथ की नींव रखूँगा।”
महान् अभिनेता दिलीप कुमार के हाथों फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार लेते हुए नाना उनके प्रति सम्मान का भाव तो दिखाते हैं, लेकिन दिलीप कुमार की उपस्थिति उन्हें न विचलित कर पाती है, न ही यह कहने से रोक पाती है :
“आज तक मुझे ऐसा लगता था कि फ़िल्मफ़ेयर के अवॉर्ड ख़रीदे जाते हैं। मुझे मिलने के बाद लगता है, नहीं, ख़रीदा नहीं जाता। नहीं मिलता तो मैं बोलता वहाँ से कि यह उन्होंने ख़रीदा है।”
यह ईमानदारी उसी किरदार जैसी है, जिसके लिए यह अवॉर्ड मिला था : ‘क्रांतिवीर’।
नटसम्राट चला गया, अपने मृत्यु-देवता के पास, अपने हठ और अपने जूनून के साथ। लेकिन कलाकार तो अमर होता है अपनी कला के साथ। वह रहेगा। उसका दुख, पीड़ा, आँसू, बेचैनी, हँसी सब समय की रील के किसी न किसी स्क्रॉल में हम तक आती ही रहेंगी।
किसी उदास शाम हमसे भी ज़्यादा परेशान, हमसे भी ज़्यादा बर्बाद एक क्रांतिवीर हमें यह उलाहना देता ही रहेगा :
“आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने…”
हमारे सबसे कमज़ोर समय में कोई उदय शेट्टी हमसे कहता ही रहेगा :
“कंट्रोल उदय...”
किसी रील में किसी किन्नर के आगे नाच के उल्टा उससे पैसे माँगता नाना पाटेकर यह कहता ही रहेगा कि, ‘तुम मिलो तो सही...’
कोई यशवंत, कोई ग़ुलाम-ए-मुस्तफ़ा, कोई विश्वनाथ, कोई इंस्पेक्टर वागले हमें यह याद दिलाता रहेगा कि संघर्ष शाश्वत है और मुक्ति, माया का आख़िरी दाँव।
और अंततः ‘वजूद’ के संवाद के साथ नाना को अलविदा :
“क्षितिज पर सूरज ख़ुदकुशी कर रहा था
मैंने सोचा मेरे कल का क्या होगा
उसे बचाने मैं अंदर दौड़ा
किनारे के लोग सिर्फ़ चिल्लाते रहे
बचाओ… बचाओ...”
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