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प्रीति-प्रतीति की ध्यानावस्था में रची गई कविताएँ

रुस्तम के कविता-संग्रह ‘एक ख़ुशबू वहाँ फैली थी’ की कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि यह प्रीति-प्रतीति की ध्यानावस्था में रची गई रचनाएँ हैं। यहाँ आदि से अनंत तक प्रेम की ख़ुशबू बिखरी हुई है। जड़ हो या चेतन, रेगिस्तान हो नख़लिस्तान, इस ख़ुशबू ने सबको सराबोर कर दिया है। यह ख़ुशबू प्रिय की उपस्थिति और अनुपस्थिति से निरपेक्ष है। प्रियतम जहाँ उपस्थित है, वहाँ तो उसकी धड़कन है ही, जहाँ उपस्थित नहीं है वहाँ उसका स्पंदन और स्पष्ट सुनाई देता है। प्रिय की उपस्थिति और अनुपस्थिति में प्रेम की अवस्थिति के दो सहज उदाहरण देखिए :

तुम आईं 
छोटा सा एक लाल पत्थर तुम्हारे हाथ में था
और काँसे का एक घुँघरू 
तुमने उन्हें लकड़ी की मेरी मेज़ पर रख दिया।

यहाँ प्रिय की भौतिक उपस्थिति से प्रेम का वातावरण झंकृत है। उसके हाथ में रखा छोटा-सा लाल पत्थर और उसकी संगत में काँसे का एक घुँघरू! इनका लकड़ी की मेज़ पर रख दिया जाना। यह शुष्क जीवन में प्रेम और संगीत की उपस्थिति का एक रूपक है। यहाँ प्रिय अपने रंग और धुन के साथ साक्षात् है। पर जहाँ वह भौतिक रूप से उपस्थित नहीं है, वहाँ उसके होने की अनुभूति और अधिक सघनता के साथ मौजूद है :

एक ख़ुशबू  वहाँ फैली थी
उस उजाड़ में।

मैं समझ गया
तुम वहीं कहीं थीं।

यह प्रेम-पराग से अभिषिक्त स्मृति की बयार है जो उजाड़ में भी ख़ुशबू बिखेर सकती है। इस ख़ुशबू को रुस्तम के इस संग्रह में पृष्ठ-दर-पृष्ठ महसूस किया जा सकता है। इस संग्रह में छोटी-छोटी 111 कविताएँ हैं। हर कविता अर्थगर्भित और अपने में पूर्ण है, लेकिन संग्रह की सभी कविताओं को सातत्य में पढ़ा जाए तो एक प्रदीर्घ प्रेम कविता की तस्वीर बनती है। जैसे 111 मणिकाओं की माला हो जिसमें हर हर मणिका की अपनी चमक अपना सौंदर्य है, लेकिन जब वे एक दूसरे से जुड़कर माला के रूप में दिखती हैं तो सौंदर्य कई गुना हो जाता है। इस प्रदीर्घ कविता में प्रेम कहीं अभिधा तो कहीं व्यंजना, कहीं रूप तो कहीं रूपक, कहीं धूप तो कहीं परछाईं, कहीं माया तो कहीं यथार्थ, कहीं स्मृति तो कहीं स्वप्न के रूप में पंक्ति-दर-पंक्ति मौजूद है। यहाँ प्रेम में तोष और रोष दोनों की उत्कट अनुभूति है। तोष इतना कि एक स्त्री की हँसी में हज़ार की हँसी सुनाई देती है, उसकी आँखें हरी हो जाती हैं और रोष ऐसा कि उन्हीं हरी आँखों से पूरी पृथ्वी की आग बरसने लगती है। प्रकृति भी तो इसी तरह अपना तोष और रोष व्यक्त करती है। इस प्रदीर्घ कविता में प्रेम का अपना पर्यावरण है। यही पर्यावरण प्रेम के भविष्‍य का शरण्य भी है :

हम हवा में उड़ेंगे
पानी में बहेंगे
पत्तों में हिलेंगे
फूलों में खिलेंगे
काँटों में चुभेंगे
जब हम हम नहीं होंगे।

अपने अस्तित्व को भूलकर ही कोई इस पर्यावरण का हिस्सा बन सकता है। प्रेम-वाटिका के प्रहरी बहुत सख़्त हैं, किसी को उसके अहं के साथ प्रवेश नहीं करने देते। हमारे पुरखों ने भी इस बात की तस्दीक़ की है। भक्तिकाल के संत कवि कबीर याद आते हैं : ‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। प्रेम गली अति सांकरी, तामे दो न समाहि।’ कबीर के 400 साल बाद रेख़्ते के उस्ताद शाइर मिर्ज़ा ग़ालिब ने भी अपने ख़ास अंदाज़ में लगभग यही बात कही है : ‘न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता / डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता।’

प्रस्तुत संग्रह में हरे रंग पर पाँच कविताएँ हैं। हरा जीवन और प्रकृति का रंग है। यह सिर्फ़ रंग नहीं, वसुंधरा का स्वप्न है। हरा कवियों का भी प्रिय रूपक है। रीतिकालीन कवि बिहारी का एक प्रसिद्ध दोहा है, जिसमें प्रेम की छाया में कृष्ण के ‘हरित-दुति’ हो जाने का वर्णन है। 

समकालीन कवि प्रयाग शुक्ल के एक संग्रह का शीर्षक ही है—‘यह जो हरा है’। हरे पर रुस्तम की ये पाँच कविताएँ पंचतत्त्व की तरह हैं, जिनके सम्मिलन से एक हरी-भरी सृष्टि सृजित होती है और पाँचों ज्ञानेंद्रियाँ एकाग्र होकर इस हरियर सृष्टि में प्रेम के लाल रंग की जगह तलाश लेती हैं। जहाँ प्रेम की लालिमा है, वहीं हरा भी सुकून पाता है। गोपियों के सवाल—‘मधुवन तुम कत रहत हरे’ में भी तो यही भाव है कि प्रेम के अभाव में कोई वन या जीवन कैसे हरा-भरा रह सकता है। आज के  इस प्रेम-विरोधी समय में हरे का स्वप्न एक असंभव सृष्टि का स्वप्न है, जिसे एक बावरा प्रेमी या विकल कवि ही देख सकता है, क्योंकि वह जानता है :

असंभव है हरा
असंभव है हरे तक पहुँचना
या फिर हरा
असंभव की कल्पना है।

इस संग्रह की कविताओं में जो कवि रचित सृष्टि है, वह वास्तविक सृष्टि के सममित नहीं है। यहाँ मूर्त और अमूर्त का द्वैताद्वैत है। बिम्ब मूर्त हैं, लेकिन वे पाठक को प्रेम के जिस लोक में ले जाते हैं, वह भाव तरंगों का एक महासागर है। रुस्तम रचित यह महासागर जल का भी हो सकता है और मरु की रेत का भी। यहाँ प्रेम का जो स्वप्निल पर्यावरण है, उसमें कवि भी एक मनुष्य की तरह नहीं, बल्कि प्रकृति के एक अवयव की तरह ही मौजूद है :

मेरे अंदर पेड़ उग आए हैं
या समुद्र उफन रहा है
या सूर्य दमकने लगा है
कहना कठिन है। 
आज हवा भी रंगीन लग रही है
आज लग नहीं रहा कि मैं कोई मनुष्य हूँ
शायद मैं प्रकृति की जादुई किसी वस्तु में बदल रहा हूँ।

यह बदलाव कायांतरण नहीं, बल्कि चेतना का अंतरण है। मानवीय चेतना के निसर्ग-चेतना में अंतरण की स्थिति है। संग्रह की अनेक कविताएँ इस बात की गवाही देती हैं कि रुस्तम की संवेदना सिर्फ मनुष्य या प्राणिमात्र के प्रति ही नहीं, प्रकृति में मौजूद हर वस्तु के प्रति है। प्रेम में भीगा हुआ हृदय हो या पतझड़ का सूखा हुआ पत्ता, दोनों की आवाज यह कवि एक जैसी तन्मयता से सुनता है।

पतझड़ का 
अंतिम 
लाल 
सूखा हुआ पत्ता
उनके पैरों के नीचे दब गया
टुकड़ों में बँट गया।
उसके चटकने की आवाज़ 
दूर-दूर तक सुनाई दी।

किसी कविता को समझने के लिए एक प्राथमिक सवाल होता है कि वह कविता आती कहाँ से है? इस संग्रह के संदर्भ में देखें तो प्रेम, प्रकृति और स्मृति वे प्रमुख स्रोत हैं; जहाँ से यह काव्य निर्झर झरता है। संग्रह की अनेक कविताओं में प्रकृति के विविध अवयवों के बीच परस्पर सहानुभूति और समानुभूति की सुंदर अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। यहाँ व्यक्ति और प्रकृति की एकात्मता का ऐसा दृश्य संभव है कि एक मनुष्य लड़खड़ाता है और उसी समय एक पेड़ टूटकर गिर जाता है :

कल शाम जब मैं
लड़खड़ाते हुए जा रहा था
पूरा दृश्य मेरे सामने लहरा रहा था।
ऐन उसी वक़्त 
मैंने एक पेड़ को 
टूटकर 
गिरते हुए देखा।

संग्रह में लाल रंग पर तेरह कविताएँ हैं। लाल उल्लास का रंग है और क्रांति का भी। यह आकर्षण का रंग है और ख़तरे का भी, और इन सबसे बढ़कर यह प्रेम का रंग है। लाल के प्रति कवि का प्रेम और आकर्षण पुरातन है। कबीर लिखते हैं : ‘लाली मेरे लाल की, जित देखों तित लाल / लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल।’ रुस्तम को भी ‘लाल’ त-रंग ने सराबोर कर दिया है। इसी बात को वे कुछ इस तरह कहते हैं :

लाल ने मुझे अपने पास बुलाया
मुझसे बातें कीं 
फिर उसने अपने-आपको 
मुझ पर फैला दिया।

इन कविताओं में लाल विविध रूपों में आता है। लाल सुरमा, लाल गुलाब, लाल कोपल, पतझड़ का सूखा लाल पत्ता, लाल हृदय, लाल रक्त, लाल पत्थर जैसे बिम्बों-प्रतीकों की उपस्थिति एक लाल संसार का आभास देती है। इस अरुणिम संसार में वस्तुएँ ही नहीं, ध्वनि भी लाल है। जब ज्ञानेंद्रियाँ एकाग्र हो जाती हैं तो श्रव्य में दृश्य और दृश्य में श्रव्य की अनुभूति संभव हो जाती है :

दूर-दूर तक सुनाई दी 
पत्ते की चटकने की आवाज
फिर वापस लौट आई पत्ते में
वहाँ शांत हो गई
लेकिन लाल वह ध्वनि
अब भी बज रही है
मेरे हृदय में।

इन कविताओं के आभ्यंतर में ‘असंभव में संभव का स्वप्न’ बसता है। जहाँ उम्मीद की कोई राह नहीं, कविता वहाँ भी संभावना की प्रतीक्षा करती है, ‘क्या पता कोई आ ही जाए, वहाँ भी, जहाँ कोई राह नहीं है।’ प्रेम का प्रकाश सर्वथा-असंभव को भी संभव करने का विश्वास देता है। बिछोह का चरम है मृत्यु; जिसके बाद मिलन की कोई संभावना नहीं बचती, पर कवि मृत्यु के बाद मिलन की बात करता है। कवि को विश्वास है कि जहाँ प्रेम का स्वप्न है, वहां असंभव का अ विलुप्त हो जाता है।

कल फिर आना 
मृत्यु के बाद भी हम मिलेंगे
इसी पार्क में
इसी बेंच पर
इन्हीं पेड़ों के नीचे।

सरल शब्दों में विरल अनुभूति को अभिव्यक्त करने की शैली इस संग्रह की विशिष्‍टता है। मितकथन रुस्तम का जीवन-दर्शन है। दो, तीन, चार पंक्तियों की छोटी-छोटी कविताओं में निहित अर्थच्छवियाँ तुलसीदास की अर्धाली ‘अरथ अमित आखर अति थोरे’ की याद दिलाती हैं। कुछ अनूठे बिम्ब भी इस संग्रह की उपलब्धि हैं। प्रिय की उपस्थिति को दृश्य के बजाय श्रव्य रूप में अनुभूत करने का यह बिम्ब देखिए : ‘जैसे आग में लकड़ियाँ चटख रही हों / ऐसे ही सुनाई देती है मुझे तुम्हारे होने की आवाज़।’ आग में चटक रही लकड़ियों की आवाज़ और मरुभूमि में भटक रही ख़ुशबू की तरह ये कविताएँ पाठक की स्मृति में अनुभूति के रूप में दर्ज होकर लंबे समय तक साथ रहने वाली हैं।

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~ रुस्तम की कविताएँ यहाँ पढ़िए : रुस्तम का रचना-संसार

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